औद्योगिक शांति की कीमत पर उद्यमियों की कमर तोड़ने वाला फैसला: नोएडा के MSME बोले- ‘बिना सब्सिडी डबल ओवरटाइम देना असंभव’
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक गलियारों में हाल ही में हुई श्रमिक हिंसा के बाद सरकार द्वारा लिए गए 'डबल ओवरटाइम' के फैसले ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। श्रमिकों के आक्रोश को शांत करने के लिए प्रशासन ने ओवरटाइम की दर दोगुनी करने और वेतन विसंगतियों को दूर करने का जो निर्णय लिया था, अब उस पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र के उद्यमियों ने कड़ा विरोध जताया है।
- पलायन की राह पर नोएडा के उद्योग: ओवरटाइम के नए नियमों से उत्पादन लागत में भारी बढ़ोतरी, उद्यमियों ने दी फैक्ट्रियां बंद करने की चेतावनी
- श्रम सुधार या आर्थिक बोझ? सरकार के यू-टर्न से नोएडा-ग्रेटर नोएडा के उद्यमी आक्रोशित, प्रशासन से राहत और वित्तीय सहायता की मांग
उत्तर प्रदेश के नोएडा में 13 अप्रैल 2026 को भड़की श्रमिक हिंसा ने जिला प्रशासन को हिलाकर रख दिया था। हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरे श्रमिकों के उग्र प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से कई बड़े सुधारों की घोषणा की थी। इनमें सबसे प्रमुख फैसला श्रमिकों को किए जाने वाले ओवरटाइम के भुगतान को मानक दर से दोगुना करना था। इसके साथ ही यह भी अनिवार्य किया गया कि सभी श्रमिकों को सप्ताह में एक दिन सवैतनिक अवकाश दिया जाएगा और यदि रविवार को काम लिया जाता है, तो उसके लिए भी दोगुनी दिहाड़ी देनी होगी। इन घोषणाओं का उद्देश्य श्रमिकों के असंतोष को कम करना और क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को बहाल करना था। हालांकि, अब यही निर्णय उद्योगों और सरकार के बीच टकराव का नया कारण बन गया है।
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के MSME उद्यमियों ने इस फैसले पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए इसे 'एकतरफा' करार दिया है। उद्यमियों का तर्क है कि हाल ही में न्यूनतम वेतन में हुई ₹3000 की बढ़ोतरी के बाद, बोनस और ईएसआई जैसे अन्य अनिवार्य शुल्कों को मिलाकर एक श्रमिक पर प्रभावी खर्च लगभग ₹6000 तक बढ़ गया है। ऐसे में ओवरटाइम की दर दोगुनी करने से उत्पादन लागत इतनी अधिक हो जाएगी कि अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में प्रतिस्पर्धा करना उनके लिए असंभव हो जाएगा। उद्यमियों ने स्पष्ट किया है कि यदि उन पर यह आर्थिक बोझ जबरन डाला गया, तो वे अपनी इकाइयां नोएडा से हटाकर पड़ोसी राज्यों जैसे राजस्थान या मध्य प्रदेश में ले जाने के लिए मजबूर होंगे, जहाँ श्रम कानून और लागत तुलनात्मक रूप से अधिक अनुकूल हैं।
हिंसा के बाद के कड़े नियम
13 अप्रैल की हिंसा के बाद प्रशासन ने न केवल वेतन और ओवरटाइम के नियम कड़े किए हैं, बल्कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सभी फैक्ट्रियों को हर महीने की 10 तारीख तक वेतन पर्ची (Salary Slip) के साथ पूरा भुगतान करने और महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष समितियों के गठन का भी निर्देश दिया है। उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर ₹1 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
औद्योगिक संगठनों का कहना है कि सरकार ने हिंसा के दबाव में आकर रातों-रात यह फैसला लिया, जिससे उद्योगों की व्यवहार्यता (Viability) संकट में पड़ गई है। उद्यमियों के अनुसार, नोएडा का औद्योगिक बेल्ट पहले से ही बढ़ती बिजली दरों, परिवहन लागत और कच्चे माल की महंगाई से जूझ रहा है। ऐसे में बिना किसी वित्तीय राहत या सब्सिडी के ओवरटाइम को दोगुना करना छोटे उद्योगों के लिए 'मौत की घंटी' साबित हो सकता है। शनिवार को ग्रेटर नोएडा प्रेस क्लब में हुई एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्यमियों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया या उन्हें करों में छूट नहीं दी, तो वे जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे। इस विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पड़ोसी राज्यों से तुलना भी है। नोएडा के श्रमिक संगठनों का तर्क था कि हरियाणा के मानेसर और गुरुग्राम में न्यूनतम वेतन उत्तर प्रदेश की तुलना में लगभग 35 प्रतिशत अधिक है, जिसके कारण यहाँ असंतोष पनपा। श्रमिकों के इसी दबाव को कम करने के लिए प्रशासन ने त्वरित सुधार किए, लेकिन अब उद्यमियों का कहना है कि वे हरियाणा की तरह उच्च वेतन देने की स्थिति में तभी आ सकते हैं जब उन्हें भी वहां की तरह बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापारिक सुविधाएं मिलें। उद्यमियों का आरोप है कि नौकरशाही केवल नियमों को थोपना जानती है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि लागत बढ़ने से कई निर्यात इकाइयां बंद होने के कगार पर हैं।
नोएडा प्रशासन अब एक तरफ श्रमिकों की मांगों और दूसरी तरफ उद्योगों के विरोध के बीच फंस गया है। जिला प्रशासन ने हालांकि श्रमिकों की शिकायतों के निवारण के लिए एक विशेष कंट्रोल रूम और हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं, लेकिन उद्यमियों की नाराजगी दूर करने के लिए अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। पुलिस आयुक्त और जिलाधिकारी का कहना है कि औद्योगिक शांति बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है और वे दोनों पक्षों के बीच समन्वय बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, उद्यमियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे नियमों का पालन करने के इच्छुक हैं, लेकिन सरकार को इस वित्तीय बोझ को साझा करने के लिए राहत पैकेज या बिजली दरों में कटौती जैसे विकल्प देने चाहिए। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस गतिरोध को जल्दी हल नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर क्षेत्र के रोजगार और आर्थिक विकास पर पड़ेगा। नोएडा और ग्रेटर नोएडा भारत के सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण केंद्रों में से एक हैं, और यहाँ से उद्योगों का पलायन राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका होगा। MSME क्षेत्र ही सबसे अधिक रोजगार पैदा करता है, और यदि छोटे कारखाने बंद होते हैं, तो बेरोजगारी की समस्या और विकराल हो सकती है। सरकार को अब एक ऐसी संतुलनकारी नीति अपनानी होगी जो श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन प्रदान करे और साथ ही उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बने रहने में मदद करे।
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