साइलेंट किलर बना डायबिटीज: शरीर के इन महत्वपूर्ण अंगों को धीरे-धीरे खोखला कर रही है यह बीमारी।
भारत में स्वास्थ्य परिदृश्य पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है, लेकिन इस बदलाव के साथ कुछ ऐसी चुनौतियां भी आई हैं जिन्होंने चिकित्सा
- भारत में मधुमेह का संकट: 4 वर्षों में मरीजों की संख्या में 44% का भारी उछाल, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
- बदलती जीवनशैली और खानपान का खतरनाक परिणाम: देश में 10 करोड़ के पार पहुंची मधुमेह रोगियों की संख्या
भारत में स्वास्थ्य परिदृश्य पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है, लेकिन इस बदलाव के साथ कुछ ऐसी चुनौतियां भी आई हैं जिन्होंने चिकित्सा विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। हालिया चिकित्सा शोध और डेटा विश्लेषण से यह तथ्य सामने आया है कि भारत में मधुमेह यानी डायबिटीज के मरीजों की संख्या में पिछले चार वर्षों के दौरान लगभग 44% की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि उस गंभीर स्वास्थ्य संकट का संकेत है जिसकी ओर देश तेजी से बढ़ रहा है। वर्ष 2019 में जहां मधुमेह रोगियों की संख्या लगभग 7 करोड़ के आसपास थी, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 10 करोड़ के पार पहुंच गया है। इस वृद्धि ने भारत को दुनिया की 'डायबिटीज राजधानी' बनने की कगार पर खड़ा कर दिया है, जो भविष्य में हमारी स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ डाल सकता है।
मधुमेह के प्रसार के पीछे के कारणों का यदि विस्तार से विश्लेषण किया जाए, तो शहरीकरण और जीवनशैली में आए बदलाव सबसे बड़े कारक बनकर उभरे हैं। आधुनिक समय में शारीरिक गतिविधियों में आई कमी और डेस्क जॉब की बढ़ती संस्कृति ने मोटापे को जन्म दिया है, जो टाइप-2 डायबिटीज का सबसे प्रमुख जोखिम कारक है। इसके साथ ही, हमारे खानपान में कार्बोहाइड्रेट और वसा की अत्यधिक मात्रा, विशेष रूप से प्रसंस्कृत और जंक फूड का बढ़ता सेवन, शरीर में इंसुलिन के प्रतिरोध को बढ़ाता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि भारतीय आबादी में आनुवंशिक रूप से भी मधुमेह के प्रति संवेदनशीलता अधिक होती है, जिसके कारण कम उम्र में ही लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है जब तनाव और अनियमित नींद के पैटर्न इसमें शामिल हो जाते हैं।
डायबिटीज केवल रक्त शर्करा के स्तर के बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के लगभग हर महत्वपूर्ण अंग को गंभीर क्षति पहुंचाती है। मधुमेह का सबसे घातक प्रभाव हृदय और रक्त वाहिकाओं पर पड़ता है। लंबे समय तक रक्त में शर्करा का उच्च स्तर रहने से धमनियां कठोर हो जाती हैं और उनमें प्लाक जमने लगता है, जिससे रक्त प्रवाह बाधित होता है। यही कारण है कि मधुमेह के रोगियों में हृदय रोग, दिल का दौरा और स्ट्रोक का खतरा सामान्य व्यक्तियों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मधुमेह के कारण होने वाली अधिकांश मृत्यु का मुख्य कारण हृदय संबंधी जटिलताएं ही होती हैं। शरीर के इस सबसे महत्वपूर्ण अंग पर पड़ने वाला दबाव मरीज की जीवन प्रत्याशा को काफी हद तक कम कर देता है। चिकित्सा शोध के अनुसार, भारत में केवल मधुमेह के मरीज ही नहीं बढ़े हैं, बल्कि लगभग 13.6 करोड़ लोग 'प्री-डायबिटीज' की श्रेणी में आ चुके हैं। प्री-डायबिटीज वह अवस्था है जहां रक्त शर्करा का स्तर सामान्य से अधिक होता है लेकिन मधुमेह के स्तर तक नहीं पहुंचा होता। यदि इस चरण पर जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया, तो इनमें से अधिकांश लोग आने वाले वर्षों में पूर्ण मधुमेह के रोगी बन सकते हैं।
हृदय के बाद, मधुमेह का दूसरा सबसे बड़ा शिकार गुर्दे यानी किडनी बनते हैं। इस स्थिति को चिकित्सा भाषा में 'डायबिटिक नेफ्रोपैथी' कहा जाता है। हमारे गुर्दे रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को छानने के लिए सूक्ष्म रक्त वाहिकाओं का उपयोग करते हैं। उच्च रक्त शर्करा इन वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, जिससे गुर्दे अपनी छानने की क्षमता खोने लगते हैं। शुरुआत में इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते, लेकिन धीरे-धीरे यह 'क्रोनिक किडनी डिजीज' का रूप ले लेती है और अंततः गुर्दे पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। ऐसी स्थिति में मरीज को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता होती है। आंकड़ों के अनुसार, गुर्दे की विफलता के कुल मामलों में से एक बड़ा हिस्सा मधुमेह के रोगियों का ही होता है, जो इस बीमारी की भयावहता को दर्शाता है।
आंखों की रोशनी पर मधुमेह का प्रभाव एक और गंभीर चिंता का विषय है। 'डायबिटिक रेटिनोपैथी' नामक स्थिति में आंख के रेटिना की रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इससे दृष्टि धुंधली हो सकती है और यदि समय पर इलाज न किया जाए, तो यह पूर्ण अंधेपन का कारण भी बन सकता है। उच्च शर्करा स्तर आंखों के लेंस में सूजन पैदा कर सकता है, जिससे मोतियाबिंद और ग्लूकोमा जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। विडंबना यह है कि आंखों को होने वाला यह नुकसान अक्सर तब तक महसूस नहीं होता जब तक कि वह काफी गंभीर न हो जाए। इसलिए, मधुमेह के मरीजों के लिए नियमित रूप से आंखों की जांच कराना अनिवार्य माना जाता है ताकि किसी भी संभावित क्षति को प्रारंभिक चरण में ही पहचाना जा सके। तंत्रिका तंत्र यानी नर्वस सिस्टम भी मधुमेह के दुष्प्रभावों से अछूता नहीं है। मधुमेह के कारण होने वाली तंत्रिका क्षति को 'डायबिटिक न्यूरोपैथी' कहा जाता है। यह स्थिति अक्सर पैरों की नसों को प्रभावित करती है, जिससे मरीजों को पैरों में सुन्नपन, झुनझुनी, जलन या असहनीय दर्द महसूस होता है। जब पैर सुन्न हो जाते हैं, तो किसी छोटी चोट या छाले का पता नहीं चलता और उच्च रक्त शर्करा के कारण ये घाव जल्दी ठीक नहीं होते। आगे चलकर ये घाव गंभीर संक्रमण या गैंग्रीन में बदल सकते हैं, जिससे कई मामलों में अंग विच्छेदन यानी पैर काटने की नौबत तक आ जाती है। यह न केवल मरीज की शारीरिक क्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि उसे मानसिक और आर्थिक रूप से भी तोड़ देता है।
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