महिला आरक्षण- 2029 का चुनावी रोडमैप: लोकसभा सीटों में विस्तार और महिला कोटा पर बंटा विपक्ष, क्या बनेगा सर्वसम्मति का रास्ता?
भारत की संसदीय यात्रा में महिला आरक्षण एक ऐसा विषय रहा है जिसने दशकों तक विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक संघर्ष और कूटनीतिक
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम और राजनीति: महिला आरक्षण पर संसद में महासंग्राम और विपक्षी चुनौती
- संसद में शक्ति परीक्षण: मोदी सरकार के महिला आरक्षण संशोधन बिल पर विपक्ष के कड़े तेवर और वोटिंग का गणित
भारत की संसदीय यात्रा में महिला आरक्षण एक ऐसा विषय रहा है जिसने दशकों तक विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक संघर्ष और कूटनीतिक दांव-पेच देखे हैं। वर्ष 2026 के अप्रैल माह में एक बार फिर यह मुद्दा केंद्र की राजनीति के केंद्र में आ गया है, जब मोदी सरकार ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया। इस नए विधायी कदम का प्राथमिक उद्देश्य उन तकनीकी बाधाओं को दूर करना है जो 2023 में पारित मूल कानून के क्रियान्वयन में देरी का कारण बन रही थीं। वर्तमान परिदृश्य में सरकार की मंशा 2029 के लोकसभा चुनाव तक महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की है। हालांकि, इस नेक इरादे के पीछे छिपी परिसीमन (Delimitation) और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने की योजना ने विपक्षी खेमे में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिससे सदन के भीतर का तापमान काफी बढ़ गया है। संसद के विशेष सत्र के पहले ही दिन जब कानून मंत्री ने संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, तो सदन में समर्थन और विरोध के स्पष्ट स्वर सुनाई दिए। शुरुआती वोटिंग प्रक्रिया के दौरान सरकार को 251 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हुआ, जबकि 185 सदस्यों ने इसके विरोध में मतदान किया। यह मतदान प्रक्रिया केवल विधेयक को पेश करने के संदर्भ में थी, लेकिन इसने स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को वॉकओवर देने के मूड में नहीं है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि आरक्षण को वास्तविक रूप देने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण और सीटों का विस्तार अनिवार्य है, ताकि किसी भी मौजूदा सदस्य के प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुँचाए बिना महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। दूसरी ओर, सरकार के इस कदम को विपक्ष ने एक कूटनीतिक जाल करार दिया है, जिसमें महिला सशक्तिकरण की आड़ में राजनीतिक हितों को साधने का प्रयास देखा जा रहा है।
विपक्षी दलों की मुख्य चिंता महिला आरक्षण के सिद्धांत से नहीं, बल्कि इसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया से जुड़ी है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और डीएमके जैसे प्रमुख दलों ने इस बात पर आपत्ति जताई है कि आरक्षण को परिसीमन और जनगणना के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है। विपक्ष का दावा है कि सरकार पिछले दरवाजे से परिसीमन की प्रक्रिया को थोपना चाहती है, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। विपक्षी नेताओं ने सदन में तर्क दिया कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को अधिकार देना चाहती है, तो इसे वर्तमान 543 सीटों पर ही तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए। जनगणना में देरी और 2011 के आंकड़ों के आधार पर सीटों के विस्तार की योजना को लेकर कई दलों ने इसे संघीय ढांचे पर प्रहार बताया है। सरकार के नए प्रस्ताव के अनुसार, लोकसभा की कुल सीटों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 की जा सकती है। इसमें से लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यह विस्तार 1976 के बाद से लोकसभा की संख्या में होने वाला सबसे बड़ा बदलाव होगा। इस विधायी प्रक्रिया के बीच 'इनसाइड कोटे' या 'ओबीसी कोटे' की मांग ने भी फिर से जोर पकड़ लिया है। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे क्षेत्रीय दलों का रुख इस पर अत्यंत कड़ा है। उनका मानना है कि बिना पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण के, यह कानून केवल उच्च वर्ग की महिलाओं तक सीमित रह जाएगा। इन दलों ने मांग की है कि 33 प्रतिशत कोटे के भीतर ही अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान किए जाएं। सरकार ने इस मांग पर फिलहाल कोई संवैधानिक आश्वासन नहीं दिया है, जिससे इन दलों की नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही है। सदन में हुई बहस के दौरान यह स्पष्ट दिखा कि कई दल महिला आरक्षण का समर्थन तो करना चाहते हैं लेकिन अपने पारंपरिक वोट बैंक और सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों, विशेष रूप से डीएमके ने इस विधेयक का विरोध करने के लिए अनोखा तरीका अपनाया। उनके सदस्य संसद में काली पट्टी बांधकर और विरोध स्वरूप काले कपड़ों में नजर आए। उनका मानना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का विस्तार उन राज्यों के लिए नुकसानदेह होगा जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन किया है। उत्तर भारत की बढ़ती आबादी के कारण सीटों का बड़ा हिस्सा वहां चला जाएगा, जिससे संसद में दक्षिण भारत की आवाज कमजोर हो सकती है। यह क्षेत्रीय असंतुलन का डर महिला आरक्षण के महान उद्देश्य पर भारी पड़ता दिख रहा है। सत्ता पक्ष के मंत्रियों ने हालांकि यह आश्वासन दिया है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी होगी और किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं किया जाएगा। सरकार की रणनीति इस बार बेहद स्पष्ट और आक्रामक है। गृह मंत्री और कानून मंत्री ने स्पष्ट किया है कि 2027 की जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसमें जातिगत गणना का भी ध्यान रखा जाएगा। सरकार का तर्क है कि परिसीमन के बिना आरक्षण लागू करना तकनीकी और कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वे वर्षों से इस विधेयक को लटकाते रहे हैं और अब जब सरकार इसे धरातल पर उतारने की कोशिश कर रही है, तो वे नए बहाने ढूंढ रहे हैं। बीजेपी ने अपने सांसदों को तीन लाइन का व्हिप जारी कर सदन में अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित की है, जो इस बात का संकेत है कि सरकार इसे हर हाल में पास कराने के लिए संकल्पित है। संसद के भीतर का माहौल यह बता रहा है कि आने वाले दिनों में जब इस पर विस्तृत चर्चा और अंतिम वोटिंग होगी, तो यह एक ऐतिहासिक विधायी युद्ध में तब्दील हो जाएगा।
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