प्लास्टिक कंटेनर में गर्म खाना पैक करने से केमिकल लीकेज से स्वास्थ्य जोखिम, कैंसर और हार्मोन असंतुलन की आशंका
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाओं ने इन केमिकल्स के नियमित संपर्क को डायबिटीज, मोटापा, हृदय रोग और हार्मोन संबंधी कैंसर से जोड़ा है। BPA और फ्थेलेट्स हार्मो
प्लास्टिक कंटेनरों में गर्म खाना पैक करना या स्टोर करना एक आम आदत है, लेकिन इससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों पर वैज्ञानिक अध्ययन चिंता जता रहे हैं। प्लास्टिक में मौजूद केमिकल्स जैसे बिस्फेनॉल ए (BPA), फ्थेलेट्स और अन्य एडिटिव्स गर्मी के संपर्क में आने पर खाने में घुल सकते हैं। ये केमिकल्स एंडोक्राइन डिसरप्टर्स के रूप में काम करते हैं, जो शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित करते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि गर्म खाना प्लास्टिक में रखने से इन केमिकल्स का लीकेज बढ़ जाता है, खासकर अगर कंटेनर पुराना हो या बार-बार इस्तेमाल किया गया हो। इससे माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनोप्लास्टिक्स भी खाने में मिल सकते हैं, जो शरीर में जमा होकर लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य संस्थाओं ने इन केमिकल्स के नियमित संपर्क को डायबिटीज, मोटापा, हृदय रोग और हार्मोन संबंधी कैंसर से जोड़ा है। BPA और फ्थेलेट्स हार्मोन जैसे एस्ट्रोजन की नकल करते हैं, जिससे ब्रेस्ट कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और अन्य हार्मोन संवेदनशील कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। अध्ययनों में पाया गया है कि प्लास्टिक कंटेनरों को माइक्रोवेव में गर्म करने पर लाखों माइक्रोप्लास्टिक्स और अरबों नैनोप्लास्टिक्स निकल सकते हैं। ये कण शरीर में प्रवेश करके सेलुलर स्तर पर प्रभाव डालते हैं, हालांकि मानव शरीर पर इनके पूर्ण प्रभाव की जांच जारी है। प्लास्टिक के प्रकार भी महत्वपूर्ण हैं। कुछ प्लास्टिक जैसे पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) और पॉलीस्टाइरीन में फ्थेलेट्स और स्टाइरीन अधिक होते हैं, जो गर्मी पर आसानी से लीक होते हैं। पॉलीप्रोपाइलीन (PP) और पॉलीइथाइलीन (PE) आधारित कंटेनरों में भी गर्मी पर माइक्रोप्लास्टिक्स निकलते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि एसिडिक या तैलीय खाने में ये केमिकल्स अधिक घुलते हैं। ब्लैक प्लास्टिक कंटेनरों में फ्लेम रिटार्डेंट्स जैसे डेकाBDE मिल सकते हैं, जो गर्मी पर खाने में मिलकर एंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित करते हैं।
खाने की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक से 9000 से अधिक केमिकल्स की पहचान हुई है, जिनमें से कई की विषाक्तता का आकलन नहीं हुआ है। इनमें से कुछ ब्रेस्ट कैंसर से जुड़े कार्सिनोजेंस हैं, जो खाने में माइग्रेट कर सकते हैं। गर्म खाने को प्लास्टिक में पैक करने से ये माइग्रेशन बढ़ जाता है। माइक्रोप्लास्टिक्स शरीर में जमा होकर इम्यून सिस्टम और सेलुलर फंक्शन को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ अध्ययनों में माइक्रोप्लास्टिक्स को ब्रेस्ट कैंसर सेल्स की प्रोग्रेशन से जोड़ा गया है। नियमित रूप से प्लास्टिक में गर्म खाना स्टोर करने या गर्म करने से फ्थेलेट्स और BPA का स्तर शरीर में बढ़ सकता है, जो प्रजनन संबंधी समस्याएं, विकास संबंधी विकार और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर पैदा कर सकता है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं में ये प्रभाव अधिक गंभीर हो सकते हैं। प्लास्टिक रीसाइक्लिंग कोड 3, 6 और 7 वाले कंटेनरों में BPA या समान केमिकल्स अधिक होते हैं, जबकि 2, 4 और 5 अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन गर्मी पर सभी में लीकेज की संभावना रहती है।
खाने की पैकेजिंग में PFAS जैसे फॉरएवर केमिकल्स भी इस्तेमाल होते हैं, जो कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े हैं। गर्म खाने में ये अधिक लीक होते हैं। अध्ययनों में पाया गया है कि टेकअवे कंटेनरों से माइक्रोप्लास्टिक्स का लीकेज अधिक होता है। प्लास्टिक को बार-बार गर्म करने या डिशवॉशर में धोने से भी केमिकल्स निकलते हैं। भारत में फूड डिलीवरी में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक कंटेनरों में BPA की मात्रा अधिक पाई गई है, जो गर्म खाने के संपर्क में आने पर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ाती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि गर्म खाने को प्लास्टिक में पैक करने से बचें, क्योंकि इससे हार्मोनल असंतुलन, डायबिटीज और कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि कुछ अध्ययनों में सीधा सबूत नहीं मिला है, लेकिन लंबे समय के संपर्क को जोखिमपूर्ण माना जाता है। प्लास्टिक से निकलने वाले केमिकल्स शरीर में जमा होकर धीरे-धीरे प्रभाव डालते हैं। माइक्रोप्लास्टिक्स रक्त, प्लेसेंटा और अन्य अंगों में पाए गए हैं। गर्म खाने को प्लास्टिक में रखने से ये प्रभाव तेज होते हैं। वैज्ञानिक सिफारिश है कि गर्म खाने को कांच, स्टील या सिरेमिक कंटेनरों में ट्रांसफर करें। माइक्रोवेव में प्लास्टिक का इस्तेमाल न करें, भले ही माइक्रोवेव-सेफ लिखा हो।
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