दिल्ली दंगा केस: उमर खालिद-शरजील इमाम को झटका, 5 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगे 2020 के बड़े साजिश मामले में कई आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले में गुल्फिशा
दिल्ली दंगे 2020 साजिश मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला- गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत, उमर खालिद और शरजील इमाम की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगे 2020 के बड़े साजिश मामले में कई आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले में गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत प्रदान की गई, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं। यह फैसला 5 जनवरी 2026 को सुनाया गया, जो मामले की सुनवाई के बाद आरक्षित रखा गया था। मामले की पृष्ठभूमि फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़ी है, जहां आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत आरोप लगाए गए हैं।
यह मामला दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से संबंधित है, जिसमें आरोपियों को 2019-2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान साजिश रचने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल थे। सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकीलों और दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने बहस की। फैसले में कोर्ट ने प्रत्येक आरोपी की भूमिका को अलग-अलग विश्लेषण किया और सामूहिक दृष्टिकोण से बचते हुए निर्णय लिया। गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत देते हुए कोर्ट ने 12 शर्तें लगाईं। कोर्ट ने कहा कि इन शर्तों का दुरुपयोग होने पर जमानत रद्द की जा सकती है। इन आरोपियों के लिए ट्रायल कोर्ट को प्रक्रिया तेज करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने नोट किया कि सभी आरोपी एक ही स्तर पर नहीं हैं, उनकी भूमिकाएं अलग हैं, और उन्हें एक समान मानना पूर्व-परीक्षण हिरासत के जोखिम को बढ़ा सकता है।
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि वे अन्य आरोपियों से गुणात्मक रूप से अलग स्थिति में हैं। अभियोजन सामग्री में उनके केंद्रीय और गठनकारी भूमिका का प्रारंभिक प्रमाण है, जो योजना, जुटाव और रणनीतिक दिशा में शामिलता दिखाता है, जो एपिसोडिक और स्थानीय कृत्यों से आगे है। कोर्ट ने यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत दहलीज लागू होने का उल्लेख किया और कहा कि निरंतर हिरासत ने संवैधानिक अस्वीकार्यता को पार नहीं किया है जो वैधानिक प्रतिबंध को ओवरराइड कर सके।
कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को संरक्षित गवाहों की जांच के बाद या 5 जनवरी 2026 से एक वर्ष बाद जमानत याचिका नवीनीकृत करने की अनुमति दी। फैसले में कोर्ट ने यूएपीए के तहत अभियोजन में ट्रायल में देरी को ट्रंप कार्ड के रूप में कार्य करने की अनुमति नहीं दी, जो वैधानिक सुरक्षा को स्वतः विस्थापित कर दे। कोर्ट ने कहा कि यूएपीए की धारा 43डी(5) न्यायिक जांच को पूरी तरह से रोकती नहीं है, लेकिन जांच आरोपी-विशिष्ट है। मामले की सुनवाई दिसंबर 2025 में पूरी हुई और 10 दिसंबर 2025 को फैसला आरक्षित रखा गया। ये विशेष अनुमति याचिकाएं (एसएलपी) दिल्ली हाईकोर्ट के 2 सितंबर 2025 के फैसले के खिलाफ दाखिल की गई थीं, जिसमें इन आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज की गई थीं। आरोपी पांच वर्ष से अधिक समय से हिरासत में हैं। मामले में अन्य आरोपी जैसे ताहिर हुसैन, खालिद सैफी, इशरत जहां, आसिफ इकबाल तन्हा (2021 में जमानत), सफूरा जरगर (गर्भवती होने पर मानवीय आधार पर जमानत), देवांगना कलिता और नताशा नरवाल (जमानत पर) शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया कि जमानत चरण पर बचाव पक्ष के तर्कों की जांच नहीं की जाती। कोर्ट को संरचित जांच करनी होती है कि क्या अभियोजन सामग्री, यदि स्वीकार की जाए, तो प्रारंभिक मामला बनता है, और आरोपी की विशेष भूमिका वैधानिक दहलीज को पार करती है। यूएपीए की धारा 15, जो आतंकवादी कृत्यों से संबंधित है, को संकीर्ण रूप से व्याख्या नहीं किया जा सकता कि केवल हिंसा के स्पष्ट कृत्यों को शामिल करे; इसमें सेवाओं को बाधित करने और अर्थव्यवस्था को धमकी देने वाले कृत्य शामिल हैं। कोर्ट ने अभियोजन सामग्री में उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रारंभिक मामला पाया। अन्य आरोपियों के लिए, उनकी भूमिकाएं अलग होने के कारण जमानत दी गई। यह फैसला मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां कोर्ट ने व्यक्तिगत भूमिकाओं पर जोर दिया। गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद अब जमानत पर रिहा हो सकेंगे, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम हिरासत में रहेंगे।
मामले की शुरुआत फरवरी 2020 के दंगों से हुई, जिसमें दर्जनों लोग मारे गए थे। आरोपियों पर साजिश रचने का आरोप है, जो सीएए विरोध से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस ने यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया। हाईकोर्ट ने पहले जमानत खारिज की, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। सुनवाई के दौरान विभिन्न वकीलों ने तर्क दिए, लेकिन कोर्ट ने फैसले में अभियोजन के प्रमाणों पर ध्यान केंद्रित किया। फैसले में कोर्ट ने कहा कि यूएपीए के तहत देरी ट्रायल को स्वतः जमानत का आधार नहीं बनाती। आरोपी-विशिष्ट जांच आवश्यक है। गुल्फिशा फातिमा समेत पांच को जमानत मिलने से उनकी रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। शर्तों में शामिल है कि वे जांच में सहयोग करेंगे और गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मामले को तेजी से निपटाने का निर्देश दिया।
उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए कोर्ट ने उनकी भूमिका को केंद्रीय माना, जो योजना और जुटाव में शामिल थी। इससे यूएपीए की दहलीज लागू होती है। वे एक वर्ष बाद या गवाह जांच के बाद नई याचिका दाखिल कर सकते हैं। यह फैसला मामले की जटिलता को दर्शाता है, जहां विभिन्न आरोपियों की स्थिति अलग है। मामले में एसएलपी नंबरों में उमर खालिद की 14165/2025, गुल्फिशा फातिमा की 13988/2025, शरजील इमाम की 14030/2025, मीरान हैदर की 14132/2025, शिफा उर रहमान की 14859/2025, मोहम्मद सलीम खान की 15335/2025 और शादाब अहमद की 17055/2025 शामिल हैं। कोर्ट ने इन पर अलग-अलग विचार किया। फैसले में कोर्ट ने कहा कि सभी आरोपी समान नहीं हैं, उनकी भूमिकाएं भिन्न हैं। गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद की भूमिका अन्यों से अलग पाई गई, इसलिए जमानत दी गई। उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अधिक केंद्रीय होने से जमानत खारिज की गई।
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