SIR Update: यूपी में 2.89 करोड़ और गुजरात में 73 लाख नामों की छंटनी, जानिए आपके राज्य का क्या है हाल।
भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया ने देश के चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया
- उत्तर प्रदेश और गुजरात से कटे करोड़ों नाम, 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हड़कंप
- लोकतंत्र की नई फेहरिस्त: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची में ऐतिहासिक बदलाव, करोड़ों लोग चुनावी प्रक्रिया से हुए बाहर
भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा संचालित 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) प्रक्रिया ने देश के चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। हाल ही में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत देश के 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों (UT) की मतदाता सूची से कुल 6.56 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। यह कुल पंजीकृत मतदाताओं का लगभग 13 प्रतिशत हिस्सा है। इस महा-सफाई अभियान का सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में देखने को मिला है, जहाँ नामों की छंटनी की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है। निर्वाचन आयोग का तर्क है कि यह कदम मतदाता सूची को पारदर्शी, त्रुटिमुक्त और वास्तविक बनाने के लिए उठाया गया है, ताकि 'फर्जी मतदान' की गुंजाइश को जड़ से खत्म किया जा सके। उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा चुनावी राज्य है, वहाँ से 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से गायब हो गए हैं। यह राज्य की कुल मतदाता संख्या का लगभग 18.7 प्रतिशत है। यह किसी भी राज्य के लिए नामों की छंटनी का सबसे बड़ा आंकड़ा है। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, इन नामों को हटाने के पीछे मुख्य रूप से चार कारण रहे हैं—मतदाता की मृत्यु, स्थाई रूप से अन्यत्र प्रवास, एक से अधिक स्थानों पर पंजीकरण और अनट्रेसेबल (जिनका पता नहीं लग सका) होना। लखनऊ, कानपुर, गाजियाबाद और प्रयागराज जैसे बड़े शहरी केंद्रों में नामों के कटने की दर सबसे अधिक रही है, जहाँ आबादी की आवाजाही सबसे ज्यादा होती है।
गुजरात में भी इस पुनरीक्षण अभियान का बड़ा असर दिखाई दिया है। राज्य की पूर्ववर्ती मतदाता सूची में शामिल 5.08 करोड़ नामों में से लगभग 73.73 लाख नामों को अंतिम ड्राफ्ट रोल से हटा दिया गया है। गुजरात के निर्वाचन अधिकारियों द्वारा साझा किए गए डेटा के अनुसार, हटाए गए 73.73 लाख मतदाताओं में से लगभग 18.07 लाख मृत पाए गए, जबकि 40.25 लाख ऐसे थे जो गुजरात से बाहर प्रवास कर चुके थे। शेष नामों को डुप्लीकेशन और अन्य तकनीकी कारणों से हटाया गया है। इस भारी कटौती के बाद गुजरात में अब पंजीकृत मतदाताओं की संख्या घटकर 4.34 करोड़ रह गई है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले दो दशकों में मतदाता सूची में कितनी अशुद्धियां जमा हो चुकी थीं।
- प्रतिशत के मामले में अंडमान अव्वल
हालांकि पूर्ण संख्या (Absolute Numbers) के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है, लेकिन यदि प्रतिशत की दृष्टि से देखा जाए, तो केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह ने सभी को पीछे छोड़ दिया है। यहाँ मतदाता सूची से नामों के हटने की दर उत्तर प्रदेश से भी अधिक दर्ज की गई है। छोटे भौगोलिक क्षेत्र और सीमित जनसंख्या के कारण यहाँ सत्यापन प्रक्रिया अधिक सघन रही, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अपात्र नाम बाहर हो गए। इस व्यापक पुनरीक्षण प्रक्रिया की जद में केवल यूपी और गुजरात ही नहीं, बल्कि कुल 12 क्षेत्र (9 राज्य और 3 UT) शामिल रहे। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और गोवा जैसे राज्यों में भी लाखों नाम हटाए गए हैं। मध्य प्रदेश में लगभग 1.19 लाख मृत मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जबकि राजस्थान में भी 97 हजार से अधिक नामों की छंटनी की गई है। छत्तीसगढ़ में भी 38 हजार से ज्यादा नाम काटे गए हैं। निर्वाचन आयोग का कहना है कि 2002-2004 के बाद यह पहली बार है जब इतनी गहराई से घर-घर जाकर सत्यापन (Door-to-Door Verification) किया गया है, जिससे सूची का वास्तविक स्वरूप सामने आ सका है।
निर्वाचन आयोग की इस कार्रवाई ने राजनीतिक दलों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि नामों की छंटनी के दौरान 'चयनात्मक' रवैया अपनाया गया है और कई क्षेत्रों में गरीब व हाशिए के समुदायों के नाम बड़ी संख्या में हटा दिए गए हैं। हालांकि, आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि हर नाम को हटाने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन किया गया है और संबंधित व्यक्तियों को नोटिस भी जारी किए गए थे। आयोग ने अब उन लोगों के लिए 'फॉर्म-6' भरने की सुविधा दी है जिनके नाम गलत तरीके से कट गए हैं या जो नए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराना चाहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य आगामी आम चुनावों के लिए एक 'स्वच्छ' मतदाता सूची तैयार करना है। अधिकारियों के अनुसार, एक बड़ी संख्या उन मतदाताओं की थी जो एक से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में पंजीकृत थे। नई तकनीक और आधार लिंकेज की मदद से ऐसे 'डुप्लीकेट' मतदाताओं की पहचान आसान हो गई है। निर्वाचन आयोग का मानना है कि 6.56 करोड़ नामों का हटना किसी विवाद का विषय नहीं, बल्कि चुनावी सुधार की दिशा में एक बड़ी सफलता है। अब सबकी नजरें मार्च 2026 में आने वाली फाइनल वोटर लिस्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि पुनरीक्षण के बाद कितने नए मतदाता सूची में जुड़ पाते हैं।
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