पश्चिम एशिया में कूटनीतिक गतिरोध गहराया, ट्रंप ने ईरान के शांति प्रस्ताव को बताया ‘बेवकूफी भरा’
आर्थिक विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अनुमान जताया है कि यदि कूटनीतिक गतिरोध इसी तरह बना रहा, तो तेल की कीमतें पूरे वर्ष 100 डॉलर के आसपास ही मंडराती रह सकती हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों
- होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और तेल संकट पर मंडराए बादल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 103 डॉलर के पार
- ट्रंप की चीन यात्रा से पहले बढ़ी तल्खी, बीजिंग के दबाव और ईरान की कड़ी शर्तों के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ी हलचल
पश्चिम एशिया में जारी लंबे संघर्ष को समाप्त करने और वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माने जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित बनाने की दिशा में चल रही अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। अमेरिका की ओर से ईरान को भेजे गए 14 सूत्रीय अल्पकालिक समझौता प्रस्ताव पर तेहरान ने अपना विस्तृत जवाब भेजा था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सिरे से खारिज करते हुए इसे एक 'बेवकूफी भरा प्रस्ताव' करार दिया है। इस तीखी प्रतिक्रिया ने उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, जो पिछले कुछ दिनों से शांति बहाली की संभावनाओं के रूप में देखी जा रही थीं। ट्रंप के इस रुख के बाद अब यह स्पष्ट होता दिख रहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास की खाई पहले से कहीं अधिक गहरी हो गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के जवाब को न केवल 'अस्वीकार्य' बताया, बल्कि सार्वजनिक मंचों पर इसकी कड़ी आलोचना भी की। उनकी इस प्रतिक्रिया के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आशंका बढ़ गई है कि पिछले दो महीनों से अधिक समय से जारी यह संघर्ष अब और अधिक लंबा खिंच सकता है। ट्रंप के बयान का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ा है, जहाँ अनिश्चितता के माहौल के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें करीब दो प्रतिशत की उछाल के साथ 103 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंताजनक संकेत है, क्योंकि ऊर्जा की कीमतों में लगातार वृद्धि मुद्रास्फीति और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान को और अधिक गंभीर बना सकती है।
आर्थिक विश्लेषकों और बाजार विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अनुमान जताया है कि यदि कूटनीतिक गतिरोध इसी तरह बना रहा, तो तेल की कीमतें पूरे वर्ष 100 डॉलर के आसपास ही मंडराती रह सकती हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि बुधवार से शुरू हो रही ट्रंप की चीन यात्रा से पहले किसी भी बड़े सकारात्मक बदलाव की संभावना न के बराबर है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि ट्रंप बीजिंग पहुंचने पर चीनी नेतृत्व के साथ होने वाली अपनी द्विपक्षीय बैठकों में ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बनाने की मांग प्रमुखता से कर सकते हैं। अमेरिका की रणनीति अब चीन को इस संकट में एक मध्यस्थ के बजाय एक दबाव बनाने वाले पक्ष के रूप में शामिल करने की दिख रही है। ईरान ने रविवार को पाकिस्तान के माध्यम से अपना जवाब अमेरिका को सौंपा था, जो मध्यस्थता की भूमिका निभा रहा है। इस जवाब में ईरान ने बेहद कड़ी शर्तें रखी थीं, जिनमें लेबनान सहित सभी युद्ध मोर्चों पर तत्काल सीजफायर, युद्ध के दौरान हुए भारी नुकसान के लिए आर्थिक मुआवजा और होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की संप्रभुता को पूर्ण मान्यता देने की मांग शामिल थी। इसके अलावा, तेहरान ने अमेरिका से उसकी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत हटाने और ईरानी तेल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों को समाप्त करने की बात भी कही थी। ईरान का यह रुख स्पष्ट करता है कि वह केवल सुरक्षा के मुद्दे पर समझौता करने के बजाय अपनी क्षेत्रीय स्थिति और आर्थिक हितों को पूरी तरह सुरक्षित करना चाहता है।
होर्मुज स्ट्रेट का संकट
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल पारगमन केंद्र है, जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। ईरान द्वारा इस जलमार्ग पर अपना नियंत्रण बढ़ाने और अमेरिका द्वारा की गई नाकेबंदी ने व्यापारिक जहाजों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। वर्तमान में इस क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति और झड़पों के कारण बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे परिवहन लागत बढ़ गई है और वैश्विक स्तर पर माल ढुलाई प्रभावित हुई है।
ईरानी जवाब मिलने के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में स्पष्ट रूप से लिखा कि उन्होंने ईरानी प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है, लेकिन यह उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्होंने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया, हालांकि इसके पीछे कोई विशेष तकनीकी कारण स्पष्ट नहीं किया गया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि ईरान की मांगें उसकी वर्तमान स्थिति के अनुसार बहुत अधिक 'महत्वाकांक्षी' हैं और वे बिना किसी ठोस परमाणु प्रतिबद्धता के प्रतिबंधों को हटाने के पक्ष में नहीं हैं। इस तनातनी ने कूटनीतिक रास्तों को लगभग बंद कर दिया है, जिससे युद्ध के मैदान में तनाव कम होने की जगह बढ़ने के आसार नजर आ रहे हैं। दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्रालय ने अपने प्रस्ताव का बचाव करते हुए इसे 'वैध और जिम्मेदार' करार दिया है। तेहरान का तर्क है कि अमेरिका को एकतरफा दबाव बनाने की अपनी नीति छोड़नी चाहिए और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए समुद्री नाकेबंदी हटानी चाहिए। ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। जैसे-जैसे राष्ट्रपति ट्रंप की बीजिंग यात्रा का समय नजदीक आ रहा है, पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या चीन इस मामले में हस्तक्षेप कर ईरान को लचीला रुख अपनाने के लिए प्रेरित करेगा या पश्चिम एशिया का यह बारूद का ढेर एक बड़ी वैश्विक आपदा में बदल जाएगा।
What's Your Reaction?







