आस्था के नाम पर विश्वासघात बर्दाश्त नहीं: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आरोपी मौलवी को राहत देने से किया इनकार, कहा- अपराध अत्यंत जघन्य।
दिल्ली हाईकोर्ट ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास और धार्मिक विश्वास की आड़ में किए जाने वाले अपराधों के खिलाफ एक
- दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'जिन्न' भगाने के नाम पर नाबालिग से दरिंदगी करने वाले मौलवी की जमानत याचिका खारिज।
- नाबालिग की लाचारी का उठाया फायदा: दिल्ली उच्च न्यायालय ने यौन शोषण के आरोपी की नियमित जमानत याचिका पर सुनाया फैसला, पोक्सो एक्ट की गंभीरता पर जोर।
दिल्ली हाईकोर्ट ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास और धार्मिक विश्वास की आड़ में किए जाने वाले अपराधों के खिलाफ एक कड़ा रुख अपनाते हुए उस आरोपी मौलवी को जमानत देने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया है, जिस पर एक नाबालिग लड़की के साथ बार-बार दुष्कर्म करने का आरोप है। यह मामला न केवल एक आपराधिक कृत्य है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और एक परिवार के विश्वास के साथ किए गए जघन्य धोखे का भी परिचायक है। अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि आरोपी ने पीड़ित लड़की के परिवार की धार्मिक आस्था और उनके डर का सहारा लेकर इस घृणित कार्य को अंजाम दिया। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि इस तरह के कृत्यों से समाज की नींव कमजोर होती है और ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की नरमी अपराधियों के हौसले बुलंद कर सकती है। अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों और बयानों के अनुसार, आरोपी मौलवी ने नाबालिग लड़की को यह विश्वास दिलाया था कि वह किसी 'जिन्न' के प्रभाव में है। परिवार, जो अपनी बेटी की मानसिक और शारीरिक स्थिति को लेकर चिंतित था, ने आरोपी पर अटूट विश्वास किया और उसे इलाज के लिए घर में आने-जाने की अनुमति दी। इसी स्थिति का फायदा उठाते हुए, आरोपी ने कथित तौर पर लड़की के साथ कई बार यौन शोषण किया। अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि आरोपी ने न केवल नाबालिग की शारीरिक अखंडता का उल्लंघन किया, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति और परिवार की लाचारी को एक औजार के रूप में इस्तेमाल किया। कानून की दृष्टि में, यह एक ऐसा मामला है जहां आरोपी ने संरक्षक और उपचारकर्ता की भूमिका का मुखौटा पहनकर एक रक्षक के बजाय भक्षक की भूमिका निभाई।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि जमानत देना केवल एक अधिकार नहीं है, बल्कि यह मामले की परिस्थितियों और समाज पर इसके प्रभाव पर निर्भर करता है। अदालत ने कहा कि पोक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में, विशेष रूप से जहां आरोपी का पीड़ित पर प्रभाव हो, वहां जमानत देना साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। अदालत ने नाबालिग के बयानों और मामले की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन किया, जिसमें बार-बार होने वाले यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई थी। आरोपी की ओर से दी गई दलीलें, जिनमें जांच में सहयोग करने और भागने की संभावना न होने की बात कही गई थी, अदालत को संतुष्ट करने में विफल रहीं क्योंकि अपराध की प्रकृति अत्यंत गंभीर और समाज के नैतिक ताने-बाने को चोट पहुँचाने वाली थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति धार्मिक गुरु या आध्यात्मिक उपचारकर्ता के रूप में कार्य करता है, तो समाज की उस पर एक विशेष जिम्मेदारी और भरोसा होता है। ऐसे पदों का दुरुपयोग करके यदि कोई यौन अपराध करता है, तो वह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि विश्वास की उस पवित्रता का भी अपमान है जो लोग धर्म और अध्यात्म में रखते हैं। अदालत ने सुनवाई के दौरान इस पक्ष को भी गंभीरता से लिया कि पीड़ित लड़की एक नाबालिग है और वह अपनी मर्जी जताने या विरोध करने की स्थिति में नहीं थी, खासकर तब जब उसे और उसके परिवार को यह डराया गया था कि 'जिन्न' से छुटकारा पाने के लिए ये धार्मिक अनुष्ठान अनिवार्य हैं। उच्च न्यायालय ने माना कि इस प्रकार का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर किया गया यौन शोषण किसी भी सामान्य दुष्कर्म के मामले से कहीं अधिक घातक होता है क्योंकि यह पीड़ित के मन में स्थायी भय और आघात पैदा करता है। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले की सुनवाई त्वरित गति से की जाए ताकि पीड़ित को जल्द न्याय मिल सके। आरोपी की नियमित जमानत याचिका को खारिज करते हुए अदालत ने निचली अदालत को साक्ष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी कहा।
कानूनी प्रावधानों और पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने जोर देकर कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों का संरक्षण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। नाबालिगों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों में समाज की चुप्पी और अंधविश्वास की भूमिका अक्सर अपराधियों को कवच प्रदान करती है, जिसे कानून के माध्यम से तोड़ना अनिवार्य है। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि कैसे आधुनिक युग में भी 'जिन्न' और 'भूत-प्रेत' जैसे अंधविश्वासों का सहारा लेकर प्रभावशाली पदों पर बैठे लोग मासूमों का शिकार करते हैं। इस आदेश के माध्यम से दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा संदेश दिया है कि धार्मिक या सामाजिक पद किसी भी व्यक्ति को कानून के शिकंजे से बचने का लाइसेंस नहीं देते हैं। पीड़ित परिवार ने इस फैसले पर संतोष व्यक्त किया है, हालांकि उनके लिए उस मानसिक वेदना से बाहर आना अभी भी एक बड़ी चुनौती है जिससे वे और उनकी बेटी गुजर रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के न्यायिक फैसले समाज में एक निवारक के रूप में कार्य करते हैं और पीड़ितों को न्याय के लिए आगे आने हेतु प्रोत्साहित करते हैं। मामले की जांच कर रही पुलिस टीम ने भी अदालत को आश्वस्त किया है कि वे सभी आवश्यक साक्ष्य जुटा रहे हैं ताकि मुकदमे के दौरान आरोपी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि इस चरण में जमानत देने से पीड़ित और उसके परिवार के मन में भय का माहौल पैदा हो सकता है, जो निष्पक्ष सुनवाई के लिए घातक होगा।
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