ISRO की डिफेंस सैटेलाइट मिशनों में बार-बार असफलता: 9 साल में 44 सैटेलाइट लॉन्च, लेकिन 5 फेल्योर के साथ उठ रहे सवाल
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने पिछले 9 सालों में डिफेंस से जुड़े 44 सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, लेकिन इनमें से 5 मिशन पूरी तरह असफल
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने पिछले 9 सालों में डिफेंस से जुड़े 44 सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, लेकिन इनमें से 5 मिशन पूरी तरह असफल रहे हैं। ये सभी असफल मिशन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे, जिसमें अर्थ ऑब्जर्वेशन, नेविगेशन और राडार इमेजिंग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। पिछले एक साल में ही तीन ऐसे मिशन फेल हुए हैं, जिससे रॉकेट्री में जीरो एरर की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। डिफेंस सेक्टर के इन प्रोजेक्ट्स में ISRO की उड़ान क्यों फंस रही है, इसकी जांच की मांग हो रही है।
पहली असफलता 2017 में PSLV-C39 मिशन के दौरान हुई, जब IRNSS-1H नेविगेशन सैटेलाइट को ऑर्बिट में नहीं पहुंचाया जा सका। यह सैटेलाइट NAVIC सिस्टम का हिस्सा था, जो डिफेंस एप्लीकेशन्स के लिए तैयार किया गया था। लॉन्च के दौरान हीट शील्ड अलग नहीं होने से मिशन फेल हो गया। इसके बाद 2021 में GSLV-F10 मिशन में EOS-03 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट की लॉन्चिंग असफल रही। यह सैटेलाइट डिफेंस के लिए अर्थ इमेजिंग का काम करती, लेकिन थर्ड स्टेज में अनॉमली से यह ऑर्बिट तक नहीं पहुंचा। मिशन की लागत करीब 850 करोड़ रुपये थी।
2025 में दो असफलताएं आईं। जनवरी में GSLV मिशन में NVS-02 नेविगेशन सैटेलाइट फेल हो गया। यह सैटेलाइट NAVIC सिस्टम का हिस्सा था और डिफेंस के लिए सिक्योर नेविगेशन प्रदान करने वाला था। पायरो वाल्व मालफंक्शन से मिशन असफल रहा। मई में PSLV-C61 मिशन में EOS-09 राडार इमेजिंग सैटेलाइट की लॉन्चिंग फेल हो गई। यह सैटेलाइट सिंथेटिक एपर्चर राडार से सुसज्जित था, जो दिन-रात और क्लाउड कवर में भी ऑब्जर्वेशन कर सकता था। थर्ड स्टेज में प्रेशर ड्रॉप से मिशन असफल रहा।
2026 की शुरुआत में ही PSLV-C62 मिशन असफल रहा, जिसमें EOS-N1 हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट मुख्य पेलोड था। यह सैटेलाइट डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) द्वारा विकसित था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण था। लिफ्टऑफ के छह मिनट बाद थर्ड स्टेज में एटिट्यूड कंट्रोल की समस्या से मिशन फेल हो गया, जिससे 16 सैटेलाइट्स लॉस्ट हो गए। EOS-N1 को अन्वेशा कोडनेम दिया गया था और यह हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग के लिए था। इन असफलताओं में एक पैटर्न दिखता है, जहां PSLV के थर्ड स्टेज में सॉलिड प्रोपेलेंट से जुड़ी समस्याएं बार-बार आई हैं। PSLV ISRO का वर्कहॉर्स रॉकेट है, जो 1993 से 64 मिशनों में इस्तेमाल हुआ है, लेकिन हाल की असफलताओं ने इसकी रिलायबिलिटी पर सवाल उठाए हैं। 2017 से पहले PSLV की असफलताएं 1993 और 2017 में ही हुई थीं, लेकिन 2025-2026 में लगातार दो PSLV मिशन फेल होने से चिंता बढ़ी है।
डिफेंस सैटेलाइट्स में असफलता का असर राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। EOS-09 RISAT का रिप्लेसमेंट था, जो सर्विलांस के लिए जरूरी था। NVS-02 NAVIC सिस्टम को मजबूत करने वाला था, लेकिन फेल्योर से समय पीछे खिसक गया। EOS-N1 DRDO के लिए विकसित था और डिजास्टर मैनेजमेंट से लेकर बॉर्डर सर्विलांस में इस्तेमाल होता। इन मिशनों की लागत करोड़ों में है और फेल्योर से न केवल पैसे का नुकसान होता है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रोजेक्ट्स में देरी होती है। ISRO की जांच चल रही है। PSLV-C62 की असफलता के बाद डेटा एनालिसिस हो रहा है। पहले के फेल्योर्स में भी थर्ड स्टेज की अनॉमली मुख्य कारण रही। 2025 के PSLV-C61 में चैंबर प्रेशर ड्रॉप हुआ। GSLV में पायरो वाल्व की समस्या आई। ये तकनीकी मुद्दे रॉकेट्री में जीरो एरर की जरूरत को रेखांकित करते हैं, क्योंकि डिफेंस मिशन में कोई मार्जिन नहीं होता।
पिछले 9 सालों में ISRO ने डिफेंस से जुड़े कई सैटेलाइट्स लॉन्च किए हैं, जैसे Cartosat सीरीज, RISAT सीरीज, GSAT-7 सीरीज, IRNSS/NVS सीरीज और EOS सीरीज। इनमें अर्थ ऑब्जर्वेशन, राडार इमेजिंग, हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग और नेविगेशन शामिल हैं। कुल 44 सैटेलाइट्स लॉन्च हुए, लेकिन 5 फेल्योर ने ध्यान खींचा है। इन फेल्योर्स में तीन पिछले एक साल में हैं, जो ISRO के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। ISRO ने 2026 में 100 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च का लक्ष्य रखा है, लेकिन शुरुआत असफल रही। डिफेंस प्रोजेक्ट्स में असफलता से कमर्शियल मिशनों पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि PSLV राइडशेयर मिशनों के लिए इस्तेमाल होता है। PSLV-C62 में 15 को-पैसेंजर सैटेलाइट्स भी थे, जो लॉस्ट हो गए। इनमें थाइलैंड का Theos-2, स्पेन का KID और ब्राजील के सैटेलाइट्स शामिल थे।
रॉकेट्री में जीरो एरर की जरूरत है, क्योंकि असफलता से वर्षों का काम बर्बाद हो जाता है। ISRO ने पहले भी असफलताओं से सीखा है, जैसे 2017 के बाद बदलाव किए गए। लेकिन डिफेंस सेक्टर में लगातार फेल्योर से जांच की मांग हो रही है। ये मिशन राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हैं, इसलिए तकनीकी मुद्दों का समाधान जरूरी है। PSLV की सक्सेस रेट 94 प्रतिशत है, लेकिन हाल की असफलताओं ने इसे प्रभावित किया है। इन असफलताओं से ISRO के महत्वाकांक्षी प्लान्स पर असर पड़ सकता है, जैसे क्रूड मिशन और अधिक सैटेलाइट लॉन्च। डिफेंस सैटेलाइट्स में फेल्योर का पैटर्न चिंताजनक है, क्योंकि ये मिशन कमर्शियल से अलग होते हैं और राष्ट्रीय हित से जुड़े होते हैं। पिछले 9 सालों में 44 सैटेलाइट लॉन्च के बावजूद 5 फेल्योर, जिनमें 3 पिछले एक साल में, रॉकेट्री में सुधार की जरूरत दिखाते हैं।
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