न्यूरालिंक की ब्रेन चिप- 20 साल से लकवाग्रस्त महिला ने सोचकर लिखा अपना नाम।

International News: एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने हाल ही में एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने विज्ञान और तकनीक की दुनिया में नया इतिहास रच ...

Jul 30, 2025 - 11:48
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न्यूरालिंक की ब्रेन चिप- 20 साल से लकवाग्रस्त महिला ने सोचकर लिखा अपना नाम।
न्यूरालिंक की ब्रेन चिप- 20 साल से लकवाग्रस्त महिला ने सोचकर लिखा अपना नाम।

एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने हाल ही में एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने विज्ञान और तकनीक की दुनिया में नया इतिहास रच दिया। अमेरिका की ऑड्रे क्रूज, जो पिछले 20 साल से लकवाग्रस्त थीं, ने न्यूरालिंक की ब्रेन चिप की मदद से केवल अपने दिमाग की शक्ति से कंप्यूटर पर अपना नाम लिखा और रंगीन चित्र बनाए। यह उपलब्धि इसलिए खास है, क्योंकि ऑड्रे दुनिया की पहली ऐसी महिला बन गई हैं, जिन्होंने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (बीसीआई) तकनीक का उपयोग कर बिना किसी शारीरिक गतिविधि के कंप्यूटर को नियंत्रित किया। इस खबर ने न केवल तकनीकी दुनिया में हलचल मचाई है, बल्कि लाखों लकवाग्रस्त लोगों के लिए नई उम्मीद भी जगाई है।

  • ऑड्रे क्रूज की कहानी

ऑड्रे क्रूज 16 साल की उम्र से लकवाग्रस्त थीं। पिछले 20 सालों से वह अपने शरीर को हिलाने-डुलाने में असमर्थ थीं। उनके लिए सामान्य काम, जैसे लिखना या कोई उपकरण इस्तेमाल करना, असंभव था। लेकिन न्यूरालिंक की ब्रेन चिप ने उनकी जिंदगी को बदल दिया। ऑड्रे ने न्यूरालिंक के प्राइम ट्रायल में हिस्सा लिया, जिसमें उनके मस्तिष्क के मोटर कॉर्टेक्स में एक छोटी सी चिप लगाई गई। इस चिप ने उनके दिमाग के संकेतों को पढ़कर उन्हें कंप्यूटर पर काम करने की क्षमता दी। ऑड्रे ने अपने दिमाग से कंप्यूटर कर्सर को नियंत्रित किया और न केवल अपना नाम "Audrey" लिखा, बल्कि दिल, चिड़िया और पिज्जा जैसे रंगीन चित्र भी बनाए।

ऑड्रे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी इस उपलब्धि को साझा करते हुए लिखा, "मैंने 20 साल बाद पहली बार अपना नाम लिखने की कोशिश की। मैं इस पर काम कर रही हूं।" उनकी इस पोस्ट ने दुनिया भर में लोगों का ध्यान खींचा। एलन मस्क ने भी इस उपलब्धि पर प्रतिक्रिया दी और X पर लिखा, "वह केवल सोचकर अपने कंप्यूटर को नियंत्रित कर रही हैं। ज्यादातर लोगों को यह समझ ही नहीं आता कि यह कितना अविश्वसनीय है।"

  • न्यूरालिंक क्या है?

न्यूरालिंक एक न्यूरोटेक्नोलॉजी कंपनी है, जिसकी स्थापना एलन मस्क ने 2016 में की थी। इसका मुख्य लक्ष्य मानव मस्तिष्क को डिजिटल उपकरणों से जोड़ना है, ताकि लोग अपने विचारों से ही कंप्यूटर, स्मार्टफोन या अन्य डिवाइस को नियंत्रित कर सकें। न्यूरालिंक की ब्रेन चिप, जिसे "द लिंक" नाम दिया गया है, एक सिक्के के आकार का उपकरण है। यह चिप मस्तिष्क के मोटर कॉर्टेक्स में सर्जरी के जरिए लगाई जाती है। मोटर कॉर्टेक्स वह हिस्सा है, जो शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इस चिप में 128 अति सूक्ष्म धागे (थ्रेड्स) होते हैं, जो मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को पढ़ते हैं और उन्हें वायरलेस तरीके से कंप्यूटर या अन्य डिवाइस तक भेजते हैं।

यह तकनीक विशेष रूप से उन लोगों के लिए बनाई गई है, जो लकवा, रीढ़ की हड्डी की चोट, या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के कारण अपने शरीर का उपयोग नहीं कर पाते। न्यूरालिंक का उद्देश्य ऐसे लोगों को डिजिटल दुनिया से जोड़ना है, ताकि वे स्वतंत्र रूप से काम कर सकें, जैसे कि टाइप करना, गेम खेलना, या इंटरनेट ब्राउज करना। भविष्य में, यह तकनीक सामान्य लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकती है, जैसे कि सोचकर कॉल करना या ईमेल भेजना।

  • ब्रेन चिप कैसे काम करती है?

न्यूरालिंक की ब्रेन चिप को मस्तिष्क में लगाने के लिए एक छोटी सर्जरी की जाती है। इस सर्जरी में खोपड़ी में एक छोटा छेद किया जाता है, और चिप को मोटर कॉर्टेक्स में सावधानीपूर्वक लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में एक खास रोबोट का उपयोग होता है, जो सूक्ष्म धागों को मस्तिष्क में सटीकता से डालता है। ये धागे मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से निकलने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को पढ़ते हैं। ये सिग्नल्स चिप के जरिए वायरलेस तरीके से किसी बाहरी डिवाइस, जैसे कंप्यूटर या स्मार्टफोन, तक पहुंचते हैं। इसके बाद, उपयोगकर्ता केवल सोचकर ही कर्सर को हिला सकता है, टाइप कर सकता है, या अन्य कमांड दे सकता है।

ऑड्रे के मामले में, चिप ने उनके दिमाग के उन संकेतों को पढ़ा, जो सामान्य रूप से हाथ की गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। इन संकेतों को डिजिटल कमांड में बदलकर कंप्यूटर स्क्रीन पर कर्सर को हिलाया गया। इस तरह, ऑड्रे बिना अपने हाथों का उपयोग किए अपने विचारों से कंप्यूटर को नियंत्रित कर पाईं। यह तकनीक इतनी सटीक है कि ऑड्रे ने न केवल लिखा, बल्कि जटिल चित्र भी बनाए।

न्यूरालिंक की यह उपलब्धि केवल ऑड्रे की व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह उन लाखों लोगों के लिए एक नई शुरुआत है, जो शारीरिक अक्षमताओं के कारण डिजिटल दुनिया से कटे हुए हैं। इस तकनीक से लकवाग्रस्त लोग न केवल कंप्यूटर चला सकते हैं, बल्कि भविष्य में अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, जैसे स्मार्टफोन, स्मार्ट होम सिस्टम, या यहां तक कि रोबोटिक अंगों को भी नियंत्रित कर सकते हैं। ऑड्रे ने अपनी पोस्ट में कहा कि वह इस तकनीक के साथ और अधिक काम करने की उम्मीद करती हैं, ताकि वह अन्य डिवाइस भी नियंत्रित कर सकें।

एलन मस्क का दावा है कि न्यूरालिंक भविष्य में कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियों, जैसे पार्किंसंस और एएलएस, के इलाज में भी मदद कर सकता है। इसके अलावा, यह तकनीक दृष्टिहीन लोगों को देखने या बोलने में असमर्थ लोगों को संवाद करने में मदद कर सकती है। हालांकि, न्यूरालिंक को अभी चिकित्सा क्षेत्र में इस चिप के उपयोग की पूरी मंजूरी नहीं मिली है। यह तकनीक अभी क्लिनिकल ट्रायल के दौर में है, और इसके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है।

न्यूरालिंक की इस तकनीक को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रेन चिप की सर्जरी और इसके उपयोग से कुछ जोखिम हो सकते हैं, जैसे कि संक्रमण या तकनीकी खराबी। इसके अलावा, चिप से डेटा हैकिंग का खतरा भी बना रहता है, क्योंकि यह मस्तिष्क के संकेतों को डिजिटल डिवाइस से जोड़ता है। कुछ लोग यह भी चिंता जताते हैं कि इस तरह की तकनीक गोपनीयता पर सवाल उठा सकती है, क्योंकि यह मस्तिष्क की गतिविधियों को रिकॉर्ड करती है।

इसके अलावा, न्यूरालिंक पर जानवरों पर किए गए परीक्षणों को लेकर भी विवाद रहा है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, चिप के परीक्षण के दौरान कई जानवरों की मौत हुई है, जिसके कारण कंपनी की आलोचना हुई। न्यूरालिंक का कहना है कि वह सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है और मानव परीक्षणों के लिए सख्त नियमों का पालन कर रही है।

ऑड्रे क्रूज की कहानी न्यूरालिंक की ब्रेन चिप तकनीक की ताकत को दर्शाती है। 20 साल तक शारीरिक अक्षमता के साथ जीने के बाद, ऑड्रे ने अपने दिमाग की शक्ति से न केवल लिखा, बल्कि अपनी रचनात्मकता को भी व्यक्त किया। यह तकनीक उन लोगों के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है, जो शारीरिक सीमाओं के कारण दुनिया से जुड़ने में असमर्थ हैं। हालांकि, इस तकनीक के सामने अभी कई चुनौतियां हैं, लेकिन यह निश्चित रूप से भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम है। एलन मस्क की न्यूरालिंक ने साबित कर दिया है कि जो कभी साइंस फिक्शन लगता था, वह अब हकीकत बन रहा है।

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