सुप्रीम कोर्ट की पंजाब पुलिस को फटकार, कहा- सेना का सम्मान भी नहीं कर सकते, कर्नल पर हमले के मामले में सीबीआई जांच बरकरार।
Trending News: नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के पटियाला में सेना के कर्नल पुष्पिंदर सिंह बाथ और उनके बेटे पर कथित हमले के मामले में पंजाब पुलिस....
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के पटियाला में सेना के कर्नल पुष्पिंदर सिंह बाथ और उनके बेटे पर कथित हमले के मामले में पंजाब पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा, “आप अपने घर में चैन की नींद सो रहे हैं क्योंकि सेना सीमा पर तैनात है।” यह मामला 13-14 मार्च 2025 की रात का है, जब पार्किंग विवाद के चलते पंजाब पुलिस के 12 कर्मचारियों ने कर्नल और उनके बेटे पर हमला किया था। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब पुलिस की याचिका खारिज करते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश को बरकरार रखा।
घटना 13 और 14 मार्च 2025 की रात को पंजाब के पटियाला में राजिंदर अस्पताल के पास हरबंस ढाबे पर हुई। कर्नल पुष्पिंदर सिंह बाथ, जो वर्तमान में नई दिल्ली में सेना मुख्यालय में तैनात हैं, अपने बेटे अंगद के साथ ढाबे पर खाना खा रहे थे। इस दौरान उनकी कार की पार्किंग को लेकर वहां मौजूद पंजाब पुलिस के कर्मचारियों से विवाद हो गया। कर्नल का आरोप है कि चार इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारियों सहित 12 पुलिसकर्मियों ने बिना किसी उकसावे के उन पर और उनके बेटे पर हमला कर दिया।
कर्नल बाथ के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने उनकी पहचान पत्र और मोबाइल फोन छीन लिया, उन्हें बुरी तरह पीटा, और फर्जी मुठभेड़ में मारने की धमकी दी। यह सब सार्वजनिक स्थान पर और सीसीटीवी कैमरों की नजर में हुआ। सीसीटीवी फुटेज में पुलिसकर्मियों को कर्नल और उनके बेटे पर हमला करते हुए देखा गया, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
4 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पंजाब पुलिस के चार अधिकारियों ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के आदेश को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा, “सेना के लोग -40 डिग्री तापमान में सीमा पर देश की रक्षा करते हैं, ताकि आप और हम चैन की नींद सो सकें। उनकी वजह से हम सुरक्षित हैं, और आप उनके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं? यह अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि घटना के आठ दिन बाद तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई। जस्टिस शर्मा ने कहा, “युद्ध के समय आप इन सैनिकों का सम्मान करते हैं, लेकिन शांति के समय उनका अपमान करते हैं। एफआईआर में देरी और जांच में ढिलाई कानूनविहीनता को दर्शाती है।” कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए सीबीआई को चार महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
घटना के बाद कर्नल बाथ ने पंजाब पुलिस पर निष्पक्ष जांच न करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि पंजाब पुलिस अपने अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रही थी। शुरू में पंजाब पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की, लेकिन कर्नल की शिकायत थी कि कोई कार्रवाई नहीं हो रही थी। आठ दिन बाद 21 मार्च 2025 को एफआईआर दर्ज की गई, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराएं 115(2), 351(2), 109, 310, 117(1), 117(2), 126(2) और 190 लगाई गईं।
इसके बाद कर्नल ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 3 अप्रैल 2025 को मामले की जांच चंडीगढ़ पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईटी) को सौंपी। लेकिन एसआईटी की जांच धीमी और निष्क्रिय रही। हाईकोर्ट ने इस पर नाराजगी जताई और 16 जुलाई 2025 को जांच सीबीआई को सौंप दी। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि हत्या के प्रयास की धारा को हटाने का पुलिस का फैसला अनुचित था।
इस घटना के बाद कर्नल की पत्नी ने पटियाला में डीसी कार्यालय के बाहर धरना दिया और दोषी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की मांग की। सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने तूल पकड़ा, और लोगों ने सेना के प्रति सम्मान और पुलिस की लापरवाही पर सवाल उठाए। एक यूजर ने लिखा, “सेना हमारे देश की रीढ़ है। उनके साथ ऐसा व्यवहार शर्मनाक है।” एक अन्य यूजर ने कहा, “पंजाब पुलिस को अपने रवैये पर शर्मिंदगी महसूस करनी चाहिए।”
सैन्य समुदाय ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की। कई पूर्व सैन्य अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह घटना सेना के मनोबल को ठेस पहुंचाती है। एक रिटायर्ड मेजर ने लिखा, “जो लोग सीमा पर अपनी जान जोखिम में डालते हैं, उनके साथ इस तरह का व्यवहार अस्वीकार्य है।”
घटना के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुए सीसीटीवी फुटेज के दबाव में पंजाब पुलिस ने 12 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। इनमें चार इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी शामिल थे। हालांकि, कर्नल बाथ ने आरोप लगाया कि निलंबन के बावजूद कोई गिरफ्तारी नहीं हुई, और आरोपी पुलिसकर्मी खुलेआम घूम रहे थे। हाईकोर्ट ने भी इस बात पर नाराजगी जताई कि अग्रिम जमानत खारिज होने के बावजूद पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार नहीं किया गया।
यह घटना सेना और पुलिस के बीच तनाव को दर्शाती है। भारत में सेना को देश की सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, और सैनिकों का सम्मान समाज में गहराई से रचा-बसा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, “वे तिरंगे में लिपटकर लौटते हैं,” ने इस भावना को और मजबूत किया। इस मामले ने पुलिस सुधारों और जवाबदेही पर भी सवाल उठाए।
कानूनी दृष्टिकोण से, भारतीय न्याय संहिता की धाराएं इस मामले में गंभीर अपराध को दर्शाती हैं। धारा 351(2) (आपराधिक बल प्रयोग), धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), और धारा 117(2) (गंभीर चोट) जैसे आरोप पुलिसकर्मियों की गलती की गंभीरता को दिखाते हैं। सीबीआई जांच से यह उम्मीद की जा रही है कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी और दोषियों को सजा मिलेगी।
पंजाब में पुलिस और नागरिकों के बीच विवाद की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले मोहाली में मार्च 2025 में एक वैज्ञानिक की पार्किंग विवाद में हत्या का मामला सामने आया था, जिसमें एक पड़ोसी ने वैज्ञानिक को पीट-पीटकर मार डाला था। इन घटनाओं ने पार्किंग जैसे छोटे मुद्दों पर बढ़ती हिंसा और कानून व्यवस्था की कमजोरियों को सामने लाया।
इसके अलावा, सेना के प्रति समाज में गहरा सम्मान होने के बावजूद, कुछ घटनाएं सैन्य अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार को दर्शाती हैं। उदाहरण के लिए, 2023 में एक रिटायर्ड कर्नल ने हिमाचल प्रदेश में सेना पर अधिकारियों को अवैध हिरासत में रखने का आरोप लगाया था, हालांकि सेना ने इसे खारिज किया था।
कर्नल पुष्पिंदर सिंह बाथ और उनके बेटे पर हमले का यह मामला न केवल पुलिस की लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि सेना के सम्मान और सुरक्षा बलों की जवाबदेही के मुद्दे को भी सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सीबीआई जांच का आदेश इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करता है। यह घटना समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि जो लोग देश की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, उनके साथ सम्मान और गरिमा का व्यवहार होना चाहिए। सीबीआई जांच के परिणाम इस मामले में न्याय की उम्मीद जगाते हैं।
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