केरल के 'दो रुपये वाले डॉक्टर' एके रायरु गोपाल का निधन, इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर 18 लाख मरीजों की सेवा का अमर यश।
केरल के कन्नूर में 'दो रुपये वाले डॉक्टर' के नाम से मशहूर डॉ. एके रायरु गोपाल का 3 अगस्त 2025 को 80 वर्ष की आयु में उम्र संबंधी बीमारियों ....
केरल के कन्नूर में 'दो रुपये वाले डॉक्टर' के नाम से मशहूर डॉ. एके रायरु गोपाल का 3 अगस्त 2025 को 80 वर्ष की आयु में उम्र संबंधी बीमारियों के कारण निधन हो गया। पिछले पांच दशकों से अधिक समय तक उन्होंने अपने घर में संचालित क्लीनिक में लाखों गरीब मरीजों का इलाज किया, जिनसे वे केवल दो रुपये की मामूली फीस लेते थे। बाद में यह फीस बढ़ाकर 40 से 50 रुपये की गई, जो आज के समय में भी अन्य डॉक्टरों की फीस की तुलना में नगण्य थी। उनकी निस्वार्थ सेवा और मानवता ने उन्हें 'जनता का डॉक्टर' का सम्मान दिलाया। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।
डॉ. एके रायरु गोपाल का जन्म कन्नूर में एक सम्मानित चिकित्सक परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ. एजी नंबियार और माता एके लक्ष्मीकुट्टी अम्मा थीं। डॉ. नंबियार स्वयं एक प्रसिद्ध चिकित्सक और परोपकारी थे, जिन्होंने अपने बेटों - रायरु गोपाल, वेणुगोपाल, कृष्णगोपाल और राजगोपाल - को सिखाया कि चिकित्सा सेवा धन कमाने का साधन नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम है। उन्होंने अपने बेटों से कहा, “अगर तुम्हें पैसा कमाना है, तो कोई और पेशा चुनो।” इस सलाह ने डॉ. रायरु गोपाल के जीवन को आकार दिया।
डॉ. गोपाल ने अपनी चिकित्सा शिक्षा पूरी करने के बाद कन्नूर के थलप में अपने घर के पास एलआईसी कार्यालय के निकट क्लीनिक शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने केवल दो रुपये की फीस तय की और जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त दवाइयां दीं। बाद में, जब वे थाना के पास मणिक्कव मंदिर के निकट अपने पारिवारिक निवास 'लक्ष्मी' में स्थानांतरित हुए, तब फीस बढ़ाकर 10 रुपये की, और फिर 40 से 50 रुपये की। फिर भी, उन्होंने कभी भी किसी मरीज को आर्थिक तंगी के कारण इलाज से वंचित नहीं किया।
- निस्वार्थ सेवा का जीवन
डॉ. रायरु गोपाल का दिन सुबह 2:15 बजे शुरू होता था। वे पहले अपने घर के गौशाला में काम करते, फिर स्नान और प्रार्थना के बाद सुबह 5:30 बजे अखबार पढ़ते। सुबह 6:30 बजे से मरीजों की कतार शुरू हो जाती थी। अपने करियर के चरम पर, वे एक दिन में 250 से 300 मरीजों का इलाज करते थे। उनकी पत्नी, डॉ. पीओ शकुंतला, जो स्वयं एक चिकित्सक थीं, और एक सहायक, भीड़ को संभालने और दवाइयां वितरित करने में उनकी मदद करते थे।
डॉ. गोपाल ने हमेशा सस्ती और प्रभावी दवाइयों को प्राथमिकता दी। उन्होंने फार्मास्युटिकल कंपनियों के साथ किसी भी तरह का संबंध रखने से इनकार कर दिया और मुफ्त उपहार, कमीशन या लग्जरी यात्राओं को ठुकराया। उनका मानना था कि चिकित्सा सेवा का व्यवसायीकरण मरीजों के हित में नहीं है। वे केवल जरूरी जांच की सलाह देते थे और मरीजों के समय और सम्मान को महत्व देते थे।
डॉ. गोपाल ने अपने 50 साल से अधिक के करियर में अनुमानित 18 लाख मरीजों का इलाज किया। उनके क्लीनिक में हर उम्र के लोग - बच्चे, बुजुर्ग, मजदूर, और छात्र - इलाज के लिए आते थे। उन्होंने सुबह 3 बजे से मरीज देखना शुरू किया ताकि दिहाड़ी मजदूर और स्कूल जाने वाले छात्रों को असुविधा न हो। कई मरीजों के लिए वे केवल एक डॉक्टर नहीं, बल्कि एक पिता या भाई की तरह थे, जो उनकी समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुनते और सहानुभूति के साथ इलाज करते थे।
उनके मरीजों में कन्नूर के साथ-साथ आसपास के जिलों के लोग भी शामिल थे। थाना के निवासी एम. शफीक ने बताया, “डॉ. गोपाल एक अनोखे इंसान थे। उनकी निदान क्षमता अद्भुत थी, और वे केवल जरूरी दवाइयां लिखते थे, जो सस्ती और प्रभावी होती थीं।” डॉ. गोपाल ने कभी भी अपनी सेवाओं का प्रचार नहीं किया, लेकिन उनके मरीजों का प्यार और सम्मान ही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।
2024 में उम्र और स्वास्थ्य समस्याओं के कारण डॉ. गोपाल को अपनी प्रैक्टिस बंद करनी पड़ी। उन्होंने अपने क्लीनिक के बाहर एक हस्तलिखित नोटिस लगाया, जिसमें लिखा था, “मेरी सेहत अब काम करने की अनुमति नहीं देती।” इस घोषणा ने उनके हजारों मरीजों को दुखी किया, जो उनकी सेवा पर निर्भर थे। मई 2024 में क्लीनिक बंद होने के बाद भी, कई मरीज उनके घर के बाहर उनकी सेहत की जानकारी लेने आते थे।
- सम्मान और पुरस्कार
डॉ. रायरु गोपाल को उनकी असाधारण सेवा के लिए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने केरल में सर्वश्रेष्ठ फैमिली डॉक्टर का पुरस्कार दिया। उनकी सादगी और निस्वार्थ सेवा ने उन्हें 'जनता का डॉक्टर' और 'दो रुपये वाला डॉक्टर' जैसे नामों से नवाजा। उनकी कहानी ने न केवल कन्नूर, बल्कि पूरे केरल में लोगों को प्रेरित किया।
- शोक संदेश और अंतिम संस्कार
डॉ. गोपाल के निधन की खबर से कन्नूर में शोक की लहर दौड़ गई। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा, “पांच दशकों तक केवल दो रुपये की फीस लेकर डॉ. रायरु गोपाल ने गरीब मरीजों को राहत दी। उनकी सेवा ने असंख्य लोगों को सुकून पहुंचाया। वे सही मायनों में जनता के डॉक्टर थे।”
उनके निधन पर कई सामाजिक संगठनों और स्थानीय नेताओं ने भी शोक जताया। उनका अंतिम संस्कार 3 अगस्त 2025 को दोपहर में पय्यंबलम में पूरे सम्मान के साथ किया गया। उनके परिवार में उनकी पत्नी डॉ. पीओ शकुंतला, बेटा डॉ. बालगोपाल, और बेटी विद्या हैं।
डॉ. रायरु गोपाल की कहानी आज के समय में, जब स्वास्थ्य सेवा तेजी से व्यवसायीकरण की ओर बढ़ रही है, एक प्रेरणा है। उन्होंने साबित किया कि चिकित्सा सेवा केवल पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम हो सकता है। उनकी सादगी, मेहनत और मरीजों के प्रति समर्पण ने उन्हें एक जीवंत किंवदंती बना दिया। सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उनकी सेवा को याद किया। एक यूजर ने लिखा, “डॉ. गोपाल जैसे लोग अब दुर्लभ हैं। उन्होंने हमें सिखाया कि इंसानियत सबसे बड़ी दौलत है।”
डॉ. गोपाल का जीवन और कार्य केरल की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की ताकत को दर्शाता है, जो देश में सबसे मजबूत मानी जाती है। हालांकि, हाल के वर्षों में केरल में भी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च बढ़ा है, जिसने गरीब मरीजों के लिए इलाज को मुश्किल बनाया है। ऐसे में, डॉ. गोपाल की सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा की मिसाल नीति निर्माताओं के लिए एक सबक है। उनकी कहानी यह सवाल उठाती है कि क्या सरकार और समाज मिलकर ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जो हर व्यक्ति को सस्ता और गुणवत्तापूर्ण इलाज प्रदान करे।
डॉ. एके रायरु गोपाल का निधन न केवल कन्नूर, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी क्षति है। उन्होंने अपने जीवन में 18 लाख से अधिक मरीजों को नई जिंदगी दी और साबित किया कि चिकित्सा सेवा का असली मकसद लोगों का भला करना है। उनकी सादगी, निस्वार्थ सेवा और मानवता की भावना हमेशा प्रेरणा देती रहेगी। 'दो रुपये वाला डॉक्टर' भले ही अब हमारे बीच न हो, लेकिन उनकी विरासत लाखों लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।
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