हिंदी थोपने के खिलाफ लड़ाई में Thackeray Brothers का पुनर्मिलन, 20 साल बाद का मिलन क्या गुल खिलायेगा?
Political news: मुंबई के वर्ली डोम में एक ऐतिहासिक राजनीतिक घटना घटी, जब शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस)...
मुंबई के वर्ली डोम में एक ऐतिहासिक राजनीतिक घटना घटी, जब शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) प्रमुख राज ठाकरे ने लगभग दो दशकों बाद एक मंच साझा किया। यह पुनर्मिलन महाराष्ट्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत त्रिभाषा नीति को लागू करने वाले दो सरकारी प्रस्तावों (जीआर) को वापस लेने के जश्न के रूप में आयोजित ‘मराठी विजय मेलावा’ का हिस्सा था। इस नीति के तहत कक्षा 1 से 5 तक के मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने का प्रयास किया गया था, जिसे उद्धव और राज ठाकरे ने “हिंदी थोपना” करार देते हुए इसका कड़ा विरोध किया। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस पुनर्मिलन और हिंदी थोपने के खिलाफ आंदोलन की सराहना की, इसे तमिलनाडु में अपनी भाषा अधिकारों की लड़ाई से जोड़ते हुए इसे एक पैन-इंडियन आंदोलन का रूप दिया।
महाराष्ट्र सरकार ने 16 और 17 अप्रैल 2025 को दो सरकारी प्रस्ताव जारी किए थे, जिनमें कक्षा 1 से 5 तक के मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने का प्रावधान था। इस नीति के तहत, यदि कोई 20 से कम छात्र वैकल्पिक भाषा चुनते हैं, तो हिंदी अनिवार्य होगी। इस फैसले ने महाराष्ट्र में भारी विवाद खड़ा कर दिया, क्योंकि इसे मराठी भाषा और पहचान पर हमले के रूप में देखा गया। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, जो 2006 में शिवसेना से अलग होने के बाद से राजनीतिक रूप से अलग थे, ने इस मुद्दे पर एकजुट होकर विरोध की घोषणा की।
उनके नेतृत्व में शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस ने 5 जुलाई को मुंबई में एक संयुक्त विरोध रैली की योजना बनाई थी। हालांकि, जनता के भारी विरोध और Thackeray Brothers की एकजुटता के दबाव में, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 29 जून को दोनों प्रस्तावों को रद्द करने की घोषणा की। इसके बाद, विरोध रैली को ‘मराठी विजय मेलावा’ में बदल दिया गया, जो वर्ली के एनएससीआई डोम में आयोजित हुआ। रैली में हजारों मराठी कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया, और उद्धव और राज ठाकरे ने मंच पर गले मिलकर मराठी एकजुटता का प्रतीक प्रस्तुत किया।
रैली में राज ठाकरे ने कहा, “मुख्यमंत्री फडणवीस ने वह कर दिखाया जो बालासाहेब ठाकरे भी नहीं कर सके—हमें एक साथ लाना।” उन्होंने हिंदी थोपने को मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश का हिस्सा बताया और सवाल उठाया कि हिंदी भाषी राज्यों में तीसरी भाषा क्या पढ़ाई जाती है। उद्धव ठाकरे ने कहा, “हम हिंदी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे थोपने के खिलाफ हैं। हम एक साथ आए हैं और एक साथ रहेंगे।” रैली में मराठी भाषा और पहचान को बढ़ावा देने का संकल्प लिया गया।
- एम.के. स्टालिन की प्रतिक्रिया
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके नेता एम.के. स्टालिन ने इस घटना को मराठी और तमिल भाषा अधिकारों की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण मोड़ बताया। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “हिंदी थोपने के खिलाफ उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में मुंबई में आयोजित विजय रैली का उत्साह और प्रभावशाली भाषण हमें प्रेरणा देता है। डीएमके और तमिलनाडु के लोग, जो पीढ़ियों से हिंदी थोपने के खिलाफ भाषा अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, अब इसे महाराष्ट्र में एक तूफान की तरह देख रहे हैं।”
स्टालिन ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा ने तमिलनाडु के स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में लागू करने के लिए 2,152 करोड़ रुपये की समग्र शिक्षा अभियान की राशि रोक दी है। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या केंद्र सरकार तमिलनाडु को शिक्षा नीति स्वीकार करने के लिए मजबूर करेगी? हिंदी भाषी राज्यों में तीसरी भाषा क्या पढ़ाई जाती है, और वे आर्थिक रूप से पिछड़े क्यों हैं?” स्टालिन ने इस आंदोलन को उन लोगों के लिए आंखें खोलने वाला बताया, जो यह कहते हैं कि हिंदी सीखने से रोजगार मिलता है।
Thackeray Brothers का यह पुनर्मिलन महाराष्ट्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, खासकर आगामी बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) और अन्य स्थानीय निकाय चुनावों के मद्देनजर। यह पहली बार है जब 2005 के मालवण उपचुनाव के बाद उद्धव और राज ठाकरे एक मंच पर आए हैं। उनकी एकजुटता ने न केवल मराठी अस्मिता को मजबूत किया, बल्कि महायुति सरकार (भाजपा, एकनाथ शिंदे की शिवसेना, और एनसीपी) के खिलाफ एक मजबूत विपक्षी गठबंधन की संभावना को भी बढ़ाया।
इस घटना ने हिंदी थोपने के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। स्टालिन की टिप्पणी ने इसे दक्षिण और पश्चिम भारत के बीच एकजुटता का प्रतीक बना दिया, जो केंद्र सरकार की एनईपी और त्रिभाषा नीति के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन की शुरुआत हो सकती है। सोशल मीडिया पर इस रैली को लेकर उत्साह देखा गया। एक एक्स यूजर ने लिखा, “20 साल बाद Thackeray Brothers का एक मंच पर आना महाराष्ट्र की राजनीति में नया अध्याय है।”
हालांकि, इस रैली को कुछ लोग राजनीतिक नाटक के रूप में देख रहे हैं। भाजपा और महायुति नेताओं ने दावा किया कि त्रिभाषा नीति का विचार उद्धव ठाकरे की माविआ सरकार के दौरान रघुनाथ माशेलकर समिति द्वारा प्रस्तावित किया गया था। इसके जवाब में शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने इसे “भाजपा की झूठ की नीति” करार दिया। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह पुनर्मिलन बीएमसी चुनावों से पहले वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति हो सकती है।
महाराष्ट्र सरकार ने त्रिभाषा नीति की समीक्षा के लिए शिक्षा विशेषज्ञ नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है, लेकिन उद्धव और राज ठाकरे ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी रूप में हिंदी थोपने को स्वीकार नहीं करेंगे। Thackeray Brothers का पुनर्मिलन और त्रिभाषा नीति की वापसी मराठी अस्मिता और भाषाई अधिकारों की जीत है। उद्धव और राज ठाकरे की एकजुटता ने न केवल महाराष्ट्र सरकार को नीति वापस लेने के लिए मजबूर किया, बल्कि यह भी दिखाया कि क्षेत्रीय भाषाओं और पहचान की रक्षा के लिए जनता की एकता कितनी शक्तिशाली हो सकती है। एम.के. स्टालिन की इस आंदोलन की सराहना ने इसे एक राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में स्थापित किया, जो हिंदी थोपने और एनईपी के खिलाफ अन्य गैर-हिंदी भाषी राज्यों को प्रेरित कर सकता है।
What's Your Reaction?