बिहार में सत्ता परिवर्तन की आहट: मांझी, कुशवाहा और चिराग की त्रिमूर्ति तय करेगी राज्य का नया भविष्य?
बिहार की राजनीति में आज का दिन बेहद निर्णायक और ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के
- नीतीश के इस्तीफे के बाद सियासी घमासान: एनडीए के छोटे दलों की अहम बैठक में नए मुख्यमंत्री के नाम पर होगा मंथन
- मिशन बिहार 2026: चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी का बड़ा दांव, क्या बदलेगा सत्ता का समीकरण?
बिहार की राजनीति में आज का दिन बेहद निर्णायक और ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद उपजे राजनीतिक शून्य को भरने के लिए हलचलें तेज हो गई हैं। वर्तमान में बिहार के सियासी गलियारों में सबसे अधिक चर्चा उस महत्वपूर्ण बैठक की हो रही है, जिसमें एनडीए के तीन प्रमुख सहयोगी दल जीतन राम मांझी की 'हम', उपेंद्र कुशवाहा की 'राष्ट्रीय लोक मोर्चा' और चिराग पासवान की 'लोजपा (रामविलास)' एक साथ बैठने जा रहे हैं। यह बैठक केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं है, बल्कि बिहार के आगामी सत्ता समीकरणों और नए मुख्यमंत्री के चयन की दिशा में एक बड़ा कदम है। नीतीश कुमार के सक्रिय राज्य राजनीति से हटने और केंद्र की ओर रुख करने की चर्चाओं के बीच, ये तीनों नेता अब राज्य की बागडोर संभालने वाले चेहरे और अपनी-अपनी पार्टियों की भूमिका को लेकर गंभीर मंथन करेंगे।
नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बिहार में सत्ता के नए केंद्र बनने लगे हैं। पिछले लगभग दो दशकों से बिहार की राजनीति नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। भाजपा जहाँ राज्य में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है, वहीं चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी जैसे सहयोगियों की भूमिका किंगमेकर की हो गई है। आज की इस बैठक का मुख्य एजेंडा एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन को बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि नई सरकार में दलितों, पिछड़ों और अति पिछड़ों का प्रतिनिधित्व कम न हो। इन तीनों नेताओं का एक साथ आना भाजपा के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि नए मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगाने से पहले उनके हितों और मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चिराग पासवान इस त्रिमूर्ति के सबसे युवा और प्रभावशाली चेहरे के रूप में उभरे हैं। हालिया चुनावों में उनके प्रदर्शन ने उन्हें एनडीए के भीतर एक 'हनुमान' की छवि से ऊपर उठाकर एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है। आज की बैठक में चिराग पासवान की प्राथमिकता यह होगी कि आगामी मंत्रिमंडल में उनकी पार्टी को महत्वपूर्ण विभाग मिलें और साथ ही बिहार के विकास के लिए उनके 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' विजन को नई सरकार के साझा न्यूनतम कार्यक्रम में शामिल किया जाए। सूत्रों के अनुसार, चिराग इस बात पर भी जोर दे रहे हैं कि नया नेतृत्व ऐसा हो जो युवाओं की आकांक्षाओं को समझे और राज्य में बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दों पर कड़े फैसले ले सके। उनकी मौजूदगी इस बैठक को एक नई ऊर्जा और दिशा प्रदान कर रही है। बिहार विधानसभा के वर्तमान आंकड़ों को देखें तो भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन सरकार चलाने के लिए उसे चिराग, मांझी और कुशवाहा के समर्थन की अनिवार्य आवश्यकता है। इन तीनों दलों के पास मिलकर इतनी सीटें हैं कि वे किसी भी सरकार के स्थायित्व को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि भाजपा आलाकमान इन नेताओं से लगातार संपर्क में है और आज की बैठक के नतीजों का इंतजार कर रहा है।
जीतन राम मांझी, जो खुद बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और दलित राजनीति का एक बड़ा चेहरा हैं, इस गठबंधन में 'अनुभव' का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। मांझी का मानना है कि नीतीश कुमार के बाद अब समय आ गया है कि बिहार में एक ऐसी सरकार बने जो सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर अधिक मजबूती से काम करे। इस बैठक में मांझी अपनी पार्टी 'हम' के लिए उपमुख्यमंत्री पद या कुछ विशेष मंत्रालयों की मांग रख सकते हैं। वे अक्सर यह कहते रहे हैं कि एनडीए में छोटे दलों को सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए। मांझी की सक्रियता यह दर्शाती है कि वे अब केवल एक सहयोगी बनकर नहीं रहना चाहते, बल्कि सत्ता के महत्वपूर्ण निर्णयों में अपनी सीधी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं। उनकी राजनीति दलित समाज के बड़े वोट बैंक को साधने की है, जिसे भाजपा भी नजरअंदाज नहीं कर सकती।
वहीं, उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका भी इस समीकरण में अत्यंत महत्वपूर्ण है। लव-कुश समीकरण के माध्यम से कुशवाहा बिहार के एक बड़े ग्रामीण और कृषि प्रधान क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीतीश कुमार के हटने के बाद कुशवाहा का प्रयास यह है कि वे उस रिक्त स्थान को भरें जो कुर्मी और कोइरी समाज के नेतृत्व में आया है। आज की बैठक में कुशवाहा इस बात पर चर्चा करेंगे कि नई सरकार में पिछड़ा वर्ग के हितों की रक्षा कैसे की जाए। वे एक ऐसे मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति बनाना चाहते हैं जो सभी वर्गों को साथ लेकर चल सके। कुशवाहा की रणनीति भाजपा और अन्य सहयोगियों के बीच एक सेतु की तरह काम करने की है, ताकि एनडीए के भीतर कोई आंतरिक कलह पैदा न हो और सरकार पांच साल का कार्यकाल सुचारू रूप से पूरा करे।
बिहार में चल रही इस खींचतान के बीच भाजपा विधायक दल की बैठक भी आज ही प्रस्तावित है। भाजपा के भीतर कई नामों पर चर्चा हो रही है, जिनमें उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और कुछ केंद्रीय मंत्रियों के नाम शामिल हैं। लेकिन भाजपा नेतृत्व अच्छी तरह जानता है कि चिराग, मांझी और कुशवाहा के समर्थन के बिना बिहार की राह आसान नहीं है। आज होने वाली इस त्रिपक्षीय बैठक में लिए गए निर्णयों को शाम तक भाजपा आलाकमान तक पहुँचाया जाएगा। कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि इन तीनों नेताओं के बीच किसी एक नाम पर सहमति बन जाती है, तो भाजपा के लिए निर्णय लेना काफी सरल हो जाएगा। यह बैठक इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें आगामी 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन के स्वरूप की नींव भी रखी जा सकती है।
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