बेटों की बेरुखी और अपनों का परित्याग: दुमका के पीजेएमसीएच अस्पताल में दम तोड़ती संवेदनाएं, वार्डों में लावारिस पड़े हैं कई बुजुर्ग माता-पिता।
झारखंड की उपराजधानी दुमका में स्थित फूलो झानो मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीजेएमसीएच) इन दिनों केवल बीमारियों का इलाज केंद्र नहीं
- ममता का अपमान और बुढ़ापे की लाचारी: अस्पताल के बेड नंबर पर टिकी हैं पथराई आंखें, जीवन भर का खून-पसीना बहाने वाले अभिभावकों को बीच मझधार में छोड़ गए परिजन
- रिश्तों का कत्ल और समाज की गिरती नैतिकता: झारखंड के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक में अपनों की तलाश में सिसक रहे हैं वृद्ध, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं सिर्फ दर्द की कहानियां
झारखंड की उपराजधानी दुमका में स्थित फूलो झानो मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीजेएमसीएच) इन दिनों केवल बीमारियों का इलाज केंद्र नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के बिखरने का गवाह बन गया है। इस अस्पताल के विभिन्न वार्डों में भर्ती कई बुजुर्गों की स्थिति रूह कंपा देने वाली है। ये वे अभागे माता-पिता हैं, जिन्हें उनके अपने बच्चों ने ठीक होने की उम्मीद में भर्ती तो कराया, लेकिन फिर कभी मुड़कर नहीं देखा। अस्पताल के सफेद गलियारों में गूंजती उनकी सिसकियां इस बात का प्रमाण हैं कि आधुनिक समाज में रिश्तों की मर्यादा किस कदर तार-तार हो रही है। कई बुजुर्ग ऐसे हैं जो हफ़्तों से एक ही बिस्तर पर पड़े हैं, उनकी आंखें दरवाजे पर टिकी रहती हैं कि शायद आज उनका बेटा या बेटी उन्हें घर ले जाने आएगा, लेकिन शाम ढलते ही उनकी उम्मीदें भी दम तोड़ देती हैं। अस्पताल के रिकॉर्ड और वहां तैनात स्वास्थ्य कर्मियों के अनुभवों के अनुसार, यह समस्या किसी एक परिवार की नहीं बल्कि एक बढ़ती हुई सामाजिक विकृति बन गई है। पीजेएमसीएच के मेडिसिन वार्ड और सर्जरी वार्ड में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां परिजनों ने भर्ती कराते समय गलत मोबाइल नंबर और फर्जी पते लिखवाए। जब इलाज के बाद बुजुर्गों की स्थिति में सुधार हुआ या उन्हें डिस्चार्ज करने का समय आया, तो अस्पताल प्रशासन ने दिए गए नंबरों पर संपर्क करने की कोशिश की, जो या तो बंद मिले या फिर उठाने वाले ने मरीज को पहचानने से ही इनकार कर दिया। नौ महीने तक कोख में पालने वाली मां और अंगुली पकड़कर दुनिया दिखाने वाले पिता आज उसी संतान के लिए बोझ बन गए हैं, जिसे उन्होंने अभावों में रहकर भी पढ़ाया-लिखाया और काबिल बनाया।
अस्पताल के वार्ड में भर्ती एक वृद्ध महिला की कहानी सुनकर पत्थर दिल भी पिघल जाए। उन्हें उनके पुत्र ने सांस की तकलीफ के कारण भर्ती कराया था। शुरुआती दो दिनों तक बेटा साथ रहा, लेकिन जैसे ही दवाइयों और देखभाल की जरूरत बढ़ी, वह चुपचाप खिसक गया। अब वह वृद्धा चलने-फिरने में असमर्थ है और अपनी दैनिक क्रियाओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर है। अस्पताल की नर्सें और सफाईकर्मी ही अब उनका एकमात्र सहारा हैं। वे अपने कांपते हाथों से पास आने वाले हर व्यक्ति से बस यही पूछती हैं कि "क्या मेरा बच्चा आया है?" यह दृश्य अस्पताल में आने वाले हर शख्स को झकझोर कर रख देता है, मगर उन बच्चों के कानों तक यह पुकार नहीं पहुँच पा रही है जो अपनी जड़ों को ही भूल चुके हैं। पीजेएमसीएच प्रबंधन के लिए यह स्थिति एक बड़ा सिरदर्द बन गई है। बेड की कमी होने के बावजूद मानवीय आधार पर इन बुजुर्गों को अस्पताल से बाहर नहीं निकाला जा सकता। कई बार पुलिस की मदद से परिजनों को ढूंढने का प्रयास किया जाता है, लेकिन कानूनी पचड़ों और सामाजिक लोकलाज के डर से भी लोग इन्हें वापस ले जाने को तैयार नहीं होते। इस संकट का एक और भयावह पहलू यह है कि कई बुजुर्ग गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और उन्हें निरंतर चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है। अस्पताल में पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद, अपनों का साथ न होने के कारण उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि दवाइयों से ज्यादा अपनों का प्यार और स्पर्श मरीज को जल्दी ठीक करता है, लेकिन यहाँ तो स्थिति इसके ठीक विपरीत है। अकेलेपन और तिरस्कार की भावना इन वृद्धों को अंदर ही अंदर खोखला कर रही है। कुछ बुजुर्ग तो इतने स्वाभिमानी हैं कि वे रोते भी नहीं, बस शून्य में ताकते रहते हैं, मानो उन्होंने अपनी नियति को स्वीकार कर लिया हो और अब वे केवल मृत्यु का इंतजार कर रहे हों ताकि इस अपमानजनक जीवन से मुक्ति मिल सके।
समाज के इस गिरते स्तर पर गौर करें तो पता चलता है कि नैतिक मूल्यों का ह्रास कितनी तेजी से हुआ है। दुमका और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले इन मामलों में देखा गया है कि संपत्ति के विवाद या फिर आर्थिक तंगी का हवाला देकर बुजुर्गों को लावारिस छोड़ दिया जाता है। ताज्जुब की बात यह है कि इनमें से कुछ बुजुर्गों के बच्चे अच्छी नौकरियों में हैं और समाज में सम्मानित पद रखते हैं। इसके बावजूद, वे अपने माता-पिता के प्रति अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं। यह स्थिति न केवल उन परिवारों के लिए शर्मनाक है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है कि हम किस ओर बढ़ रहे हैं। यदि आज हम अपने पूर्वजों का सम्मान नहीं कर पा रहे हैं, तो आने वाली पीढ़ी से हम किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा रख सकते हैं? अस्पताल प्रशासन ने अब इस समस्या से निपटने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं और वृद्धाश्रमों से संपर्क साधना शुरू किया है। हालांकि, वृद्धाश्रम भी अंतिम समाधान नहीं हैं, क्योंकि एक माता-पिता के लिए अपने घर और आंगन की जगह कहीं और नहीं हो सकती। पीजेएमसीएच के डॉक्टरों का कहना है कि वे अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ इलाज दे रहे हैं, लेकिन जब मरीज का मन ही हार जाए, तो दवाइयां भी बेअसर होने लगती हैं। कई बार स्थानीय लोग और दानदाता इन बुजुर्गों के लिए भोजन और कपड़े लेकर आते हैं, जिससे कुछ समय के लिए उन्हें राहत तो मिलती है, लेकिन अपनों की कमी कोई भी बाहरी व्यक्ति पूरी नहीं कर सकता। यह एक ऐसी त्रासदी है जो रोज अस्पताल के कमरों में दोहराई जा रही है।
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