खाद्य तेल पर आत्मनिर्भरता का आह्वान- प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से कुकिंग ऑयल के संतुलित उपयोग की अपील की
प्रधानमंत्री की इस अपील का एक दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू जन-स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। आधुनिक जीवनशैली में तले हुए और अत्यधिक वसायुक्त भोजन के कारण बढ़ती बीमारियों पर प्रधानमंत्री ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि खाने के तेल का अत्यधिक उपयोग हृदय रोगों,
- विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता बोझ: खाने के तेल के भारी आयात को कम करने के लिए प्रधानमंत्री ने सुझाया स्वदेशी का रास्ता
- सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए लाभकारी: पीएम मोदी ने तिलहन उत्पादन बढ़ाने और तेल की खपत घटाने पर दिया जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने ताजा संबोधन में देश की आर्थिक सेहत और आम नागरिकों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण अपील की है। उन्होंने देशवासियों से दैनिक आहार में खाने के तेल यानी कुकिंग ऑयल के इस्तेमाल को कम करने का आग्रह किया है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। इस आयात के बदले भारत को प्रतिवर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है, जो देश की अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा वित्तीय भार डालती है। प्रधानमंत्री का मानना है कि यदि देश का हर नागरिक अपने भोजन में तेल की खपत में थोड़ी भी कमी लाता है, तो सामूहिक रूप से यह देश के खजाने को बचाने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में से एक है। प्रधानमंत्री ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया है कि पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी के तेल के लिए हम काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर निर्भर हैं। जब वैश्विक बाजारों में इन तेलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है, तो उसका सीधा असर भारत के मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों की रसोई के बजट पर पड़ता है। प्रधानमंत्री ने तर्क दिया है कि आयात पर इस निर्भरता को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका 'डिमांड' और 'सप्लाई' के बीच के अंतर को कम करना है। उन्होंने कहा कि तेल के संतुलित उपयोग से न केवल देश का पैसा बचेगा, बल्कि यह कदम भारत को 'खाद्य तेल आत्मनिर्भरता' की दिशा में तेजी से आगे ले जाने में सहायक सिद्ध होगा।
प्रधानमंत्री की इस अपील का एक दूसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू जन-स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। आधुनिक जीवनशैली में तले हुए और अत्यधिक वसायुक्त भोजन के कारण बढ़ती बीमारियों पर प्रधानमंत्री ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि खाने के तेल का अत्यधिक उपयोग हृदय रोगों, मोटापे और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का मुख्य कारण बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री ने आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय भोजन पद्धतियों का हवाला देते हुए बताया कि हमारे पूर्वज सीमित और शुद्ध तेल का उपयोग करते थे, जिससे वे अधिक स्वस्थ रहते थे। तेल के इस्तेमाल में कटौती करने का आह्वान केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह देश के नागरिकों को एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने का एक सामाजिक अभियान भी है। खाद्य तेल के आयात पर भारत सालाना लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। तेल की खपत में महज 10 प्रतिशत की कमी भी देश की अर्थव्यवस्था में हजारों करोड़ रुपये की बचत कर सकती है, जिसे अन्य विकास कार्यों में लगाया जा सकता है। सरकार की रणनीति केवल खपत कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री ने घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर भी विशेष बल दिया है। उन्होंने देश के किसानों से आग्रह किया है कि वे अधिक से अधिक रकबे में सरसों, मूंगफली, तिल और सोयाबीन जैसी फसलों की खेती करें। इसके लिए सरकार 'राष्ट्रीय तिलहन मिशन' जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों को आधुनिक बीज, सिंचाई की सुविधाएं और बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रदान करने की दिशा में काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि जब देश का किसान अधिक तिलहन उगाएगा और देश का नागरिक तेल का संभलकर उपयोग करेगा, तभी भारत विदेशी तेल के चंगुल से पूरी तरह मुक्त हो पाएगा और 'आत्मनिर्भर भारत' का संकल्प सिद्ध होगा।
प्रधानमंत्री ने मध्यम वर्ग और शहरी आबादी से अपनी खान-पान की आदतों में बदलाव लाने की विशेष विनती की है। उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अपने पारंपरिक स्थानीय तेलों, जैसे सरसों का तेल, नारियल तेल और मूंगफली के तेल को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो हमारे शरीर की बनावट और क्षेत्रीय जलवायु के अनुकूल हैं। अक्सर विदेशी और रिफाइंड तेलों के विज्ञापन के प्रभाव में आकर लोग अपने पारंपरिक और स्वास्थ्यवर्धक विकल्पों को भूलते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री का मानना है कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और छोटे तेल मिल मालिकों को भी रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे। यह 'वोकल फॉर लोकल' अभियान का ही एक विस्तार है जो रसोई घर से शुरू होता है। विदेशी मुद्रा भंडार के प्रबंधन के दृष्टिकोण से प्रधानमंत्री का यह बयान अत्यंत सामयिक है। अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक स्थितियों के कारण कई बार खाद्य तेल की आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो जाती है, जिससे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि हम अपनी जरूरतों के लिए स्वयं पर निर्भर रहेंगे, तो वैश्विक संकटों का हमारे देश पर न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने उद्योगों और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर से भी अपील की है कि वे ऐसे उत्पादों के निर्माण पर ध्यान दें जिनमें तेल की मात्रा कम हो और जो स्वास्थ्य मानकों पर खरे उतरते हों। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से इस विषय को एक जन-आंदोलन बनाने की अपेक्षा की है, ताकि हर घर अपनी जिम्मेदारी समझे।
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