उत्तराखंड के चकोड़ी में बुजुर्ग दंपति ने बंजर पहाड़ी को हरा-भरा जंगल बनाया- 29 साल पहले शुरू की थी मेहनत, आज दिखा रही है कमाल।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित चकोड़ी (चौकुरी) गांव में एक बुजुर्ग दंपति ने बंजर और पथरीली पहाड़ी को मेहनत से घने जंगल में बदल
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित चकोड़ी (चौकुरी) गांव में एक बुजुर्ग दंपति ने बंजर और पथरीली पहाड़ी को मेहनत से घने जंगल में बदल दिया है। दंपति के नाम नारायण सिंह मेहरा (78 वर्ष) और नंदा देवी (70 वर्ष) हैं। साल 1996 में जब वे चकोड़ी पहुंचे तब यहां सिर्फ खुला मैदान और बंजर जमीन थी, जहां कोई हरा-भरा कवर नहीं था। नंदा देवी को गांव में रहने तथा जंगलों के बीच जीवन बिताने का शौक था, इसलिए उन्होंने पति से जिद की कि वे चकोड़ी के पहाड़ों पर बसें। नारायण सिंह मेहरा होर्टिकल्चर विभाग से रिटायर्ड हैं तथा पेड़-पौधों की अच्छी जानकारी रखते हैं। उन्होंने इस ज्ञान का उपयोग करके बंजर भूमि पर पौधे लगाने की शुरुआत की तथा दंपति ने मिलकर हजारों पेड़-पौधे लगाए।
दंपति ने पौधों को बच्चों की तरह पाला तथा उनकी देखभाल की। शुरू में जमीन इतनी बंजर थी कि पौधे उगाना मुश्किल था, लेकिन लगातार प्रयास से मिट्टी की गुणवत्ता सुधरी तथा आज वहां घना जंगल खड़ा है। यहां विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे हैं तथा पूरा क्षेत्र हरा-भरा हो गया है। नंदा देवी ने बताया कि उन्हें गांव जीवन तथा प्रकृति से लगाव था, इसलिए उन्होंने शहर छोड़कर यहां बसने का फैसला किया। दंपति ने बंजर पहाड़ी को उपजाऊ बनाने के लिए निरंतर मेहनत की तथा पेड़ लगाने की प्रक्रिया को कभी नहीं रोका।
यह मानव निर्मित जंगल आज पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है तथा स्थानीय जैव विविधता को बढ़ावा दे रहा है। दंपति ने पौधों को बड़े होने तक उनकी सुरक्षा तथा पानी की व्यवस्था की। नारायण सिंह मेहरा के होर्टिकल्चर का अनुभव यहां काम आया तथा उन्होंने उपयुक्त प्रजातियों का चयन किया। आज यह जंगल दर्शकों को आकर्षित करता है तथा पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण बन चुका है। दंपति की यह पहल 1996 से जारी है तथा वर्षों की मेहनत से परिणाम सामने आए हैं। बंजर जमीन अब हरी-भरी पहाड़ी बन गई है तथा यहां हजारों पेड़ लगे हैं। यह प्रयास पर्यावरण संरक्षण तथा व्यक्तिगत दृढ़ता का प्रतीक है। चकोड़ी क्षेत्र में यह जंगल पर्यटन तथा स्थानीय लोगों के लिए लाभदायक साबित हो रहा है। दंपति ने पौधों को पालने में कोई कसर नहीं छोड़ी तथा आज उनका प्रयास फल-फूल रहा है।
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