SIR पर MP- MLA की दिलचस्पी ना दिखने से संघ नाराज, यूपी को जल्द मिल सकता है नया प्रदेश अध्यक्ष।
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रदेश अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया लंबे समय से लंबित है, लेकिन अब यह फैसला इसी सप्ताह
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रदेश अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया लंबे समय से लंबित है, लेकिन अब यह फैसला इसी सप्ताह लिया जा सकता है। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी का कार्यकाल जनवरी 2024 में समाप्त हो चुका था, उसके बाद से पद पर उनकी नियुक्ति को बार-बार बढ़ाया गया है। यह देरी संगठनात्मक चुनावों की प्रक्रिया, जातिगत समीकरणों और आगामी पंचायत तथा विधानसभा चुनावों की रणनीति से जुड़ी रही। सोमवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लखनऊ स्थित आवास पर बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बीच समन्वय बैठक आयोजित हुई, जिसमें नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर सहमति बनाने के प्रयास हुए। इस बैठक में केंद्रीय नेतृत्व ने अपना पसंदीदा नाम साझा किया, जिस पर राज्य स्तर के प्रमुख नेताओं से राय ली गई। बैठक में बीजेपी के संगठन महामंत्री बीएल संतोष और आरएसएस के सह-सह सरकार्यवाह अरुण कुमार ने पूर्वी यूपी तथा अवध क्षेत्र के संघ कार्यकर्ताओं से भी चर्चा की, उसके बाद मुख्यमंत्री आवास पर विस्तृत बातचीत हुई।
यह बैठक विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसमें न केवल प्रदेश अध्यक्ष के चयन पर फोकस रहा, बल्कि अन्य संगठनात्मक मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ। स्रोतों के अनुसार, केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश इकाई के लिए एक ऐसे चेहरे का चयन किया है जो जातिगत संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ पार्टी की आंतरिक एकता को मजबूत कर सके। वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी के कार्यकाल में पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन किया था, जहां सीटों की संख्या 2019 के 62 से घटकर 33 रह गई। इस पृष्ठभूमि में नया चयन आगामी पंचायत चुनावों (2026) और विधानसभा चुनावों (2027) के लिए कोर्स करेक्शन का हिस्सा माना जा रहा है। बैठक में उपस्थित उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, प्रदेश महामंत्री (संगठन) धर्मपाल सिंह सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं ने नाम पर सहमति जताई। आरएसएस की भूमिका इस चयन में निर्णायक रही, क्योंकि संघ पार्टी के वैचारिक आधार के रूप में कार्य करता है और संगठनात्मक निर्णयों में उसकी सलाह अनिवार्य मानी जाती है।
प्रदेश अध्यक्ष के चयन में एक साल से अधिक की देरी के कई कारण रहे। जनवरी 2024 में भूपेंद्र सिंह चौधरी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन विभिन्न स्तरों पर सहमति न बन पाने से यह लटक गई। मार्च 2025 में 70 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की गई, लेकिन शेष 28 जिलों के लिए भी देरी हुई। नवंबर 2025 में 14 और जिला अध्यक्षों के नाम घोषित किए गए, जिससे कुल 84 जिलों का चयन पूरा हो गया। शेष 14 जिलों के लिए भी जल्द निर्णय की उम्मीद है। यह देरी जातिगत समीकरणों को सुलझाने, स्थानीय स्तर पर दबाव समूहों को संतुष्ट करने और केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी से जुड़ी रही। पार्टी ने उत्तर प्रदेश को 98 संगठनात्मक जिलों में विभाजित किया है, और प्रत्येक स्तर पर चुनाव प्रक्रिया को पूरा करने में आंतरिक गुटबाजी ने बाधा डाली। उदाहरण के लिए, जनवरी 2025 में कई जिला स्तरों पर नामों की सूचियां दिल्ली भेजी गईं, लेकिन स्थानीय नेताओं के विरोध के कारण उन्हें लौटा दिया गया। इस देरी से न केवल संगठनात्मक निर्णय प्रभावित हुए, बल्कि बोर्डों तथा निगमों में नामांकन भी लटक गए।
आरएसएस की नाराजगी का एक प्रमुख कारण विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया में सांसदों तथा विधायकों की उदासीनता रही। SIR मतदाता सूची के विशेष संशोधन का हिस्सा है, जो चुनाव आयोग द्वारा चलाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में बूथ स्तर पर सत्यापन और नए मतदाताओं का पंजीकरण शामिल है, जो आगामी चुनावों के लिए महत्वपूर्ण है। सोमवार की बैठक में संघ नेताओं ने स्पष्ट किया कि बीजेपी के सांसद तथा विधायक SIR में सक्रिय भागीदारी नहीं दिखा रहे, जिससे ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में मतदाता जागरूकता प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, SIR के तहत 2.6 करोड़ सामान्य सदस्यों का पंजीकरण हुआ है, लेकिन सांसद-विधायकों की भागीदारी न होने से लक्ष्य प्राप्ति में कमी आ रही है। संघ ने इस पर चिंता जताई, क्योंकि यह पार्टी की आधार विस्तार रणनीति को कमजोर कर सकता है। बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई और नेताओं को निर्देश दिए गए कि वे SIR में सक्रिय भूमिका निभाएं। यह नाराजगी संगठनात्मक कमजोरी को दर्शाती है, जहां स्थानीय नेता चुनावी लाभ के बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को तरजीह दे रहे हैं।
बैठक में अन्य मुद्दों पर भी विचार हुआ, जिनमें अयोध्या राम मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर का निर्माण पूरा होना, प्रत्येक जिले में घुसपैठिए तथा अवैध प्रवासियों के लिए अस्थायी हिरासत केंद्र स्थापित करने की योजना और SIR की प्रगति शामिल रही। इन चर्चाओं से स्पष्ट है कि बीजेपी तथा आरएसएस के बीच समन्वय को मजबूत करने का प्रयास जारी है। 2024 लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी ने पंचायत चुनावों को सुधार का अवसर माना है, जहां पिछड़ी जातियों तथा दलित वोटों को मजबूत करने पर जोर है। समाजवादी पार्टी की PDA रणनीति ने 2024 में ओबीसी तथा दलित वोटों को प्रभावित किया था, इसलिए नया प्रदेश अध्यक्ष ऐसा चेहरा होगा जो इन समुदायों से जुड़ा हो। संभावित उम्मीदवारों में धर्मपाल सिंह तथा दिनेश शर्मा जैसे नाम चर्चा में हैं, जो जातिगत आधार प्रदान करते हैं। लोध समुदाय से जुड़े धर्मपाल सिंह के पास प्रशासनिक तथा राजनीतिक अनुभव है, जबकि दिनेश शर्मा पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं।
प्रदेश अध्यक्ष के चयन से जुड़ी प्रक्रिया संगठनात्मक चुनावों पर आधारित है, जो दिसंबर 2024 से चली आ रही है। मंडल स्तर पर 1 से 15 दिसंबर तथा जिला स्तर पर 15 से 31 दिसंबर तक चुनाव निर्धारित थे, लेकिन आंतरिक मतभेदों से यह लेट लतीफी हुई। पार्टी ने 1,62,459 बूथ समितियों के चुनाव पूरे किए, उसके बाद 1,918 मंडल अध्यक्ष चुने गए। यह प्रक्रिया जनवरी 2025 तक राज्य स्तर तक पहुंचनी थी, लेकिन केंद्र तथा राज्य नेतृत्व के बीच समन्वय की कमी से देरी हुई। आरएसएस ने बार-बार संगठन तथा सरकार के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया है, जो सोमवार की बैठक में परिलक्षित हुआ। संघ के सह-सह सरकार्यवाह अरुण कुमार ने पूर्वी यूपी तथा अवध के कार्यकर्ताओं से क्षेत्रीय मुद्दों पर राय ली, जो चयन प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।
आगामी पंचायत चुनावों के मद्देनजर नया चयन जल्दी आवश्यक है, क्योंकि इससे जिला स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। वर्तमान में कार्यवाहक जिला अध्यक्षों के पास पूर्ण अधिकार नहीं हैं, जिससे संगठनात्मक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। उदाहरण के लिए, बांदा में विवादास्पद जिला अध्यक्ष मुखलाल पाल को हटाया गया, लेकिन उनका स्थान अभी तक नहीं भरा गया। इसी तरह, अन्य क्षेत्रों में भी स्थानीय दबाव के कारण नियुक्तियां लटकी हुई हैं। नया प्रदेश अध्यक्ष न केवल आंतरिक कलह को शांत करेगा, बल्कि 2027 विधानसभा चुनावों के लिए रणनीति तैयार करने में सहायक होगा। पार्टी का लक्ष्य गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित तथा ऊपरी जातियों का संयोजन मजबूत करना है, जो 2024 में कमजोर पड़ा था।
सोमवार की बैठक में SIR पर संघ की नाराजगी ने संगठन को झकझोर दिया। विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया में बूथ स्तर अधिकारियों (बीएलओ) की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन सांसद-विधायकों की अनुपस्थिति से युवा मतदाताओं का पंजीकरण प्रभावित हो रहा है। शहरी क्षेत्रों में यह चुनौती अधिक है, जहां स्थानीय कार्यकर्ता आवंटित बूथ पर नहीं रहते। मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, लेकिन राजनीतिक नेताओं की उदासीनता से लक्ष्य अधूरा रह गया। संघ ने चेतावनी दी कि यह पार्टी की वोटर बेस विस्तार को नुकसान पहुंचाएगा। बैठक में नेताओं को निर्देश दिए गए कि वे SIR में सक्रिय हों, ताकि मतदाता सूची सटीक हो।
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