खान सर का राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पर तीखा प्रहार- '10 रुपये का डायपर नहीं होता लीक, पर देश की बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हो जाते हैं'

व्यवस्था में मौजूद विसंगतियों पर बात करते हुए यह भी कहा गया कि अक्सर पेपर लीक होने के बाद जब दोबारा परीक्षा आयोजित की जाती है, तो संस्थाएं अपनी साख बचाने के चक्कर में प्रश्नपत्र को जरूरत से ज्यादा कठिन बना देती हैं। यह एक प्रकार का

May 13, 2026 - 09:26
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खान सर का राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पर तीखा प्रहार- '10 रुपये का डायपर नहीं होता लीक, पर देश की बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हो जाते हैं'
खान सर का राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पर तीखा प्रहार- '10 रुपये का डायपर नहीं होता लीक, पर देश की बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हो जाते हैं'

  • शिक्षा जगत में भारी आक्रोश: परीक्षा तंत्र की विफलताओं और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर मंडराते संकट के बीच एजेंसी की विश्वसनीयता शून्य होने का दावा
  • भविष्य से खिलवाड़ पर गंभीर चेतावनी: सुरक्षा व्यवस्था में सेंधमारी के बाद लाखों अभ्यर्थियों की मेहनत पर फिरा पानी, खान सर ने तंत्र को बताया 'नेवर ट्रस्टेबल एजेंसी'

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा आयोजित देश की प्रतिष्ठित चिकित्सा प्रवेश परीक्षा में हुई कथित अनियमितताओं और पेपर लीक की घटनाओं ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। इस गंभीर संकट के बीच प्रमुख शिक्षक और शिक्षाविद खान सर ने तंत्र की खामियों पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे लाखों युवाओं के भविष्य के साथ एक क्रूर मजाक करार दिया है। उन्होंने बहुत ही कड़वे शब्दों में सुरक्षा मानकों की तुलना करते हुए कहा कि बाजार में मिलने वाले बच्चों के साधारण डायपर भी अपनी गुणवत्ता और रिसाव रोकने की क्षमता बनाए रखते हैं, लेकिन देश का इतना बड़ा परीक्षा निकाय प्रश्नपत्रों की गोपनीयता बनाए रखने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। उनका तर्क है कि जब दस रुपये की वस्तु अपनी जिम्मेदारी निभा सकती है, तो करोड़ों रुपये के बजट वाली संस्था अपने सुरक्षा घेरे को क्यों नहीं बचा पा रही है। इस तीखी टिप्पणी ने परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं और इसे प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है।

संस्था की कार्यक्षमता पर सवाल उठाते हुए खान सर ने इसका नाम बदलने तक का सुझाव दे डाला है। उन्होंने कहा कि इसे राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के बजाय 'नेवर ट्रस्टेबल एजेंसी' कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि इसने बार-बार छात्रों का भरोसा तोड़ा है। उनका मानना है कि यह केवल एक बार की चूक नहीं है, बल्कि यह एक गहरी साजिश और व्यवस्थागत सड़न का हिस्सा है। परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्रों का बाहर आ जाना और फिर उसे सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाया जाना यह दर्शाता है कि भीतरखाने कुछ लोग सक्रिय हैं जो धनबल के लिए मेधावी छात्रों के भविष्य की बलि दे रहे हैं। इस स्थिति ने उन अभ्यर्थियों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया है जिन्होंने दिन-रात एक करके इस कठिन परीक्षा की तैयारी की थी। अब वे न केवल अपनी मेहनत के बर्बाद होने से दुखी हैं, बल्कि आने वाली दोबारा परीक्षा के अनिश्चित स्वरूप को लेकर भी मानसिक तनाव में हैं। हालिया घटनाक्रम में यह बात सामने आई है कि परीक्षा होने से कई घंटे पहले ही प्रश्नपत्र के महत्वपूर्ण हिस्से कुछ खास केंद्रों और सोशल मीडिया समूहों पर उपलब्ध थे। जांच में यह भी पता चला है कि राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से इसके तार जुड़े हुए हैं, जहां कुछ संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है।

शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय दिग्गजों का कहना है कि यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि उन लाखों परिवारों की उम्मीदों का टूटना है जिन्होंने अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने के लिए अपनी जमापूंजी लगा दी थी। खान सर ने एक अत्यंत भावुक पहलू को छूते हुए उन छात्रों की स्थिति का वर्णन किया जिन्होंने व्यक्तिगत त्रासदी के बावजूद पढ़ाई जारी रखी थी। उन्होंने उदाहरण दिया कि कई छात्र ऐसे हैं जिन्होंने अपने माता-पिता को खोने के बाद भी केवल इसलिए हिम्मत नहीं हारी क्योंकि उन्हें लगा कि एक परीक्षा उनकी जिंदगी बदल देगी। अब जब व्यवस्था की खामियों के कारण पूरी परीक्षा को ही दूषित पाया गया है, तो ऐसे छात्रों को दोबारा उसी ऊर्जा के साथ तैयारी के लिए प्रेरित करना शिक्षकों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। उनका कहना है कि सरकारी तंत्र को यह समझना होगा कि उनके लिए यह केवल एक फाइल या प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन एक छात्र के लिए यह उसके जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष होते हैं। जांच की प्रक्रिया पर संदेह व्यक्त करते हुए यह तर्क दिया गया है कि केवल जांच के आदेश देना ही पर्याप्त नहीं है। खान सर ने साफ तौर पर कहा कि अगर इस मामले की जांच लंबे समय तक चलती रही, तो छात्रों का करियर अधर में लटक जाएगा। उन्होंने चिंता जताई कि जिस गति से जांच एजेंसियां काम करती हैं, उससे ऐसा लग सकता है कि जब तक परिणाम आएंगे, तब तक छात्र के चिकित्सा अध्ययन की अवधि ही समाप्त हो जाएगी। इसीलिए उन्होंने मांग की है कि इस पूरे मामले की निगरानी सर्वोच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए ताकि निष्पक्षता और गति दोनों सुनिश्चित हो सकें। उनका मानना है कि जब तक इस तरह की अनियमितताओं में शामिल लोगों को ऐसी सजा नहीं दी जाती जो नजीर बने, तब तक परीक्षा माफियाओं के हौसले बुलंद रहेंगे और वे हर साल इसी तरह छात्रों के सपनों का सौदा करते रहेंगे।

व्यवस्था में मौजूद विसंगतियों पर बात करते हुए यह भी कहा गया कि अक्सर पेपर लीक होने के बाद जब दोबारा परीक्षा आयोजित की जाती है, तो संस्थाएं अपनी साख बचाने के चक्कर में प्रश्नपत्र को जरूरत से ज्यादा कठिन बना देती हैं। यह एक प्रकार का प्रतिशोधात्मक रवैया होता है जिससे उन निर्दोष छात्रों को नुकसान होता है जिनका लीक की घटना से कोई लेना-देना नहीं था। खान सर का मानना है कि परीक्षा के संचालन में तकनीक का उपयोग सुरक्षा के लिए होना चाहिए, न कि उसे सेंधमारी का जरिया बनने देना चाहिए। यदि सरकारी एजेंसियां स्वयं इन लीक्स का पता लगाने में असमर्थ हैं और हर बार छात्रों को ही सबूत जुटाकर तंत्र को जगाना पड़ता है, तो यह उस संस्था के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाता है। यह स्थिति प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही की भारी कमी को दर्शाती है। वर्तमान में जो संकट पैदा हुआ है, उसने न केवल छात्रों बल्कि उनके अभिभावकों को भी गहरे अवसाद में धकेल दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली छात्राओं के लिए स्थिति और भी विकट है, जिन्हें बमुश्किल पढ़ाई के लिए घर से अनुमति मिलती है। एक बार परीक्षा रद्द होने और प्रक्रिया में देरी होने से उनके आगे की पढ़ाई पर पूर्णविराम लगने का खतरा बढ़ जाता है। खान सर ने इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी परीक्षा की शुचिता भंग न हो सके। उन्होंने आगाह किया कि यदि आज सुधार नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ी का प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए एक खतरनाक संकेत है।

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