स्कंदमाता की पूजा से संवरता है संतान का भविष्य: पंचमी तिथि पर मंदिरों में उमड़ा जनसैलाब
सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी नवरात्रि की पंचमी का दिन उत्सव का होता है। कई समुदायों में इस दिन से 'ललिता पंचमी' का व्रत भी शुरू होता है, जो सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। शाम के समय मोहल्लों और सोसायटियों में गरबा और डांडिया के आयोजन अपनी पूरी चमक बिखेर
- नवरात्रि का पांचवां दिन: वात्सल्य की देवी माँ स्कंदमाता की भक्ति में डूबे श्रद्धालु
- ममता और शौर्य का संगम है माँ का पंचम स्वरूप: जानें शुभ मुहूर्त, भोग और विशेष पूजन विधि
नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की आराधना का विशेष महत्व है, जिन्हें भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण 'स्कंदमाता' के नाम से जाना जाता है। देवी का यह स्वरूप मातृत्व की शक्ति को प्रदर्शित करता है। शास्त्रों के अनुसार, जब तारकासुर का आतंक तीनों लोकों में बढ़ गया था, तब उसके संहार के लिए भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र स्कंद का जन्म हुआ। स्कंदमाता ने अपने पुत्र को युद्ध के लिए तैयार किया और उन्हें अपनी गोद में लेकर सिंह पर सवार होकर असुरों का विनाश करने में सहायता की। यही कारण है कि देवी के इस स्वरूप की पूजा में भगवान कार्तिकेय का पूजन भी अनिवार्य माना जाता है। श्रद्धालु सुबह सवेरे स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर माँ की प्रतिमा के सामने संकल्प लेते हैं और कलश पूजन के साथ दिन की शुरुआत करते हैं।
माँ स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत दिव्य और मोहक है। वे चतुर्भुज देवी हैं, जिनकी ऊपर की दाईं भुजा में भगवान स्कंद अपनी बाल्य अवस्था में विराजमान हैं और नीचे की दाईं भुजा में देवी ने कमल का पुष्प धारण किया हुआ है। बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में है और नीचे वाली भुजा में भी कमल का पुष्प शोभायमान है। कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें 'पद्मासना देवी' भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, स्कंदमाता बुध ग्रह को नियंत्रित करती हैं, इसलिए उनकी पूजा से जातक की बुद्धि प्रखर होती है और त्वचा संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है। पंचमी के दिन भक्त मुख्य रूप से सफेद या पीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं, जो शांति और ज्ञान का प्रतीक माने जाते हैं।
पंचमी तिथि पर पूजन की विधि अत्यंत सूक्ष्म और भक्तिपूर्ण होती है। सबसे पहले माँ की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराया जाता है और फिर उन्हें कुमकुम, अक्षत, पुष्प और फल अर्पित किए जाते हैं। स्कंदमाता को पीली वस्तुएं अत्यंत प्रिय हैं, इसलिए उन्हें पीले रंग के फूल, विशेषकर चंपा या गेंदा अर्पित करने का विधान है। इसके साथ ही सुगंधित धूप और दीप जलाकर माँ की आरती उतारी जाती है। मंत्रों के जाप का भी इस दिन विशेष फल मिलता है। 'सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥' इस मंत्र का उच्चारण करने से घर में सुख-शांति का वास होता है। भक्त इस दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करते हैं, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। स्कंदमाता को भोग में केले का अर्पण करना सबसे उत्तम माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता को केले का भोग लगाने से व्यक्ति का स्वास्थ्य उत्तम रहता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। कई स्थानों पर भक्त इस दिन केले से बने विशेष पकवान या 'पंचमेवा' का भोग भी लगाते हैं, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
पंचमी के दिन मंदिरों में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। दिल्ली के झंडेवालान मंदिर, वाराणसी के दुर्गा कुंड और मिर्जापुर के विंध्याचल धाम जैसे शक्तिपीठों में विशेष सजावट की गई है। श्रद्धालुओं का मानना है कि जो लोग संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें स्कंदमाता की विशेष उपासना करनी चाहिए। स्कंदमाता की गोद में कार्तिकेय का विराजमान होना इस बात का प्रतीक है कि माँ अपने भक्तों की रक्षा ठीक उसी प्रकार करती हैं जैसे एक माँ अपने बालक की। मंदिरों में होने वाले विशेष हवन और कीर्तन से वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया है। प्रशासन ने भी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और दर्शन के पुख्ता इंतजाम किए हैं, ताकि श्रद्धालु बिना किसी बाधा के माँ के दर्शन कर सकें।
स्कंदमाता की पूजा का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष 'विशुद्ध चक्र' से जुड़ा है। योग साधना करने वाले साधक इस दिन अपना ध्यान विशुद्ध चक्र पर केंद्रित करते हैं, जो कंठ में स्थित होता है। माना जाता है कि स्कंदमाता की कृपा से साधक की वाणी में माधुर्य आता है और उसकी रचनात्मक शक्ति का विकास होता है। देवी की उपासना से साधक के अंदर करुणा, स्नेह और निस्वार्थ सेवा की भावना जागृत होती है। सांसारिक बंधनों में फंसे हुए लोगों के लिए स्कंदमाता की पूजा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। वे अपने भक्तों के लिए मोक्ष के द्वार खोलती हैं और उन्हें परम शांति प्रदान करती हैं। यही कारण है कि साधक इस दिन मौन रहकर या कम बोलकर अंतर्मन की शुद्धि पर बल देते हैं।
सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी नवरात्रि की पंचमी का दिन उत्सव का होता है। कई समुदायों में इस दिन से 'ललिता पंचमी' का व्रत भी शुरू होता है, जो सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। शाम के समय मोहल्लों और सोसायटियों में गरबा और डांडिया के आयोजन अपनी पूरी चमक बिखेर रहे हैं। श्रद्धालु एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दे रहे हैं और कन्या पूजन की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। आधुनिक समय में तकनीक के माध्यम से भी लोग ऑनलाइन दर्शन और डिजिटल आरती में भाग ले रहे हैं। मंदिरों द्वारा सोशल मीडिया पर लाइव दर्शन की सुविधा दी जा रही है, जिससे दूर-दराज के भक्त भी घर बैठे इस पावन अवसर का हिस्सा बन पा रहे हैं।
नवरात्रि का यह पांचवां दिन हमें यह सीख देता है कि जीवन में संघर्षों के बीच भी ममता और करुणा को नहीं खोना चाहिए। स्कंदमाता का शस्त्र धारण करना और साथ ही पुत्र को गोद में लेना यह दर्शाता है कि एक स्त्री और माँ के रूप में शक्ति के कई आयाम होते हैं। जैसे-जैसे चैत्र नवरात्रि आगे बढ़ रही है, भक्तों का उत्साह और श्रद्धा सातवें आसमान पर है। माँ स्कंदमाता से यही प्रार्थना है कि वे समस्त जगत का कल्याण करें और सभी के जीवन में खुशहाली लाएं। इस दिन की समाप्ति रात्रि जागरण और माँ के भजनों के साथ होती है, जिससे संपूर्ण वातावरण दिव्य ऊर्जा से सराबोर रहता है। पंचमी के इस पावन पर्व का महत्व युगों-युगों से चला आ रहा है और आज भी इसकी प्रासंगिकता उतनी ही अटूट है।
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