द्विपक्षीय संबंधों में 'पिघलेगी बर्फ'? राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ट्रंप की मुलाकात पर टिकी दुनिया की निगाहें, व्यापार और सुरक्षा होंगे मुख्य मुद्दे
सुरक्षा के मोर्चे पर, ताइवान और ईरान का मुद्दा वार्ता की मेज पर सबसे जटिल रहने वाला है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और हाल ही में अमेरिका द्वारा ताइवान को किए गए बड़े हथियारों के सौदे से बीजिंग नाराज रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस मुलाकात के दौरान अमेरिका को ताइवान के मामले में संय
- नौ साल बाद चीनी सरजमीं पर अमेरिकी राष्ट्रपति: डोनाल्ड ट्रंप के बीजिंग दौरे से वैश्विक राजनीति में नई हलचल
- व्यापार युद्ध और क्षेत्रीय सुरक्षा का नया अध्याय: अमेरिकी राष्ट्रपति के चीन दौरे से बदलेंगे कूटनीतिक समीकरण, बड़े समझौतों की उम्मीद
करीब नौ साल के लंबे अंतराल के बाद, कोई अमेरिकी राष्ट्रपति एक बार फिर चीन की आधिकारिक यात्रा पर बीजिंग की धरती पर कदम रखने जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 13 मई से 15 मई 2026 तक चीन के महत्वपूर्ण दौरे पर रहेंगे, जहाँ उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होगी। यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति के दो सबसे शक्तिशाली देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों को एक नई दिशा देने की कोशिश माना जा रहा है। गौरतलब है कि आखिरी बार नवंबर 2017 में ट्रंप ने ही राष्ट्रपति के रूप में चीन का दौरा किया था, जिसके बाद जो बाइडन के कार्यकाल के दौरान कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति चीन नहीं गया। इस यात्रा की पुष्टि दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों ने कर दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक हलचलें तेज हो गई हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप की इस यात्रा का कार्यक्रम पहले मार्च और अप्रैल के लिए निर्धारित था, लेकिन पश्चिम एशिया में ईरान के साथ बढ़ते तनाव और युद्ध की स्थितियों के कारण इसे टाल दिया गया था। अब, जबकि वैश्विक परिस्थितियां एक नए मोड़ पर हैं, ट्रंप का यह दौरा व्यापारिक शुल्कों (Tariffs), ताइवान मामले और मध्य पूर्व के संकट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केंद्रित रहने वाला है। बीजिंग में ट्रंप का भव्य स्वागत करने की तैयारियां की जा रही हैं, जिसमें 'टेम्पल ऑफ हेवन' का दौरा और एक विशेष राजकीय भोज (State Banquet) शामिल है। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच 'फ्रेजाइल स्टेबिलिटी' यानी एक नाजुक स्थिरता बनाए रखने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में तकनीक, दक्षिण चीन सागर और व्यापारिक असंतुलन को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने रहे हैं। इस शिखर सम्मेलन के एजेंडे में सबसे ऊपर आर्थिक और व्यापारिक मुद्दे रहने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन ने हाल के समय में चीन से आने वाली वस्तुओं पर कड़े शुल्क लगाए हैं, जिसका चीन ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया है। अब इस दौरे के माध्यम से एक ऐसे 'मैनेज्ड ट्रेड' फ्रेमवर्क पर चर्चा होने की उम्मीद है, जिससे दोनों देशों के व्यापारिक हितों की रक्षा हो सके। अमेरिका की प्राथमिकता चीन के बाजारों तक पहुंच आसान बनाना और बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वहीं, चीन चाहता है कि उसकी टेक कंपनियों और इलेक्ट्रिक वाहनों पर लगाए गए प्रतिबंधों में ढील दी जाए। इस दौरान अमेरिका के कई दिग्गज सीईओ (CEOs) का प्रतिनिधिमंडल भी ट्रंप के साथ रहेगा, जो बड़े व्यावसायिक समझौतों की उम्मीद कर रहा है। साल 2017 के बाद पहली बार कोई अमेरिकी राष्ट्रपति बीजिंग पहुंच रहा है। जो बाइडन के पूरे कार्यकाल में कोई आधिकारिक चीन यात्रा न होना दोनों देशों के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाता था, जिसे अब ट्रंप कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
सुरक्षा के मोर्चे पर, ताइवान और ईरान का मुद्दा वार्ता की मेज पर सबसे जटिल रहने वाला है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और हाल ही में अमेरिका द्वारा ताइवान को किए गए बड़े हथियारों के सौदे से बीजिंग नाराज रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस मुलाकात के दौरान अमेरिका को ताइवान के मामले में संयम बरतने की चेतावनी दे सकते हैं। वहीं, ट्रंप प्रशासन चीन पर दबाव डालेगा कि वह ईरान से तेल की खरीद कम करे और मध्य पूर्व में स्थिरता लाने में अपनी भूमिका निभाए। इसके अलावा, परमाणु हथियार नियंत्रण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के सैन्य उपयोग जैसे आधुनिक सुरक्षा खतरों पर भी दोनों नेताओं के बीच रणनीतिक संवाद होने की संभावना है, जो भविष्य की वैश्विक सुरक्षा प्रणाली को प्रभावित करेगा।
बीजिंग से आ रही खबरों के अनुसार, ट्रंप के इस दौरे के लिए सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं। अमेरिकी वायुसेना के सी-17 विमान और विशेष सुरक्षा वाहन पहले ही बीजिंग पहुंच चुके हैं। चीन इस यात्रा को दुनिया के सामने अपनी बढ़ती वैश्विक ताकत और अमेरिका के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद करने की क्षमता के रूप में प्रदर्शित करना चाहता है। ट्रंप के साथ उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप और परिवार के अन्य सदस्य भी व्यक्तिगत क्षमता में मौजूद रह सकते हैं, जो इस राजकीय यात्रा को एक निजी कूटनीतिक स्पर्श भी देगा। राजभवन और विदेश मंत्रालय के बीच प्रोटोकॉल और बैठकों के दौर को लेकर लगातार बातचीत जारी है ताकि 13 मई को ट्रंप के पहुंचने पर सब कुछ त्रुटिहीन रहे। इस दौरे को लेकर पूरी दुनिया में उत्सुकता इसलिए भी है क्योंकि ट्रंप की कार्यशैली अक्सर अप्रत्याशित रही है। जहाँ एक ओर वे व्यापारिक सौदों के लिए कड़े रुख अपनाते हैं, वहीं वे व्यक्तिगत केमिस्ट्री के जरिए बड़े समाधान निकालने के लिए भी जाने जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह वार्ता सफल रहती है, तो इससे न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, बल्कि वैश्विक शेयर बाजारों में भी तेजी आएगी। इसके विपरीत, यदि ताइवान या ईरान जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, तो भविष्य में व्यापार युद्ध और बढ़ सकता है। ट्रंप की इस यात्रा के दौरान 'पीपल-टू-पीपल' एक्सचेंज यानी दोनों देशों के नागरिकों के बीच आपसी संपर्क को फिर से बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा, जो कोरोना महामारी के बाद से काफी कम हो गया था।
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