नेतन्याहू का कड़ा संदेश: 'दुश्मनों ने हमारा गला घोंटना चाहा, पर हमने उनका ही घोंट दिया', इजरायल का ईरान और लेबनान पर निर्णायक प्रहार।
प्रधानमंत्री के इस संबोधन के दौरान इजरायल के भीतर भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां एक वर्ग इसे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक और साहसी कदम मान रहा है, वहीं तेल अवीव की सड़कों पर हजारों प्रदर्शनकारियों
- लेबनान ने शांति वार्ता के लिए कई बार किया संपर्क: इजरायली प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया प्रस्ताव, लेकिन हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण की रखी सख्त शर्त।
- इजरायल का 'ऑपरेशन इटरनल डार्कनेस' जारी: ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को ध्वस्त करने का दावा, नेतन्याहू बोले- "अभी बहुत कुछ करना बाकी है"।
पश्चिम एशिया के युद्धग्रस्त हालात के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए राष्ट्र को संबोधित किया है। शनिवार रात एक टेलीविजन संबोधन में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल के शत्रुओं ने देश को चारों ओर से घेरकर उसका अस्तित्व मिटाने की साजिश रची थी, लेकिन इजरायल की सैन्य शक्ति ने उस साजिश को उन्हीं के खिलाफ मोड़ दिया है। प्रधानमंत्री ने बेहद कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि वे लोग हमारा गला घोंटना चाहते थे, लेकिन हमने उनका ही गला घोंट दिया है। उनका यह बयान ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के खिलाफ इजरायल की हालिया सैन्य सफलताओं के बाद आया है। नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि इजरायल ने अपने शत्रुओं पर केवल हमला ही नहीं किया है, बल्कि उनके बुनियादी ढांचे को ऐसी चोट पहुंचाई है जिससे उभरना उनके लिए कठिन होगा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है और इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
नेतन्याहू ने अपने संबोधन में दावा किया कि इजरायल और अमेरिका के संयुक्त अभियान ने ईरान के परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों को लगभग 'कुचल' दिया है। उन्होंने कहा कि एक समय ईरान परमाणु बम हासिल करने के बेहद करीब था, जो इजरायल के लिए अस्तित्व का संकट बन सकता था, लेकिन समय रहते की गई सैन्य कार्रवाई ने उस खतरे को टाल दिया है। प्रधानमंत्री के अनुसार, ईरान के पास अब एक भी कार्यशील संवर्धन इकाई (enrichment facility) नहीं बची है और उनकी मिसाइल उत्पादन क्षमता भी काफी हद तक समाप्त हो गई है। उन्होंने कहा कि दशकों तक ईरान और उसके सहयोगियों ने इजरायल को विनाश की धमकी दी थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि वे खुद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह बयान क्षेत्र में इजरायल के बढ़ते प्रभाव और सैन्य श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।
लेबनान के साथ चल रहे तनाव और भविष्य की संभावनाओं पर बात करते हुए प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि पिछले एक महीने में लेबनान की सरकार ने प्रत्यक्ष शांति वार्ता शुरू करने के लिए कई बार इजरायल से संपर्क किया है। नेतन्याहू ने कहा कि लेबनान के इतिहास में यह पहली बार है जब उन्होंने खुद वार्ता की पहल की है। प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने की बात तो कही, लेकिन इसके साथ दो बेहद कड़ी शर्तें भी जोड़ दी हैं। उनकी पहली शर्त यह है कि हिजबुल्लाह के हथियारों को पूरी तरह से नष्ट या निरस्त किया जाए और दूसरी शर्त यह है कि कोई भी समझौता केवल युद्धविराम तक सीमित न रहकर एक वास्तविक और दीर्घकालिक शांति संधि के रूप में हो, जो आने वाली पीढ़ियों तक स्थायी रहे। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि बिना हिजबुल्लाह के निशस्त्रीकरण के कोई भी वार्ता सार्थक नहीं होगी।
नेतन्याहू का रुख और दबाव
हाल के दिनों में इजरायल ने लेबनान में 'ऑपरेशन इटरनल डार्कनेस' के तहत भीषण हवाई हमले किए हैं, जिसमें हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाया गया। सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन की ओर से भी इजरायल पर लेबनान के साथ युद्धविराम की दिशा में आगे बढ़ने का दबाव है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू का वार्ता के लिए तैयार होना इसी कूटनीतिक दबाव और जमीनी सैन्य लाभ के बीच एक संतुलन बनाने का प्रयास माना जा रहा है।
इजरायली रक्षा बलों (IDF) की हालिया कार्रवाइयों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इजरायल ने हिजबुल्लाह के हजारों आतंकवादियों को समाप्त कर दिया है और उनके मिसाइल भंडार को भारी नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि लेबनान की सीमा पर एक सुरक्षित 'बफर जोन' बनाने का काम जारी है ताकि उत्तरी इजरायल के नागरिक सुरक्षित अपने घरों को लौट सकें। नेतन्याहू ने दक्षिण लेबनान में सैन्य अभियान के विस्तार की भी पुष्टि की और कहा कि जब तक सीमा पार से रॉकेट हमलों का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक सेना पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इजरायल अब 'फायर अंडर फायर' यानी हमलों के बीच ही बातचीत की नीति पर चल रहा है, जिसका अर्थ है कि वार्ता की मेज पर बैठने का मतलब यह नहीं है कि सैन्य अभियान रोक दिया जाएगा।
ईरान के भीतर चल रही आंतरिक उथल-पुथल पर टिप्पणी करते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ईरानी शासन अब युद्धविराम के लिए 'भीख' मांग रहा है। उन्होंने दावा किया कि ईरान की अर्थव्यवस्था और सैन्य आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह चरमरा गई है। प्रधानमंत्री ने स्टील उद्योग, गैस उत्पादन और परिवहन बुनियादी ढांचे जैसे प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाए जाने की बात कही, जिससे ईरान की युद्ध लड़ने की क्षमता न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि ईरान के नेतृत्व में भी अब आंतरिक संघर्ष और असंतोष बढ़ रहा है। नेतन्याहू ने इसे इजरायल के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया और कहा कि ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव अब सिमट रहा है, जिससे न केवल इजरायल बल्कि पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता को लाभ होगा।
प्रधानमंत्री के इस संबोधन के दौरान इजरायल के भीतर भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां एक वर्ग इसे राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक और साहसी कदम मान रहा है, वहीं तेल अवीव की सड़कों पर हजारों प्रदर्शनकारियों ने इन युद्धों के खिलाफ रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नेतन्याहू व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए युद्ध को लंबा खींच रहे हैं और ईरान के साथ होने वाले संभावित व्यापक युद्धविराम समझौतों को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, नेतन्याहू ने इन आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा कि उनकी प्राथमिकता केवल और केवल इजरायल की सुरक्षा है। उन्होंने कहा कि शांति केवल ताकत के दम पर ही हासिल की जा सकती है और इजरायल अपनी शर्तों पर ही शांति समझौता करेगा। अपने भाषण के समापन पर नेतन्याहू ने सेना और नागरिकों के धैर्य की सराहना की। उन्होंने कहा कि इजरायल एक बहु-मोर्चे (multi-front) वाले युद्ध का सामना कर रहा है, जिसमें हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के अन्य सहयोगी शामिल हैं, लेकिन इजरायल हर मोर्चे पर जीत हासिल कर रहा है। उन्होंने वैश्विक समुदाय को भी संदेश दिया कि इजरायल अपने नागरिकों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है और उसे किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं है। नेतन्याहू ने भविष्य के प्रति विश्वास जताते हुए कहा कि यह संघर्ष इजरायल के शत्रुओं की अंतिम हार और क्षेत्र में एक नए सुरक्षा तंत्र की स्थापना के साथ समाप्त होगा। आने वाले दिन कूटनीतिक वार्ताओं और संभावित समझौतों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं, क्योंकि लेबनान के साथ वार्ता की मेज सजने की तैयारी शुरू हो चुकी है।
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