मोमोज खाने से 10 साल की मासूम का लिवर हुआ फेल: याददाश्त खोने और लकवे जैसी स्थिति के बाद डॉक्टरों ने किया चमत्कार।
स्ट्रीट फूड का बढ़ता क्रेज और हाइजीन के साथ समझौता किस कदर जानलेवा साबित हो सकता है, इसका एक खौफनाक मामला सामने
- स्ट्रीट फूड बना जान का दुश्मन: मोमोज के कारण बच्ची के मस्तिष्क और लिवर पर हुआ घातक हमला, प्लाज्माफेरेसिस तकनीक से बचाई गई जान।
- स्वाद के चक्कर में दांव पर लगी जिंदगी: मोमोज खाने से गंभीर संक्रमण की शिकार हुई बच्ची, चलने-फिरने की शक्ति खोने के बाद वेंटिलेटर तक पहुंची नौबत।
स्ट्रीट फूड का बढ़ता क्रेज और हाइजीन के साथ समझौता किस कदर जानलेवा साबित हो सकता है, इसका एक खौफनाक मामला सामने आया है। एक 10 वर्षीय बच्ची को मोमोज खाने के बाद गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप उसका लिवर पूरी तरह फेल हो गया। मोमोज खाने के कुछ ही घंटों के भीतर बच्ची को उल्टी और पेट दर्द की शिकायत हुई, जिसे शुरुआत में सामान्य फूड पॉइजनिंग माना गया। हालांकि, स्थिति तब बिगड़ गई जब संक्रमण ने उसके लिवर पर हमला कर दिया और शरीर के अन्य अंगों ने भी काम करना बंद कर दिया। यह मामला उन लाखों लोगों के लिए एक गंभीर चेतावनी है जो बिना गुणवत्ता की जांच किए सड़कों पर बिकने वाले मोमोज और उनकी तीखी चटनी का सेवन करते हैं। बच्ची की स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि संक्रमण लिवर से होता हुआ उसके मस्तिष्क तक पहुंच गया, जिसे चिकित्सा विज्ञान में 'हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी' कहा जाता है। इस स्थिति के कारण बच्ची ने अपनी याददाश्त खो दी और वह अपने माता-पिता तक को पहचानने में असमर्थ हो गई। इसके साथ ही, उसके नर्वस सिस्टम पर भी बुरा असर पड़ा, जिससे उसके अंगों ने काम करना बंद कर दिया और वह चलने-फिरने में भी लाचार हो गई। डॉक्टरों के अनुसार, मोमोज में इस्तेमाल किया गया दूषित मैदा, सड़ी हुई सब्जियां या चटनी में मौजूद बैक्टीरिया ने रक्तप्रवाह में मिलकर 'सेप्सिस' पैदा कर दिया था, जिसने सीधे लिवर की कोशिकाओं को नष्ट करना शुरू कर दिया।
अस्पताल में भर्ती होने के बाद बच्ची की हालत लगातार गिरती जा रही थी और उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखना पड़ा। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, उसके शरीर में अमोनिया का स्तर काफी बढ़ गया था, जो आमतौर पर लिवर फेल होने पर होता है और सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करता है। बच्ची के बचने की संभावना बहुत कम बताई जा रही थी, क्योंकि उसका शरीर किसी भी दवा का असर नहीं दिखा रहा था। लिवर ट्रांसप्लांट एक विकल्प था, लेकिन बच्ची की नाजुक स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने एक अन्य आधुनिक चिकित्सा पद्धति 'प्लाज्माफेरेसिस' (Plasmapheresis) का सहारा लेने का कठिन निर्णय लिया। प्लाज्माफेरेसिस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें रोगी के शरीर से दूषित प्लाज्मा को निकाला जाता है और उसकी जगह स्वस्थ प्लाज्मा या एल्ब्यूमिन डाला जाता है। यह प्रक्रिया रक्त से उन जहरीले तत्वों और एंटीबॉडीज को साफ कर देती है जो लिवर या अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा रहे होते हैं। लिवर फेलियर के मामलों में यह तकनीक तब अपनाई जाती है जब लिवर अपने आप जहर को साफ करने में सक्षम नहीं रहता। डॉक्टरों की टीम ने बच्ची के शरीर से कुल पांच बार प्लाज्मा बदला। इस जटिल प्रक्रिया के बाद धीरे-धीरे चमत्कारी परिणाम सामने आने लगे। तीसरे सत्र के बाद बच्ची की याददाश्त लौटने लगी और उसने अपनी आंखें खोलीं। चौथे सत्र तक उसके लिवर के एंजाइम्स बेहतर होने लगे और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकल गए। प्लाज्माफेरेसिस तकनीक ने उसके लिवर को रिकवर होने का समय दिया और उसे नया जीवन प्रदान किया। अस्पताल में कई दिनों तक मौत से जंग लड़ने के बाद, वह अब बोलने और थोड़ा-बहुत हिलने-डुलने में सक्षम हो पाई है, जिसे डॉक्टर एक बड़ी चिकित्सा सफलता मान रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोमोज जैसे खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाला 'अजीनोमोटो' (Monosodium Glutamate) और मोमोज की चटनी में इस्तेमाल होने वाली अत्यधिक लाल मिर्च और सिंथेटिक रंग पाचन तंत्र के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। अक्सर स्ट्रीट वेंडर्स मोमोज को लंबे समय तक स्टोर करने के लिए अनहाइजीनिक तरीकों का उपयोग करते हैं, जिससे उनमें 'साल्मोनेला' या 'ई-कोलाई' जैसे बैक्टीरिया पनप जाते हैं। ये बैक्टीरिया लिवर में गंभीर सूजन पैदा कर सकते हैं, जिससे लिवर सिरोसिस या एक्यूट लिवर फेलियर जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं। बच्ची के मामले में भी दूषित भोजन ही इस पूरी बर्बादी का मूल कारण बना। इस घटना ने बाजार में बिकने वाले जंक फूड की गुणवत्ता पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मोमोज का बाहरी आवरण मैदे से बना होता है, जो पेट में जाकर चिपक जाता है और पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देता है। यदि इसके साथ परोसी जाने वाली चटनी बासी हो या उसमें खराब पानी का उपयोग किया गया हो, तो यह सीधे हेपेटाइटिस-ए या ई का कारण बन सकती है। स्वास्थ्य विभाग अक्सर ऐसे मामलों के बाद अभियान चलाता है, लेकिन आम जनता की जागरूकता ही इसका स्थाई समाधान है। बच्चों के मामले में सुरक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम वयस्कों की तुलना में कमजोर होता है।
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