वंदे भारत एक्सप्रेस में भ्रष्टाचार का 'शॉर्टकट'- रसीद के बिना आधे दाम पर टिकट का सौदा करते टीटीई का वीडियो वायरल
रेलवे विभाग द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और उच्च किराए के बावजूद इस तरह की घटनाएं यात्रियों के भरोसे को तोड़ती हैं। वंदे भारत में यात्रा करने वाला वर्ग आमतौर पर बेहतर सेवा और ईमानदारी की उम्मीद करता है। वीडियो में दिख रहा टीटीई जिस आत्मविश्वास के साथ 700 रुपये के टिकट
- हाई-प्रोफाइल ट्रेन में लो-प्रोफाइल धांधली: बनारस जा रहे यात्रियों से 700 रुपये की जगह 380 रुपये लेकर निजी जेब भरने का खेल
- रेलवे की साख पर बट्टा लगाती 'सेटिंग' की राजनीति: बिना रसीद यात्रा कराने के गोरखधंधे ने सुरक्षा और राजस्व पर खड़े किए गंभीर सवाल
भारतीय रेलवे की सबसे आधुनिक और प्रीमियम ट्रेन मानी जाने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस में भ्रष्टाचार का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। इस घटना ने रेलवे के उस पारदर्शी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं जिसे डिजिटल इंडिया के दौर में फुल-प्रूफ माना जाता था। मामला एक यात्री और ट्रेन टिकट परीक्षक (टीटीई) के बीच हुई बातचीत से जुड़ा है, जिसमें टीटीई खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाता नजर आ रहा है। एक शख्स टीटीई के पास जाकर बताता है कि वे कुल तीन लोग हैं और उन्हें बनारस तक की यात्रा करनी है। नियमानुसार, ट्रेन में बिना टिकट चढ़ने पर भारी जुर्माना और निर्धारित किराया देना होता है, लेकिन यहां टीटीई ने सरकारी खजाने को चूना लगाने और अपनी जेब भरने का एक नया रास्ता निकाल लिया। इस पूरी घटना का गुपचुप तरीके से वीडियो बना लिया गया, जिसने अब विभाग की नींद उड़ा दी है।
सौदा तय करने के दौरान जो बातें सामने आईं, वे रेलवे की कार्यप्रणाली में गहरे पैठ बना चुके भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं। जब यात्री ने टिकट काटने का आग्रह किया, तो टीटीई ने उसे आधिकारिक रसीद देने के बजाय एक अवैध विकल्प दिया। टीटीई ने बताया कि बनारस तक का आधिकारिक किराया लगभग 700 रुपये प्रति व्यक्ति है, लेकिन यदि यात्री बिना रसीद के यात्रा करने को तैयार हो, तो वह इसे मात्र 380 रुपये में मैनेज कर लेगा। यह सीधे तौर पर राजस्व की चोरी का मामला है, जहां यात्री को कम कीमत का लालच देकर उससे मिलने वाली राशि को सरकारी खाते में जमा करने के बजाय सीधे अपनी जेब में रखने की योजना बनाई गई। यह 'सेटिंग' न केवल अनैतिक है बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी एक बड़ा खतरा है, क्योंकि बिना रसीद के यात्रा करने वाले यात्रियों का रिकॉर्ड चार्ट में दर्ज नहीं होता।
वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में पैसेंजर मैनिफेस्ट और सीट ऑक्यूपेंसी की रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए हैंडहेल्ड टर्मिनल (HHT) डिवाइस दिए जाते हैं। इसके बावजूद, बिना रसीद के आधे दाम पर टिकट का सौदा होना यह बताता है कि तकनीकी निगरानी के बावजूद मानवीय हस्तक्षेप के जरिए भ्रष्टाचार के रास्ते निकाले जा रहे हैं। रेलवे विभाग द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और उच्च किराए के बावजूद इस तरह की घटनाएं यात्रियों के भरोसे को तोड़ती हैं। वंदे भारत में यात्रा करने वाला वर्ग आमतौर पर बेहतर सेवा और ईमानदारी की उम्मीद करता है। वीडियो में दिख रहा टीटीई जिस आत्मविश्वास के साथ 700 रुपये के टिकट को 380 रुपये में 'एडजस्ट' करने की बात कर रहा है, उससे यह संदेह होता है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। यह एक संगठित प्रयास की तरह प्रतीत होता है जहां कुछ कर्मचारी मिलकर प्रीमियम ट्रेनों के खाली पड़े बर्थ या एडजस्टमेंट का फायदा निजी लाभ के लिए उठाते हैं। यात्री द्वारा सवाल किए जाने पर भी टीटीई के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, जो प्रशासनिक ढिलाई की ओर संकेत करता है।
जांच के घेरे में अब वे सभी बिंदु हैं कि कैसे एक चलती ट्रेन में, जहां सीसीटीवी कैमरे और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती होती है, वहां इस तरह का सौदा मुमकिन हो पाया। यह केवल एक टीटीई की व्यक्तिगत गलती नहीं मानी जा सकती, बल्कि यह उस निगरानी तंत्र की विफलता है जो हर स्टेशन और कोच पर कड़ी नजर रखने का दावा करता है। यदि एक यात्री तीन लोगों के लिए बिना रसीद के टिकट पा सकता है, तो यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि प्रतिदिन रेलवे को कितने बड़े राजस्व का नुकसान पहुंचाया जा रहा होगा। इस मामले के सामने आने के बाद रेलवे के सतर्कता विभाग ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है और संबंधित कर्मचारी की पहचान कर उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। वंदे भारत जैसी ट्रेनों में बायो-टॉयलेट, ऑटोमैटिक दरवाजे और वाई-फाई जैसी विश्वस्तरीय सुविधाएं दी गई हैं, लेकिन कर्मचारियों की मानसिकता में बदलाव न आना एक बड़ी बाधा बनी हुई है। भ्रष्टाचार के इस तरीके में यात्री और कर्मचारी दोनों का फायदा दिखता है, लेकिन अंततः नुकसान देश और रेलवे की छवि का होता है। बिना रसीद के यात्रा करने पर यदि कोई दुर्घटना हो जाए, तो यात्री किसी भी प्रकार के बीमा या मुआवजे का दावा नहीं कर सकता। टीटीई द्वारा यात्रियों को इस जोखिम में डालना और बदले में पैसे ऐंठना एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल ट्रेनों की गति बढ़ाने या उन्हें आधुनिक बनाने से रेलवे का कायाकल्प नहीं होगा, बल्कि भ्रष्टाचार मुक्त कार्यसंस्कृति विकसित करना अनिवार्य है।
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