विपक्ष ने लगाया 'लोगों की निजी जानकारी पर नज़र रखने' का आरोप, 'संचार साथी' ऐप को लेकर सरकार पर निशाना साधा। 

भारत सरकार के 'संचार साथी' ऐप को सभी नए स्मार्टफोन्स पर पूर्व-स्थापित करने के निर्देश ने राजनीतिक विवाद को हवा दे

Dec 2, 2025 - 13:03
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विपक्ष ने लगाया 'लोगों की निजी जानकारी पर नज़र रखने' का आरोप, 'संचार साथी' ऐप को लेकर सरकार पर निशाना साधा। 
विपक्ष ने लगाया 'लोगों की निजी जानकारी पर नज़र रखने' का आरोप, 'संचार साथी' ऐप को लेकर सरकार पर निशाना साधा। 

भारत सरकार के 'संचार साथी' ऐप को सभी नए स्मार्टफोन्स पर पूर्व-स्थापित करने के निर्देश ने राजनीतिक विवाद को हवा दे दी है, जहां विपक्ष ने इसे लोगों की निजी जानकारी पर नजर रखने का माध्यम बताते हुए संविधान विरोधी करार दिया है। दूरसंचार विभाग द्वारा 28 नवंबर 2025 को जारी आदेश के अनुसार, सभी मोबाइल हैंडसेट निर्माताओं और आयातकों को 90 दिनों के भीतर ऐप को हर नए डिवाइस पर इंस्टॉल करना होगा, और यह ऐप उपयोगकर्ताओं द्वारा हटाया या अक्षम नहीं किया जा सकेगा। यह कदम टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी नियमों 2024 के तहत लिया गया है, जिसका उद्देश्य नकली आईएमईआई नंबरों से उत्पन्न साइबर खतरे को रोकना बताया जा रहा है। विपक्षी दलों ने इसे 'बिग ब्रदर' निगरानी का नया रूप करार देते हुए तत्काल वापसी की मांग की है, जबकि सरकार ने इसे नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया है। ऐप की अनिवार्यता से स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं के बीच गोपनीयता चिंताएं बढ़ गई हैं, क्योंकि यह डिवाइस पहचानकर्ताओं, सिम जानकारी और टेलीकॉम डेटा तक गहन पहुंच की मांग करता है।

संचार साथी पहल की शुरुआत मई 2023 में वेब पोर्टल के रूप में हुई थी, जो दूरसंचार विभाग की नागरिक-केंद्रित योजना के तहत शुरू की गई। इसका मुख्य लक्ष्य मोबाइल उपयोगकर्ताओं को सशक्त बनाना, उनकी सुरक्षा मजबूत करना और सरकारी पहलों के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। जनवरी 2024 में एंड्रॉयड और आईओएस दोनों प्लेटफॉर्म्स के लिए मोबाइल ऐप लॉन्च किया गया, जो उपयोगकर्ताओं को फ्रॉड कॉल्स, संदेशों और चोरी हुए फोन्स की रिपोर्टिंग में आसानी प्रदान करता है। ऐप के माध्यम से उपयोगकर्ता अपने नाम पर रजिस्टर्ड मोबाइल कनेक्शन्स की जांच कर सकते हैं, जहां एक व्यक्ति अधिकतम 9 कनेक्शन ही ले सकता है। जम्मू-कश्मीर, असम और पूर्वोत्तर राज्यों में यह सीमा 6 है। ऐप की 'चक्षु' सुविधा संदिग्ध फ्रॉड संचार की रिपोर्टिंग की अनुमति देती है, जैसे कि बैंकिंग, निवेश या सरकारी नकल से जुड़े कॉल्स या एसएमएस। इसके अलावा, उपयोगकर्ता खोए या चोरी फोन्स को सभी टेलीकॉम नेटवर्क्स पर ब्लॉक करवा सकते हैं, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियां डिवाइस का पता लगा सकें।

ऐप की कार्यक्षमता को समझने के लिए इसके प्रमुख फीचर्स पर नजर डालें। 'नो यूअर मोबाइल' विकल्प आईएमईआई नंबर के माध्यम से हैंडसेट की प्रामाणिकता सत्यापित करता है, जो उपयोगकर्ताओं को नकली डिवाइस खरीदने से बचाता है। रिपोर्टिंग प्रक्रिया सरल है: उपयोगकर्ता ऐप डाउनलोड करने के बाद होम स्क्रीन पर पहुंचते हैं, जहां रजिस्ट्रेशन के लिए 14522 पर एसएमएस भेजना पड़ता है। ऐप को कॉल और एसएमएस लॉग्स, कैमरा एक्सेस, नेटवर्क स्टेटस जैसी अनुमतियां लेनी पड़ती हैं, ताकि संदिग्ध संचार को ऑटो-पॉपुलेट किया जा सके। अंतरराष्ट्रीय कॉल्स जो भारतीय नंबर (+91) दिखाती हैं, उनकी रिपोर्टिंग भी संभव है, जो अवैध टेलीकॉम सेटअप के खिलाफ कार्रवाई में मदद करती है। वेब पोर्टल www.sancharsaathi.gov.in पर भी ये सेवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन ऐप मोबाइल उपयोगकर्ताओं के लिए अधिक सुविधाजनक बनाया गया। ऐप ने अब तक 50 लाख से अधिक डाउनलोड हासिल किए हैं, और इसके जरिए 42.14 लाख चोरी फोन्स ब्लॉक किए गए, जबकि 26.11 लाख डिवाइस ट्रेस हो चुके हैं।

सरकार के इस निर्देश का उद्देश्य टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी को मजबूत करना है, जहां डुप्लिकेट या स्पूफ्ड आईएमईआई नंबरों से साइबर अपराध और नेटवर्क दुरुपयोग बढ़ रहा है। आदेश में कहा गया है कि 90 दिनों के बाद, मार्च 2026 से सभी नए फोन्स में ऐप पूर्व-स्थापित होगा, और पहले से बाजार में मौजूद डिवाइसेज पर सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए इंस्टॉल किया जाएगा। निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐप पहली सेटअप के दौरान स्पष्ट रूप से दिखे और उसके फंक्शनलिटी पर कोई प्रतिबंध न लगे। यह कदम उन उपयोगकर्ताओं को बचाने के लिए है जो नकली हैंडसेट खरीद लेते हैं, जिससे वे अपराध में सहभागी बन जाते हैं। संचार मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ऐप टेलीकॉम संसाधनों के संदिग्ध दुरुपयोग की आसान रिपोर्टिंग सक्षम बनाता है, और फाइनेंशियल फ्रॉड्स तथा साइबर क्राइम रोकने में सहायक है। पहले से ब्लैकलिस्ट आईएमईआई चेक करने की सुविधा भी ऐप के जरिए उपलब्ध है।

इस निर्देश ने स्मार्टफोन उद्योग में चिंताएं पैदा कर दी हैं, क्योंकि यह सभी प्रमुख ब्रांड्स जैसे एप्पल, सैमसंग, गूगल, मोटोरोला, शाओमी, ओप्पो और वीवो को प्रभावित करता है। कंपनियों को 120 दिनों में अनुपालन रिपोर्ट जमा करनी होगी, और आयातित डिवाइसेज पर भी यह लागू होगा। उद्योग स्रोतों के अनुसार, सरकार ने इस आदेश से पहले निर्माताओं से परामर्श नहीं लिया, जो अनुपालन में चुनौतियां पैदा कर सकता है। एप्पल जैसी कंपनियां पहले भी सरकारी ऐप्स के लिए अनुमतियों पर सवाल उठा चुकी हैं, जैसे 2017 में स्पैम-रिपोर्टिंग ऐप के मामले में। निर्देश के अनुसार, ऐप को हटाने योग्य न बनाना गोपनीयता नियमों के विपरीत माना जा रहा है, जहां उपयोगकर्ता डेटा संरक्षण पर जोर दिया जाता है। निर्माताओं को सॉफ्टवेयर अपडेट के जरिए पुराने डिवाइसेज पर ऐप पुश करना होगा, जो उपयोगकर्ता अनुभव को प्रभावित कर सकता है।

विपक्ष ने इस कदम को निजता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने इसे 'संविधान विरोधी' करार देते हुए कहा कि यह एक डिस्टोपियन टूल है जो हर भारतीय की निगरानी करेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐप हर आंदोलन, इंटरैक्शन और व्यक्तिगत निर्णय को ट्रैक करेगा, और इसे पेगासस तथा वीपीएन प्रतिबंधों की श्रृंखला का हिस्सा बताया। वेणुगोपाल ने मांग की कि निर्देश तत्काल वापस लिया जाए, क्योंकि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इसे 'बिग बॉस निगरानी का क्षण' कहा, और चेतावनी दी कि व्यक्तिगत फोन्स में घुसपैठ के ऐसे तरीकों का विरोध किया जाएगा। उन्होंने कहा कि आईटी मंत्रालय को शिकायत निवारण प्रणालियों के बजाय निगरानी उपकरण बनाने से बचना चाहिए।

आम आदमी पार्टी के सांसद जॉन ब्रिट्टास ने व्यंग्य किया कि ऐप न होने पर मतदाता सूची से हटाने की योजना है, और इसे पेगासस का सस्ता विकल्प बताया। शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने इसे 'तानाशाही' का रूप कहा। कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने इसे निजता पर हमला माना। विपक्ष का मत है कि ऐप की अनिवार्यता से बैकग्राउंड डेटा संग्रह संभव हो जाएगा, बिना उपयोगकर्ता सहमति के। डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता निखिल पहवा ने इसे भारत में पहली बार अपरिमovable सरकारी ऐप बताया, जो रूस के मैक्स मैसेंजर जैसा है। उन्होंने कहा कि यह उपयोगकर्ता अधिकारों का उल्लंघन है। विपक्ष ने संसद के शीतकालीन सत्र में इस मुद्दे को उठाने की योजना बनाई है, जहां डिजिटल अधिकार संगठनों और कुछ सहयोगी दलों ने भी असंतोष जताया है।

गोपनीयता चिंताओं का केंद्र ऐप की पहुंच है, जो कॉल लॉग्स, मैसेजेस, लोकेशन और नेटवर्क डेटा तक फैल सकती है। आलोचकों का कहना है कि गैर-हटाने योग्य ऐप से लगातार डेटा संग्रह का खतरा है, जो सरकारी अतिरेक का रूप ले सकता है। सरकार ने जवाब में कहा कि ऐप केवल रिपोर्टिंग के लिए डेटा उपयोग करता है, और साइबर खतरे से सुरक्षा प्रदान करता है। संचार मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह पहल टेलीकॉम संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए है, और उपयोगकर्ताओं को फ्रॉड से बचाती है। हालांकि, विपक्ष ने इसे वैध एंटी-फ्रॉड टूल को मास-सर्विलांस मॉन्स्टर में बदलने का प्रयास बताया।

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