घने कोहरे और कड़ाके की ठंड से फसलों पर बढ़ा खतरा, कृषि विशेषज्ञों ने जारी की एडवाइजरी – गेहूं, सरसों, चना, टमाटर-मिर्च की सुरक्षा के लिए तुरंत अपनाएं ये उपाय।
उत्तर भारत में इन दिनों पड़ रही कड़ाके की ठंड और घना कोहरा फसलों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय
उत्तर भारत में इन दिनों पड़ रही कड़ाके की ठंड और घना कोहरा फसलों के लिए गंभीर खतरा बन गया है। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. खलील खान ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि कम तापमान और उच्च आर्द्रता के कारण कीटों और रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। विशेष रूप से गेहूं, राई-सरसों, चना, टमाटर और मिर्च की फसलें सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं।
डॉ. खलील खान के अनुसार ठंड और कोहरे से फसलों में कई तरह के रोग फैलने की आशंका है। गेहूं में मुख्य खतरा पीला रतुआ (पीला रस्ट) और करनाल बंट रोग का है। पीला रतुआ के कारण पत्तियों पर पीले-नारंगी धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में काले हो जाते हैं। इससे फसल की पैदावार में 20 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। करनाल बंट में दाने काले और बदबूदार हो जाते हैं जिससे अनाज की गुणवत्ता पूरी तरह खराब हो जाती है। राई-सरसों की फसल में अल्टरनेरिया लीफ ब्लाइट और सफेद रतुआ (व्हाइट रस्ट) का खतरा बढ़ गया है। अल्टरनेरिया में पत्तियों पर गहरे भूरे-काले धब्बे बनते हैं जो बाद में छिद्रों में बदल जाते हैं। सफेद रतुआ में पत्तियों और तनों पर सफेद-चूने जैसे धब्बे दिखाई देते हैं। दोनों रोगों से तेल वाली फसल की पैदावार में 30 से 50 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है।
चना की फसल में अस्कोकाइटा ब्लाइट और बॉट्रीटिस ग्रे मोल्ड का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। अस्कोकाइटा में तनों और पत्तियों पर गहरे भूरे धब्बे बनते हैं जिससे पौधा सूखने लगता है। बॉट्रीटिस में फूल और फलियां सड़ने लगती हैं। इन रोगों से चने की पैदावार में 40 से 60 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है।
टमाटर और मिर्च की सब्जी फसलों में लेट ब्लाइट और अर्ली ब्लाइट का खतरा सबसे ज्यादा है। लेट ब्लाइट में पत्तियों और फलों पर गहरे भूरे-काले धब्बे बनते हैं जो बाद में सड़ जाते हैं। अर्ली ब्लाइट में पत्तियों पर गोलाकार भूरे धब्बे बनते हैं जिनमें काले छल्ले होते हैं। दोनों रोगों से सब्जी उत्पादन में 50 से 70 प्रतिशत तक नुकसान संभव है। कृषि विशेषज्ञों ने इन रोगों से बचाव के लिए तुरंत उपाय अपनाने की सलाह दी है। गेहूं में पीला रतुआ रोकने के लिए प्रोपिकोनाजोल या टेब्यूकॉनाजोल आधारित फफूंदनाशक का छिड़काव किया जा सकता है। पहला छिड़काव रोग के लक्षण दिखते ही और दूसरा 10-15 दिन बाद करना चाहिए। करनाल बंट से बचाव के लिए बीज उपचार बहुत जरूरी है। बीज को कार्बेन्डाजिम या थाइरम से उपचारित करके बोना चाहिए।
राई-सरसों में अल्टरनेरिया और सफेद रतुआ के लिए मैनकोजेब या क्लोरथालोनिल का छिड़काव प्रभावी है। पहला छिड़काव फूल आने से पहले और दूसरा फूल आने के बाद किया जाना चाहिए। चने में अस्कोकाइटा ब्लाइट रोकने के लिए क्लोरथालोनिल या मैनकोजेब का उपयोग करें। बॉट्रीटिस से बचाव के लिए इप्रोवैलिकार्ब या फेनहेक्सामिड का छिड़काव उपयुक्त है। टमाटर और मिर्च में लेट ब्लाइट के लिए मेटालैक्सिल-एम या फॉसेटिल-एल्यूमीनियम का छिड़काव किया जा सकता है। अर्ली ब्लाइट रोकने के लिए मैनकोजेब या क्लोरथालोनिल प्रभावी है। छिड़काव सुबह के समय या शाम को करना चाहिए ताकि फसल पर धूप न पड़े।
किसानों को सलाह दी गई है कि फसल में नमी कम रखें। अधिक नमी रोगों को बढ़ावा देती है। खेत में पानी का ठहराव न होने दें। सिंचाई सुबह के समय करें और शाम को पानी न दें। खेत में हवा का प्रवाह अच्छा रखें। घने पौधों को पतला करें। बीज उपचार को अनिवार्य बनाएं। सभी फसलों के लिए प्रमाणित और उपचारित बीज का उपयोग करें। रोगग्रस्त पौधों को तुरंत उखाड़कर नष्ट कर दें। खेत की सफाई बनाए रखें। पुराने पौधों के अवशेषों को जलाएं। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे समय-समय पर खेतों का निरीक्षण करें। रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही तुरंत कार्रवाई करें। देरी से नुकसान बहुत अधिक हो सकता है। विशेषज्ञों ने कहा कि सही समय पर सही दवा का सही मात्रा में उपयोग ही फसल को बचाने का एकमात्र तरीका है।
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