अजीत डोभाल का सुरक्षा मंत्र: सैन्य शक्ति से भी बड़ा है जनता का मनोबल, इसके बिना संसाधन और टेक्नोलॉजी भी पड़ जाते हैं कम।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने संबोधन में युद्ध के मनोवैज्ञानिक और सामरिक आयामों पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत

Apr 15, 2026 - 15:47
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अजीत डोभाल का सुरक्षा मंत्र: सैन्य शक्ति से भी बड़ा है जनता का मनोबल, इसके बिना संसाधन और टेक्नोलॉजी भी पड़ जाते हैं कम।
अजीत डोभाल का सुरक्षा मंत्र: सैन्य शक्ति से भी बड़ा है जनता का मनोबल, इसके बिना संसाधन और टेक्नोलॉजी भी पड़ जाते हैं कम।
  • राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में बोले एनएसए: रूस और अमेरिका की हार का दिया हवाला, बताया क्यों वियतनाम और अफगानिस्तान में फेल हुई महाशक्तियां।
  • युद्ध केवल हथियारों से नहीं बल्कि इरादों से जीते जाते हैं: दीक्षांत समारोह में अजीत डोभाल ने राष्ट्रवाद और जनशक्ति के महत्व को दी नई परिभाषा।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने संबोधन में युद्ध के मनोवैज्ञानिक और सामरिक आयामों पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सदियों से चले आ रहे युद्धों का अंतिम और वास्तविक उद्देश्य केवल क्षेत्रों पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विपक्षी पक्ष के मनोबल को पूरी तरह से ध्वस्त करना होता है। डोभाल के अनुसार, जब किसी राष्ट्र या सेना का मनोबल टूट जाता है, तो उसकी भौतिक शक्ति चाहे कितनी भी अधिक क्यों न हो, वह पराजय की ओर अग्रसर हो जाती है। उन्होंने सुरक्षा बलों और भविष्य के रणनीतिकारों को यह समझाने का प्रयास किया कि युद्ध के मैदान में जीत केवल बंदूकों और मिसाइलों के दम पर नहीं मिलती, बल्कि उस अडिग विश्वास और इच्छाशक्ति से मिलती है जो हार मानने से इनकार कर देती है। उनके भाषण का मुख्य केंद्र बिंदु यही था कि मनोबल ही वह अंतिम तत्व है जो किसी भी संघर्ष के परिणाम को निर्धारित करता है।

सैन्य सामर्थ्य के आकलन की प्रचलित पद्धतियों पर चर्चा करते हुए एनएसए ने कहा कि अक्सर दुनिया भर के विशेषज्ञ किसी देश की शक्ति को उसकी टेक्नोलॉजी, परमाणु हथियारों, सैनिकों की संख्या और रक्षा बजट के आधार पर आंकते हैं। हालांकि, उन्होंने इस पारंपरिक सोच को चुनौती देते हुए कहा कि ये सभी चीजें महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन ये अधूरी हैं यदि इनके पीछे एक मजबूत इच्छाशक्ति न हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि सैन्य ताकत में कई जटिल पहलू शामिल होते हैं, लेकिन इन सबका आधार 'मनोबल' ही होता है। डोभाल के अनुसार, युद्धों के इतिहास में सबसे बड़ी रणनीतिक भूलें तब हुई हैं, जब किसी आक्रामक राष्ट्र ने सामने वाले राष्ट्र के लोगों की आंतरिक शक्ति और उनके मनोबल का गलत आकलन किया। यह एक ऐसा अदृश्य कारक है जिसे किसी भी सुपर कंप्यूटर द्वारा नहीं मापा जा सकता, लेकिन यह युद्ध के मैदान में सबसे निर्णायक भूमिका निभाता है।

ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात को प्रमाणित करते हुए अजीत डोभाल ने विश्व की महाशक्तियों के सैन्य अभियानों का विश्लेषण किया। उन्होंने विशेष रूप से रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) के अफगानिस्तान अभियान और अमेरिका के वियतनाम तथा अफगानिस्तान युद्धों का जिक्र किया। डोभाल ने इस तथ्य को सामने रखा कि तकनीकी श्रेष्ठता, असीमित संसाधन और दुनिया की सबसे आधुनिक सैन्य मशीनरी होने के बावजूद इन महाशक्तियों को अंततः पीछे हटना पड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका को वियतनाम में या रूस को अफगानिस्तान में हार इसलिए नहीं मिली कि उनके पास हथियारों की कमी थी, बल्कि इसलिए मिली क्योंकि वहां के स्थानीय लोगों में अपने राष्ट्र और अपनी मिट्टी के प्रति जो लगाव और प्रतिबद्धता थी, उसका मुकाबला करना नामुमकिन था। यह उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि राष्ट्रवाद और अपने देश के प्रति समर्पण वह कवच है जिसे कोई भी अत्याधुनिक मिसाइल नहीं भेद सकती। युद्ध के मैदान में हार और जीत के बीच का अंतर अक्सर उस 'मानसिक दृढ़ता' में छिपा होता है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी एक सैनिक और नागरिक को डटे रहने की प्रेरणा देती है। जब तक किसी समाज के भीतर अपने अस्तित्व की रक्षा का जज्बा कायम है, उसे वैश्विक ताकतें भी परास्त नहीं कर सकतीं।

डोभाल ने आगे कहा कि अफगानिस्तान में अमेरिका के लंबे समय तक टिके रहने के बावजूद वह अपने मूल मकसदों को हासिल नहीं कर सका। इसका मुख्य कारण संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मानसिक धरातल पर स्थानीय लोगों की प्रतिरोध क्षमता का गलत अनुमान लगाना था। उन्होंने वर्तमान सुरक्षा परिदृश्य में शिक्षा और अनुसंधान के महत्व को जोड़ते हुए कहा कि राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान केवल डिग्री देने के केंद्र नहीं होने चाहिए, बल्कि इन्हें ऐसे योद्धा और रणनीतिकार तैयार करने चाहिए जो मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) की बारीकियों को समझ सकें। उन्होंने स्नातकों को प्रेरित किया कि वे केवल तकनीकी ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक शक्ति और जनमानस के जुड़ाव को समझने की दिशा में भी कार्य करें। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस बात को बार-बार दोहराया कि मनोबल का होना केवल सैनिकों के लिए ही नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक के लिए अनिवार्य है। उनके अनुसार, एक राष्ट्र तब तक सुरक्षित है जब तक उसके लोगों में राष्ट्रीय गौरव की भावना प्रबल है। उन्होंने युद्धों में होने वाली गलतियों को रेखांकित करते हुए कहा कि जब कोई शत्रु राष्ट्र यह समझ लेता है कि वह किसी देश की जनता को डरा सकता है या उन्हें मानसिक रूप से विचलित कर सकता है, तभी वह हमला करने का साहस जुटाता है। इसलिए, राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे प्रथम और अंतिम घेरा जनता का मनोबल ही होता है। यदि राष्ट्र के लोगों में अपनी संस्कृति और सीमाओं के प्रति अटूट लगाव है, तो वह देश किसी भी संकट से उबरने की क्षमता रखता है।

तकनीकी प्रगति और आधुनिक युद्ध प्रणालियों के युग में भी मानवीय तत्व की प्रधानता को उन्होंने सर्वोपरि माना। डोभाल ने कहा कि एआई (AI), ड्रोन टेक्नोलॉजी और साइबर युद्ध के इस दौर में भी वह इंसान ही है जो इन हथियारों का इस्तेमाल करता है और वह इंसान ही है जो इनके खिलाफ खड़ा होता है। यदि संचालित करने वाले या रक्षा करने वाले व्यक्ति का मन कमजोर है, तो सबसे महंगे हथियार भी धातु के बेकार टुकड़ों के समान हैं। उन्होंने रूस और अमेरिका जैसे देशों के अनुभवों से सीख लेने की सलाह देते हुए कहा कि भारत को अपनी सुरक्षा नीतियों में न केवल रक्षात्मक उपकरणों को शामिल करना चाहिए, बल्कि राष्ट्र की आंतरिक शक्ति और नागरिकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली शिक्षा और संस्कृति को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। दीक्षांत समारोह के अंत में अजीत डोभाल ने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाली पीढ़ी इन सामरिक पाठों को आत्मसात करेगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के माध्यम से भारत एक ऐसी सुरक्षा पारिस्थितिकी (Security Ecosystem) विकसित कर रहा है, जहाँ कौशल और राष्ट्रीयता का संगम होगा। उन्होंने समापन करते हुए पुनः इस बात पर बल दिया कि युद्ध जीतने के लिए हथियारों का भंडार पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस अजेय मनोबल का होना जरूरी है जो किसी भी महाशक्ति के दबाव में झुकने को तैयार न हो। उनके इस संबोधन को देश की भावी सुरक्षा नीतियों के एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखा जा रहा है, जो भौतिक संसाधनों से ऊपर उठकर राष्ट्र की आत्मा और उसके संकल्प को सुरक्षा का आधार मानता है।

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