ट्रेन के पहियों पर रबर क्यों नहीं लगाया जाता, स्टील-स्टील घर्षण की वजह से ऊर्जा बचत और कुशल संचालन सुनिश्चित होता है
ट्रेन के पहिये पूरी तरह स्टील से बने होते हैं और उन पर रबर का टायर नहीं लगाया जाता क्योंकि स्टील पर स्टील रेल के साथ रोलिंग फ्रिक्शन बहुत कम होता है। यह फ्रिक्शन कार या ट्रक के र
- भारी ट्रेनों के लिए स्टील पहिए जरूरी, रबर लगाने से घिसाव तेज और ऊर्जा खपत बढ़ जाती है
- रेलवे इंजीनियरिंग में स्टील व्हील्स का फायदा, कम रोलिंग फ्रिक्शन से ट्रेनें लंबी दूरी आसानी से तय करती हैं
ट्रेन के पहिये स्टील से बने होते हैं और उन पर रबर नहीं लगाया जाता, जिसकी वजह सुनकर कई लोगों का दिमाग हिल जाता है। ट्रेनें भारी वजन वाली होती हैं और लंबी दूरी तय करती हैं, इसलिए पहियों की सामग्री में स्टील का इस्तेमाल किया जाता है। स्टील पर स्टील रेल के साथ घर्षण बहुत कम होता है, जो ऊर्जा बचत करता है और ट्रेन को कुशल बनाता है। अगर रबर लगाया जाए तो घिसाव तेज होता, ऊर्जा अधिक खर्च होती और कई तकनीकी समस्याएं आतीं। यह तथ्य विभिन्न इंजीनियरिंग और रेलवे स्रोतों से सत्यापित है, जहां स्टील व्हील्स की कम रोलिंग फ्रिक्शन को मुख्य कारण बताया गया है।
ट्रेन के पहिये पूरी तरह स्टील से बने होते हैं और उन पर रबर का टायर नहीं लगाया जाता क्योंकि स्टील पर स्टील रेल के साथ रोलिंग फ्रिक्शन बहुत कम होता है। यह फ्रिक्शन कार या ट्रक के रबर टायर की तुलना में 85 से 99 प्रतिशत कम होता है, जिससे ट्रेन को चलाने के लिए बहुत कम ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। ट्रेनें सैकड़ों टन वजन वाली होती हैं और लंबी दूरी तय करती हैं, इसलिए कम फ्रिक्शन से ईंधन या बिजली की बचत होती है। अगर रबर लगाया जाए तो रबर का लगातार डिफॉर्मेशन होता, जिससे ऊर्जा नुकसान में बदल जाती और ट्रेन को चलाने के लिए बहुत अधिक बल की जरूरत पड़ती। स्टील पहिए भारी लोड को सहन करने में सक्षम होते हैं और उनका जीवनकाल लाखों किलोमीटर तक होता है।
ट्रेनों की दक्षता का मुख्य आधार स्टील व्हील्स और स्टील रेल्स का संयोजन है। स्टील पर स्टील से रोलिंग रेजिस्टेंस बहुत कम होता है, जो पानी के बाद सबसे कम रेजिस्टेंस वाला माध्यम माना जाता है। ट्रेनें ज्यादातर समय स्थिर गति से चलती हैं, जहां एक्सेलरेशन और ब्रेकिंग कम होती है, इसलिए कम फ्रिक्शन फायदेमंद होता है। रबर टायर लगाने से रोलिंग रेजिस्टेंस बढ़ जाता, जिससे ऊर्जा खपत 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ सकती है। ट्रेनों में पहिए कॉनिकल शेप के होते हैं, जो पटरी पर स्थिरता और स्टीयरिंग प्रदान करते हैं, जबकि रबर की स्मूद सर्फेस यह काम नहीं कर सकती।
ट्रेनों के पहिए स्टील से बने होने से उनका घिसाव बहुत कम होता है और रखरखाव आसान होता है। रबर टायर हर कुछ महीनों में बदलने पड़ते, जबकि स्टील पहिए सालों तक चलते हैं। ट्रेनें हजारों टन वजन उठाती हैं, जहां रबर डिफॉर्म हो जाता, ओवरहीट हो जाता और फटने का खतरा रहता है। स्टील पहिए हाई डेंसिटी स्ट्रक्चर से बने होते हैं, जो प्रेशर को समान रूप से बांटते हैं। रबर टायर में टायर प्रेशर मॉनिटरिंग और इन्फ्लेशन की जरूरत पड़ती, जो सिस्टम को जटिल बनाता है। कुछ मेट्रो सिस्टम में रबर टायर इस्तेमाल होते हैं, लेकिन वे छोटे और तेज एक्सेलरेशन वाले होते हैं, जहां फ्रिक्शन बढ़ाने की जरूरत होती है।
स्टील पहिए ट्रेनों को हाई स्पीड और लंबी दूरी के लिए उपयुक्त बनाते हैं। रबर टायर से हाई टेम्परेचर और मैकेनिकल वियर से समस्या होती, जबकि स्टील पहिए 800 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सहन करते हैं। रबर टायर लगाने से ट्रेन की स्पीड 100 किमी/घंटा से अधिक होने पर स्नेक-लाइक स्विंग की समस्या आती, जो कंट्रोल खोने का खतरा बढ़ाती है। स्टील पहिए की फ्लैंज स्ट्रक्चर पटरी से लॉक करती है और डिरेलमेंट रोकती है। रबर टायर से डस्ट और पार्टिकुलेट मैटर बनता है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है।
ट्रेनों में स्टील पहिए का इस्तेमाल दशकों से सिद्ध है और यह सबसे कुशल तरीका माना जाता है। रबर टायर केवल स्पेशल मेट्रो या लाइट रेल में इस्तेमाल होते हैं, जहां तेज एक्सेलरेशन, ब्रेकिंग और ग्रेडिएंट की जरूरत होती है। सामान्य फ्रेट और पैसेंजर ट्रेनों के लिए स्टील पहिए ही उपयुक्त हैं क्योंकि वे कम मेंटेनेंस, कम एनर्जी और हाई ड्यूरेबिलिटी प्रदान करते हैं। ट्रेन के पहिए पर रबर न लगाने की वजह मुख्य रूप से कम रोलिंग फ्रिक्शन, हाई लोड सहन क्षमता और लंबा जीवनकाल है। यह डिजाइन ट्रेनों को विश्व की सबसे कुशल परिवहन प्रणाली बनाता है।
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