संविधान निर्माता को नमन: प्रधानमंत्री मोदी ने संसद के 'प्रेरणा स्थल' पर बाबा साहेब अंबेडकर को अर्पित की पुष्पांजलि.
भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार और सामाजिक न्याय के प्रबल पक्षधर डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर
- अंबेडकर जयंती पर संसद परिसर में विशेष आयोजन: प्रधानमंत्री ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमा पर माथा टेक कर दी श्रद्धांजलि
- प्रेरणा स्थल से सामाजिक न्याय का संदेश: प्रधानमंत्री मोदी ने संविधान शिल्पी की 135वीं जयंती पर राष्ट्र की ओर से किया नमन
भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार और सामाजिक न्याय के प्रबल पक्षधर डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की 135वीं जयंती के अवसर पर आज देश भर में उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखने को मिल रहा है। इस गौरवशाली दिन के उपलक्ष्य में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद भवन परिसर के नवनिर्मित 'प्रेरणा स्थल' पर जाकर बाबा साहेब को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। आज सुबह जब प्रधानमंत्री संसद परिसर पहुंचे, तो वहां का वातावरण भक्ति और राष्ट्रीयता के स्वर से गुंजायमान था। उन्होंने डॉ. अंबेडकर की भव्य प्रतिमा के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की और राष्ट्र निर्माण में उनके अतुलनीय योगदान को याद किया। यह क्षण केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि उस महान व्यक्तित्व के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर था, जिसने आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक नींव को मजबूती प्रदान की।
संसद परिसर में स्थित 'प्रेरणा स्थल' का महत्व इस दृष्टि से और भी बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों और नायकों की प्रतिमाओं को एक साथ स्थापित किया गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके जीवन से प्रेरणा ले सकें। प्रधानमंत्री ने यहाँ कुछ समय व्यतीत किया और बाबा साहेब के आदर्शों पर चलने के संकल्प को दोहराया। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के साथ लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति और केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी उपस्थित रहे। सभी गणमान्य व्यक्तियों ने बारी-बारी से बाबा साहेब की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि बाबा साहेब के विचार आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रकाश स्तंभ की तरह हैं, जो हमें समानता और बंधुत्व के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।
डॉ. अंबेडकर की जयंती, जिसे 'अंबेडकर जयंती' या 'भीम जयंती' के रूप में मनाया जाता है, केवल एक व्यक्ति का जन्मदिन नहीं है, बल्कि यह हाशिए पर रहने वाले समुदायों के सशक्तिकरण का उत्सव है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन और संदेशों के माध्यम से बार-बार इस बात पर बल दिया है कि उनकी सरकार 'पंचतीर्थ' के विकास के माध्यम से बाबा साहेब की विरासत को सहेजने का कार्य कर रही है। महू में उनके जन्मस्थान से लेकर लंदन के उनके निवास और दिल्ली में उनके महापरिनिर्वाण स्थल तक, सरकार ने इन स्थानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्मारकों में तब्दील किया है। प्रेरणा स्थल पर दी गई यह श्रद्धांजलि उसी कड़ी का एक हिस्सा है, जो यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में संसद और संविधान की भूमिका सर्वोपरि है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर को 'आधुनिक भारत का मनु' भी कहा जाता है। उन्होंने न केवल देश का संविधान लिखा, बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना के पीछे के हिल्टन यंग कमीशन को भी अपने विचारों से प्रभावित किया था। उनके आर्थिक चिंतन और सामाजिक सुधार के प्रयास आज भी नीति निर्माण के केंद्र में बने हुए हैं।
संसद परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे और पूरे क्षेत्र को फूलों से सजाया गया था। प्रधानमंत्री ने प्रतिमा के समक्ष शीश झुकाते हुए उन करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया जो बाबा साहेब को अपना मसीहा मानते हैं। इस अवसर पर बौद्ध भिक्षुओं द्वारा की गई प्रार्थनाओं ने वातावरण को आध्यात्मिक शांति प्रदान की। प्रधानमंत्री ने इस दौरान उपस्थित विशिष्ट जनों से संक्षिप्त चर्चा भी की, जिसमें उन्होंने देश के विकास में समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर चर्चा की। बाबा साहेब के 'शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो' के नारे को आज के संदर्भ में युवाओं के लिए सबसे बड़ा मंत्र बताया गया।
इस वर्ष की जयंती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी लोकतांत्रिक यात्रा के एक नए चरण में है, जहाँ सामाजिक समरसता को और अधिक सुदृढ़ करने के प्रयास किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री का 'प्रेरणा स्थल' जाना यह संदेश देता है कि नए संसद भवन के निर्माण के साथ-साथ, उन महान विभूतियों का सम्मान भी सरकार की प्राथमिकता है जिन्होंने इस लोकतंत्र की रूपरेखा तैयार की थी। डॉ. अंबेडकर ने जिस भारत का सपना देखा था, जहाँ जाति और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव न हो, उस दिशा में बढ़ते कदमों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने अपनी भावनाओं को साझा किया। उन्होंने डिजिटल माध्यमों पर भी बाबा साहेब के संघर्षों को याद करते हुए उन्हें देश का सबसे बड़ा सपूत बताया। कार्यक्रम के बाद प्रधानमंत्री ने संसद परिसर में मौजूद अन्य महान नेताओं की प्रतिमाओं का भी अवलोकन किया, लेकिन मुख्य केंद्र बाबा साहेब की प्रतिमा ही रही। यह देखा गया कि प्रधानमंत्री ने वहां मौजूद कुछ सफाई कर्मियों और कर्मचारियों का अभिवादन स्वीकार किया, जो बाबा साहेब के समानता के दर्शन को चरितार्थ करता है। सरकारी स्तर पर भी आज के दिन कई योजनाओं और कार्यक्रमों की समीक्षा की जा रही है जो दलितों, पिछड़ों और वंचितों के कल्याण से जुड़ी हैं। 'अंत्योदय' की परिकल्पना को साकार करने में डॉ. अंबेडकर के कानूनी और सामाजिक सुधारों को आधार माना जाता है, जिसे वर्तमान प्रशासन अपनी नीतियों का मूलमंत्र बताता है।
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