पद के अहंकार में भूलीं मर्यादा तो पति ने कहा- नौकरी छोड़ो तभी घर में मिलेगी जगह।
पारिवारिक रिश्तों में मर्यादा और सम्मान की अहमियत सबसे ऊपर होती है, लेकिन जब अहंकार रिश्तों पर हावी होने लगे, तो सुखद
- ससुर के अपमान पर पति का कड़ा फैसला, पत्नी के सामने रखी नौकरी छोड़ने की बड़ी शर्त
- आर्थिक स्वावलंबन बनाम पारिवारिक सम्मान, बहू के तानों ने उजाड़ा हंसता-खेलता घर
पारिवारिक रिश्तों में मर्यादा और सम्मान की अहमियत सबसे ऊपर होती है, लेकिन जब अहंकार रिश्तों पर हावी होने लगे, तो सुखद संसार भी बिखरने की कगार पर पहुँच जाता है। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जहाँ एक शिक्षित और कामकाजी बहू द्वारा अपने ससुर के प्रति किए गए दुर्व्यवहार ने वैवाहिक जीवन में बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। पिता के निरंतर हो रहे अपमान से आहत होकर पति ने एक ऐसा सख्त कदम उठाया, जिसने पूरे परिवार को स्तब्ध कर दिया है। पति ने स्पष्ट शर्त रखी है कि उसकी पत्नी तभी घर की दहलीज पर कदम रखेगी जब वह अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे देगी, क्योंकि उसे लगता है कि उसकी पत्नी के पद और वेतन ने उसे अपनों का अनादर करना सिखा दिया है। मेरठ के एक प्रतिष्ठित परिवार में उपजा यह विवाद धीरे-धीरे तूल पकड़ता गया और अंततः पुलिस के परिवार परामर्श केंद्र तक पहुँच गया। मिली जानकारी के अनुसार, युवक और युवती का विवाह करीब तीन साल पहले बड़ी धूमधाम से हुआ था। पति एक निजी फर्म में कार्यरत है, जबकि पत्नी एक नामी कंपनी में अच्छे पद पर तैनात है। विवाह के शुरुआती कुछ महीनों तक सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, पत्नी का व्यवहार अपने ससुर के प्रति बदलने लगा। आरोप है कि वह घर के बुजुर्ग सदस्य को उनकी उम्र और उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर आए दिन ताने मारती थी। बात तब और बिगड़ गई जब ससुर की छोटी-छोटी जरूरतों पर भी बहू ने उंगली उठाना शुरू कर दिया और उन्हें परिवार पर बोझ की तरह पेश किया।
पारिवारिक क्लेश का मुख्य कारण बहू का यह मानना था कि वह घर में सबसे अधिक कमाती है, इसलिए घर के नियम और अनुशासन उसके अनुसार होने चाहिए। ससुर, जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं और घर के बड़े होने के नाते सम्मान के हकदार थे, उन्हें अपमानित करना बहू की दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। पति ने कई बार अपनी पत्नी को समझाने का प्रयास किया और उसे याद दिलाया कि उसके पिता ने उसे पालने-पोसने में कितनी कुर्बानियां दी हैं, लेकिन पत्नी पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। वह अक्सर अपने पद और वेतन का हवाला देकर ससुर को यह अहसास कराती थी कि उनकी राय की घर में कोई अहमियत नहीं है। विवाद का चरम तब आया जब एक शाम ससुर ने घर में किसी छोटी सी बात पर आपत्ति जताई। इस पर बहू ने आपा खो दिया और बुजुर्ग ससुर को सबके सामने भला-बुरा कह दिया। इस घटना ने पति के धैर्य का बांध तोड़ दिया। उसने देखा कि जिस पिता ने उसे जीवन की हर सुख-सुविधा दी, आज वे अपने ही घर में एक बाहरी व्यक्ति की तरह अपमान सह रहे हैं। उसी रात पति ने अपनी पत्नी को उसके मायके भेज दिया और साफ कह दिया कि जब तक वह अपनी नौकरी से इस्तीफा नहीं दे देती, वह उसे वापस नहीं बुलाएगा। पति का तर्क है कि उसकी पत्नी को मिलने वाले उच्च वेतन ने उसके भीतर अहंकार भर दिया है, जिसके कारण वह रिश्तों की गरिमा भूल गई है।
कामकाजी महिलाओं और बुजुर्गों के बीच बढ़ता संवाद अंतराल
वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि आधुनिक जीवनशैली और आर्थिक स्वतंत्रता के कारण पारिवारिक ढांचों में बदलाव आ रहा है। जब परिवार का कोई सदस्य आर्थिक रूप से अधिक सक्षम हो जाता है, तो कभी-कभी उसके भीतर सत्ता का भाव आ जाता है। ऐसे में बुजुर्गों के अनुभव और उनकी उपस्थिति को कमतर आंकना एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है। पारिवारिक सामंजस्य के लिए यह आवश्यक है कि आर्थिक स्थिति चाहे जो भी हो, घर के बुजुर्गों का स्थान सदैव सर्वोच्च बना रहे।
पति द्वारा रखी गई इस शर्त ने कानूनी और सामाजिक मोर्चे पर एक नई बहस छेड़ दी है। पत्नी का कहना है कि उसने कड़ी मेहनत से यह मुकाम हासिल किया है और एक पारिवारिक विवाद के कारण वह अपना करियर दांव पर नहीं लगा सकती। उसने पति के इस फैसले को तानाशाही करार दिया है। दूसरी ओर, पति अपनी बात पर अडिग है। उसका कहना है कि उसे ऐसी संपत्ति या आय की आवश्यकता नहीं है जो उसके पिता के सम्मान की बलि मांगती हो। उसने परामर्श केंद्र में भी यही दोहराया कि यदि उसकी पत्नी घर में रहना चाहती है, तो उसे एक साधारण गृहिणी बनकर रहना होगा या कम से कम अपनी नौकरी का घमंड त्यागना होगा।
मामला अब सुलह-समझौते के दौर में है, जहाँ काउंसलर दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। परामर्श केंद्र के अधिकारियों ने पाया कि दोनों ही अपने-अपने स्टैंड पर अड़े हुए हैं। जहाँ पति इसे पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी मान रहा है, वहीं पत्नी इसे अपनी व्यक्तिगत आजादी और करियर पर हमला देख रही है। इस घटना ने समाज के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या करियर के लिए रिश्तों का बलिदान जायज है? और क्या पति का अपनी पत्नी को नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर करना सही समाधान है? इन सवालों के बीच एक बुजुर्ग पिता की स्थिति सबसे दयनीय बनी हुई है, जो अपने बेटे और बहू के बीच मचे इस घमासान का केंद्र बन गए हैं। पति ने परामर्श के दौरान स्पष्ट किया कि उसका विरोध नौकरी से नहीं, बल्कि उस मानसिकता से है जो काम के कारण पैदा हुई है। उसने कहा कि जब उसकी पत्नी काम पर नहीं होती थी, तब वह बहुत विनम्र थी, लेकिन जैसे ही उसे प्रमोशन मिला और उसकी सैलरी बढ़ी, उसने घर के बड़ों को नीचा दिखाना शुरू कर दिया। पति का मानना है कि यदि वह नौकरी छोड़ देगी, तो शायद वह फिर से वही पुरानी विनम्र पत्नी बन सकेगी जो रिश्तों की कद्र करती थी। हालांकि, काउंसलर इसे एक गलत धारणा मान रहे हैं और उनका प्रयास है कि पति अपनी शर्त वापस ले और पत्नी अपने व्यवहार में सुधार का लिखित आश्वासन दे।
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