हरिवंश की राज्यसभा में शानदार वापसी: राष्ट्रपति ने किया मनोनीत, अब 2032 तक उच्च सदन में गूंजेगी उनकी आवाज।
देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में हरिवंश नारायण सिंह की वापसी ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाने के साथ-साथ एक सकारात्मक संदेश
- नीतीश कुमार के रणनीतिकार का फिर बढ़ा कद: रंजन गोगोई की जगह राज्यसभा पहुंचेंगे हरिवंश, संसदीय कौशल का मिला सम्मान।
- संसदीय इतिहास में नया अध्याय: राज्यसभा के पूर्व उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह का मनोनयन, छह साल के लिए मिली नई जिम्मेदारी।
देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में हरिवंश नारायण सिंह की वापसी ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाने के साथ-साथ एक सकारात्मक संदेश भी दिया है। गौरतलब है कि हरिवंश का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल, 2026 को समाप्त हो गया था और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने इस बार बिहार कोटे से उनके नाम की सिफारिश नहीं की थी। इसके स्थान पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वयं राज्यसभा जाने का निर्णय लिया और अपनी पार्टी से निर्वाचित सदस्य के रूप में शपथ ली। ऐसे में यह माना जा रहा था कि हरिवंश की संसदीय पारी पर विराम लग सकता है, लेकिन राष्ट्रपति द्वारा कला और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान को देखते हुए किया गया यह मनोनयन उनके सार्वजनिक जीवन की एक नई और महत्वपूर्ण पारी की शुरुआत है।
हरिवंश नारायण सिंह का व्यक्तित्व बहुआयामी रहा है। राजनीति में आने से पहले वे पत्रकारिता जगत के एक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर रहे हैं और उन्होंने दशकों तक समाज के ज्वलंत मुद्दों को प्रखरता से उठाया है। उनकी इसी विद्वत्ता और तटस्थता के कारण उन्हें वर्ष 2018 में पहली बार और फिर 2020 में दूसरी बार निर्विरोध रूप से राज्यसभा का उपसभापति चुना गया था। उपसभापति के रूप में उनके कार्यकाल को सदन के सुचारू संचालन और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने के लिए याद किया जाता है। राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत मिले अधिकारों का प्रयोग करते हुए उन्हें नामित किया है, जो यह दर्शाता है कि उनके अनुभवों की आवश्यकता सदन को अभी और है।
बिहार की राजनीति और सत्ता के शीर्ष नेतृत्व के साथ हरिवंश के संबंधों की चर्चा हमेशा से होती रही है। वे नीतीश कुमार के उन भरोसेमंद साथियों में गिने जाते हैं जिन्होंने नीतिगत निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, पिछले कुछ समय से राजनीतिक हलकों में ऐसी अफवाहें थीं कि उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां बढ़ गई हैं, क्योंकि उन्हें दोबारा टिकट नहीं मिला। लेकिन राष्ट्रपति द्वारा किए गए इस मनोनयन ने उन तमाम कयासों पर विराम लगा दिया है। हरिवंश को राज्यसभा में लाकर केंद्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अनुभवी और बौद्धिक नेतृत्व की अहमियत राजनीति में सर्वोपरि है। उनके आने से सदन में होने वाली चर्चाओं का स्तर और भी ऊंचा होने की उम्मीद है। राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। ये वे लोग होते हैं जिन्होंने विज्ञान, कला, साहित्य या समाज सेवा में असाधारण कार्य किया हो। हरिवंश को पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों के उनके लंबे अनुभव के आधार पर इस श्रेणी में स्थान मिला है।
संसदीय नियमों के अनुसार, एक मनोनीत सदस्य के रूप में हरिवंश के पास भी वही शक्तियां होंगी जो एक निर्वाचित सांसद के पास होती हैं। वे सदन की कार्यवाही में भाग लेंगे, मतदान करेंगे और समितियों के सदस्य भी बन सकेंगे। सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या वे दोबारा उपसभापति के पद के लिए दावेदारी पेश करेंगे। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि एक मनोनीत सदस्य भी उपसभापति के पद पर आसीन हो सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह भारतीय संसदीय लोकतंत्र में एक विरल उदाहरण होगा। फिलहाल, उनकी प्राथमिकता सदन के भीतर उन मुद्दों को उठाने की होगी जो राष्ट्र निर्माण और विकास की दृष्टि से अनिवार्य हैं।
हरिवंश नारायण सिंह की इस नई पारी का समय भी काफी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2032 तक के लंबे कार्यकाल के दौरान वे देश के कई ऐतिहासिक फैसलों और विधायी प्रक्रियाओं के साक्षी बनेंगे। 69 वर्षीय हरिवंश के पास अब न केवल अपनी पार्टी की विचारधारा, बल्कि एक मनोनीत सदस्य के रूप में राष्ट्र के व्यापक हितों का प्रतिनिधित्व करने का भी अवसर है। पत्रकारिता से लेकर संसद तक का उनका सफर उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो मूल्यों की राजनीति में विश्वास रखते हैं। सदन में उनकी उपस्थिति से भाषाई मर्यादा और संसदीय परंपराओं के संरक्षण की उम्मीदें और भी बलवती हो गई हैं।
राष्ट्रपति द्वारा जारी अधिसूचना के बाद अब हरिवंश के शपथ ग्रहण की तैयारियां चल रही हैं। वहीं दूसरी ओर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी संभाल ली है। एक ही समय में नीतीश और उनके करीबी रहे हरिवंश का सदन में होना बिहार के लिए राजनीतिक मजबूती का संकेत है। हालांकि दोनों की भूमिकाएं अब अलग-अलग होंगी, लेकिन दोनों का लक्ष्य बिहार और देश का विकास ही है। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को एक ऐसी 'महारणनीति' के रूप में देखा जा रहा है जिससे केंद्र और राज्य के बीच एक बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सके।
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