बंगाल चुनाव 2026: टीएमसी का रू.1000 करोड़ की 'सीक्रेट डील' का सनसनीखेज आरोप, हुमायूं कबीर और भाजपा पर साधा निशाना।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए प्रचार के बीच तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 'द रियलिटी ऑफ एचके' (The Reality of HK) शीर्षक
- सियासत में डीपफेक का जाल? हुमायूं कबीर ने वीडियो को बताया एआई का कमाल, टीएमसी के खिलाफ रू.2000 करोड़ के मानहानि की चेतावनी।
- अल्पसंख्यक वोटों की कथित 'बोली' से मचा हड़कंप: वायरल वीडियो ने बंगाल की राजनीति में पैदा किया हाई-टेक विवाद, तकनीक या हकीकत?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए प्रचार के बीच तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 'द रियलिटी ऑफ एचके' (The Reality of HK) शीर्षक वाला एक वीडियो पेश किया। इस वीडियो में कथित तौर पर हुमायूं कबीर एक अज्ञात व्यक्ति से बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं। टीएमसी के प्रवक्ताओं ने दावा किया है कि इस वीडियो में कबीर भाजपा के समर्थन से अल्पसंख्यक वोटों को बांटने की रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं और इसके बदले में रू.1000 करोड़ की मांग कर रहे हैं। टीएमसी का आरोप है कि भाजपा राज्य में 'बी' और 'सी' टीमें बनाकर सत्ता विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है। वीडियो में कथित तौर पर सीट अनुमानों और चुनाव के बाद भाजपा को समर्थन देकर उपमुख्यमंत्री का पद प्राप्त करने जैसी बातें भी सुनाई दे रही हैं, जिसने पूरे राज्य के राजनीतिक विमर्श को बदल कर रख दिया है।
हुमायूं कबीर, जो कभी टीएमसी के कद्दावर नेता थे और वर्तमान में आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख हैं, ने इन आरोपों पर तत्काल और तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस वीडियो को पूरी तरह से फर्जी बताते हुए दावा किया है कि इसे उन्नत एआई तकनीक का उपयोग करके उनके चेहरे और आवाज की नकल (Cloning) कर बनाया गया है। कबीर ने चुनौती दी है कि यदि टीएमसी के पास इस कथित बैठक या भाजपा के साथ किसी भी प्रकार के वित्तीय लेन-देन का कोई वास्तविक प्रमाण है, तो उसे सार्वजनिक किया जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इस मामले को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे और टीएमसी के उन नेताओं के खिलाफ रू.2000 करोड़ का मानहानि का दावा करेंगे जिन्होंने उनकी छवि खराब करने के लिए इस 'वर्चुअल षड्यंत्र' का सहारा लिया है।
इस विवाद का केंद्र बिंदु वह कथित वित्तीय मांग है जिसका जिक्र वीडियो में किया गया है। वीडियो में जो आवाज हुमायूं कबीर की बताई जा रही है, वह भाजपा से रू.1000 करोड़ की मांग कर रही है, जिसमें रू.300 करोड़ की अग्रिम राशि की बात भी शामिल है। टीएमसी नेताओं ने इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच की मांग की है। उनका कहना है कि चूंकि वीडियो में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के एक अधिकारी और विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के नामों का उल्लेख है, इसलिए इसकी निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है। टीएमसी का तर्क है कि यह केवल एक वीडियो नहीं है, बल्कि बंगाल की जनता के जनादेश को धनबल के जरिए प्रभावित करने की एक सोची-समझी साजिश है, जिसे समय रहते रोकना जरूरी है। डीपफेक तकनीक के माध्यम से किसी भी व्यक्ति के पुराने वीडियो और ऑडियो नमूनों का उपयोग करके एक ऐसा नया वीडियो बनाया जा सकता है जो देखने में बिल्कुल वास्तविक लगे। चुनाव के समय ऐसे वीडियो का उपयोग मतदाताओं के मन में भ्रम पैदा करने के लिए किया जा सकता है, जिससे किसी विशेष उम्मीदवार या पार्टी की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।
भाजपा ने इस पूरे मामले में खुद को टीएमसी की 'प्रायोजित फिल्म' का शिकार बताया है। भाजपा नेतृत्व का कहना है कि टीएमसी हार के डर से अब फर्जी वीडियो और एआई का सहारा लेकर विपक्षी नेताओं और उनके सहयोगियों को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। भाजपा प्रवक्ताओं ने सवाल उठाया है कि वीडियो में जिस दूसरे व्यक्ति से बातचीत हो रही है, उसका चेहरा क्यों नहीं दिखाया गया? उनका तर्क है कि यह वीडियो टीएमसी की अपनी 'आईटी सेल' की उपज है जिसे केवल चुनाव के समय अल्पसंख्यकों के बीच भ्रम फैलाने के लिए जारी किया गया है। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि उनकी किसी भी नेता के साथ ऐसी कोई डील नहीं हुई है और वे पूरी तरह से पारदर्शी राजनीति में विश्वास रखते हैं।
बंगाल की राजनीति में अल्पसंख्यक मतदाताओं की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है। हुमायूं कबीर ने हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के साथ गठबंधन किया है और वे 100 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतार रहे हैं। टीएमसी को डर है कि यदि अल्पसंख्यक वोटों का थोड़ा भी हिस्सा कबीर के पाले में जाता है, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। यही कारण है कि टीएमसी ने इस वीडियो के जरिए कबीर को भाजपा का 'एजेंट' साबित करने की कोशिश की है। टीएमसी नेताओं ने सार्वजनिक मंचों से यह सवाल उठाया है कि क्या मुस्लिम समुदाय की भावनाओं और वोटों को बाजार में बेचा जा सकता है? इस भावनात्मक अपील का उद्देश्य अल्पसंख्यक वोट बैंक को एकजुट रखना है।
चुनाव आयोग के पास भी इस मामले की शिकायतें पहुंचने की खबरें हैं, हालांकि अभी तक किसी आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है। डिजिटल दौर में चुनाव प्रचार की चुनौतियां अब जमीनी रैलियों से ज्यादा ऑनलाइन मंचों पर शिफ्ट हो गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 'वर्चुअल झूठ' का यह दौर लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक है क्योंकि एक आम मतदाता के लिए असली और नकली वीडियो के बीच अंतर करना लगभग असंभव होता जा रहा है। यदि यह वीडियो वास्तव में एआई द्वारा निर्मित है, तो यह भारतीय चुनावों में तकनीक के नकारात्मक इस्तेमाल का सबसे बड़ा उदाहरण होगा। वहीं, अगर यह वास्तविक है, तो यह भारतीय राजनीति के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक हो सकता है।
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