केरल हाईकोर्ट की फटकार- 100 वर्षीय मां को 2000 रुपये भरण-पोषण देने से इनकार करने वाले बेटे को शर्मिंदगी का पाठ पढ़ाया।
Kerala High Court: केरल हाईकोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को एक 57 वर्षीय बेटे को अपनी 100 वर्षीय मां को 2000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने से इनकार करने पर....
केरल हाईकोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को एक 57 वर्षीय बेटे को अपनी 100 वर्षीय मां को 2000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने से इनकार करने पर कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस पी. वी. कुन्हीकृष्णन ने कहा कि एक बेटे का अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल से मुंह मोड़ना शर्मनाक है। यह मामला कोल्लम के एक व्यक्ति ने दायर किया था, जो फैमिली कोर्ट के अप्रैल 2022 के उस आदेश को चुनौती दे रहा था, जिसमें उसे अपनी मां को 2000 रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने न केवल याचिका खारिज की, बल्कि यह भी कहा कि मां की देखभाल करना बेटे का कर्तव्य है, न कि दया। इस फैसले ने सामाजिक और नैतिक मूल्यों के साथ-साथ बच्चों की बुजुर्ग माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी पर जोर दिया।
यह मामला कोल्लम, केरल के उन्नीकृष्ण पिल्लै नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी 100 वर्षीय मां जर्नकी अम्मा उर्फ जर्नम्मा अम्मा को भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। 2017 में, जब मां 92 साल की थीं, उन्होंने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बेटे से 5000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने अप्रैल 2022 में बेटे को 2000 रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया।
उन्नीकृष्ण ने इस आदेश को लागू नहीं किया, जिसके कारण उनकी मां को वसूली की कार्यवाही शुरू करनी पड़ी। इसके बाद, 1149 दिन की देरी से, यानी 2025 में, उन्नीकृष्ण ने केरल हाईकोर्ट में संशोधन याचिका (RPFC No. 253 of 2025) दायर की। उनकी दलील थी कि उनकी मां उनके बड़े भाई के साथ रहती हैं, और उनके अन्य भाई-बहन भी हैं जो उनकी देखभाल कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी मां को अपने साथ रखने को तैयार हैं, लेकिन मां ने उनके बड़े भाई के कहने पर यह याचिका दायर की।
केरल हाईकोर्ट का फैसला
जस्टिस पी. वी. कुन्हीकृष्णन की एकल पीठ ने उन्नीकृष्ण की याचिका को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि मां के अन्य बच्चों की मौजूदगी या उनके द्वारा देखभाल किए जाने का दावा बेटे की जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं देता। कोर्ट ने भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत स्पष्ट किया कि माता-पिता की देखभाल करना हर बच्चे का कानूनी और नैतिक कर्तव्य है।
जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने अपनी टिप्पणी में कहा, "जब याचिका दायर की गई थी, तब याचिकाकर्ता की मां 92 साल की थीं, और अब वह 100 साल की हैं, फिर भी अपने बेटे से भरण-पोषण की उम्मीद कर रही हैं। मुझे इस समाज का हिस्सा होने पर शर्मिंदगी महसूस हो रही है, जहां एक बेटा अपनी 100 साल की मां को केवल 2000 रुपये मासिक भरण-पोषण देने से इनकार करने के लिए कोर्ट में लड़ रहा है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि मां की देखभाल करना कोई दान नहीं, बल्कि एक कर्तव्य है। जस्टिस ने उन्नीकृष्ण के इस दावे को खारिज कर दिया कि उनकी मां को भरण-पोषण की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह अपने बड़े भाई के साथ रहती हैं। कोर्ट ने कहा, "यह दुखद है कि याचिकाकर्ता अपनी मां की देखभाल करने को तैयार नहीं है और अलग-अलग दलीलों के साथ कोर्ट में भरण-पोषण देने से बचने की कोशिश कर रहा है।"
केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में न केवल कानूनी दृष्टिकोण से फैसला सुनाया, बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों पर भी जोर दिया। कोर्ट ने पहले के एक फैसले (7 फरवरी 2025) का हवाला दिया, जिसमें जस्टिस कौसर एडप्पागथ ने कहा था कि अगर माता-पिता रिश्तेदारों या दोस्तों की मदद से अपना गुजारा कर रहे हैं, तो भी बच्चों की उनके प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।
कोर्ट ने विभिन्न धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख करते हुए बच्चों की माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी को रेखांकित किया। हिंदू धर्म में, तैत्तिरीय उपनिषद का हवाला देते हुए कहा गया, "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव" (मां और पिता को भगवान की तरह मानो)। इस्लाम में, हदीस का जिक्र किया गया, जिसमें पैगंबर मुहम्मद ने माता-पिता की सेवा को जन्नत का रास्ता बताया। बाइबिल और बौद्ध धर्म के ग्रंथों में भी माता-पिता की देखभाल को पुण्य कार्य माना गया है।
कोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007, हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 20, और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A का भी जिक्र किया, जो बच्चों को अपने माता-पिता का सम्मान और देखभाल करने का कर्तव्य सौंपता है।
जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने अपनी टिप्पणी में समाज को एक गहरा संदेश दिया। उन्होंने कहा, "जो व्यक्ति अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल नहीं करता, उसे इंसान नहीं कहा जा सकता।" कोर्ट ने यह भी कहा कि एक मां अपने बच्चों के लिए सच्चा घर होती है, और हर उम्र में बच्चों को अपनी मां की जरूरत होती है।
यह मामला उस सामाजिक वास्तविकता को सामने लाता है, जहां कई बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों से उपेक्षा का सामना करते हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मां को कोर्ट में भरण-पोषण के लिए याचिका दायर करने की नौबत ही नहीं आनी चाहिए थी। जस्टिस ने कहा, "यह स्थिति अपने आप में दुखद है कि एक 100 साल की मां को अपने बेटे से 2000 रुपये के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।"
याचिकाकर्ता की दलीलें और कोर्ट की प्रतिक्रिया
उन्नीकृष्ण ने अपनी याचिका में दावा किया था कि उनकी मां को भरण-पोषण की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह अपने बड़े बेटे के साथ रहती हैं और अन्य भाई-बहन भी उनकी देखभाल कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपनी मां को अपने साथ रखने को तैयार हैं, और यह याचिका उनके बड़े भाई के उकसावे पर दायर की गई थी।
कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने कहा कि अन्य बच्चों की मौजूदगी या उनकी देखभाल करने की स्थिति बेटे की जिम्मेदारी को कम नहीं करती। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अगर मां अपने बड़े बेटे के साथ रह रही हैं, तो यह उन्नीकृष्ण की जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं देता।
कोर्ट की कार्यवाही और विलंब
कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि उन्नीकृष्ण ने फैमिली कोर्ट के आदेश को 1149 दिन की देरी से चुनौती दी। यह देरी तब हुई जब भरण-पोषण की राशि न देने पर उनके खिलाफ वसूली की कार्यवाही शुरू हुई। कोर्ट ने इसे गैर-जिम्मेदाराना रवैया माना और कहा कि यह देरी उनके इरादों को दर्शाती है।
जस्टिस पी. वी. कुन्हीकृष्णन केरल हाईकोर्ट के एक प्रमुख जज हैं, जिन्हें सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर संवेदनशील फैसले देने के लिए जाना जाता है। 2024 में उन्होंने 11,140 मामलों का निपटारा किया, जो केरल हाईकोर्ट के जजों में सबसे अधिक है। वह मलयालम अभिनेता उन्नीकृष्णन नंबूथिरी के बेटे हैं और 1989 में वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने के बाद 2020 में हाईकोर्ट जज बने।
उनके अन्य उल्लेखनीय फैसलों में 15 दिन की आपातकालीन पैरोल देने का आदेश शामिल है, ताकि एक कैदी अपने बच्चे के उच्च शिक्षा में दाखिले में मदद कर सके। जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 को सभी धर्मों पर लागू करने का भी फैसला दिया था, जिसमें बच्चों के शिक्षा और स्वास्थ्य के अधिकारों पर जोर दिया गया।
इस फैसले ने समाज में बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के प्रति जागरूकता बढ़ाई है। यह मामला उन कई परिवारों के लिए एक सबक है, जहां बच्चे अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का कानून न केवल आर्थिक सहायता सुनिश्चित करता है, बल्कि यह सामाजिक और नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करता है।
सोशल मीडिया पर इस फैसले की खूब चर्चा हुई। कई लोगों ने जस्टिस कुन्हीकृष्णन की टिप्पणी की तारीफ की और इसे बुजुर्गों के सम्मान का प्रतीक बताया। कुछ यूजर्स ने लिखा, "यह फैसला समाज को आईना दिखाता है। हमें अपनी माता-पिता की देखभाल को प्राथमिकता देनी चाहिए।"
केरल हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल एक कानूनी जीत है, बल्कि यह समाज को यह याद दिलाता है कि माता-पिता की देखभाल करना हर बच्चे का कर्तव्य है। 100 साल की मां को 2000 रुपये भरण-पोषण के लिए कोर्ट में लड़ना पड़े, यह अपने आप में एक दुखद स्थिति है। जस्टिस पी. वी. कुन्हीकृष्णन की टिप्पणी, "मुझे इस समाज का हिस्सा होने पर शर्मिंदगी महसूस हो रही है," समाज के लिए एक गहरा संदेश है।
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