सियासी गलियारों में गर्माहट: मनोज तिवारी का विपक्ष पर तीखा हमला, कहा- जनहित के इस कदम को आज नहीं तो कल पूरा करेंगे।

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, लोकसभा में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी जिसने न केवल राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया, बल्कि देश

Apr 20, 2026 - 11:34
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सियासी गलियारों में गर्माहट: मनोज तिवारी का विपक्ष पर तीखा हमला, कहा- जनहित के इस कदम को आज नहीं तो कल पूरा करेंगे।
सियासी गलियारों में गर्माहट: मनोज तिवारी का विपक्ष पर तीखा हमला, कहा- जनहित के इस कदम को आज नहीं तो कल पूरा करेंगे।
  • लोकतंत्र का संघर्ष और संकल्प: 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर संसद में तकरार, बीजेपी सांसद ने जताया भविष्य की जीत पर भरोसा
  • संसदीय इतिहास में ऐतिहासिक बहस: बहुमत के बावजूद संख्या बल में चूकी सरकार, महिला आरक्षण और परिसीमन पर फंसा पेंच

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, लोकसभा में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी जिसने न केवल राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया, बल्कि देश की आगामी चुनावी और संवैधानिक दिशा पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 सदन के पटल पर आवश्यक बहुमत प्राप्त करने में विफल रहा। यह विधेयक न केवल लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लाया गया था, बल्कि इसका सीधा जुड़ाव महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से भी था। संसद में मतदान के दौरान जो स्थिति उत्पन्न हुई, वह भारतीय संसदीय इतिहास के कुछ उन दुर्लभ क्षणों में से एक थी, जब सरकार के पक्ष में अधिक वोट होने के बावजूद संवैधानिक प्रावधानों के चलते विधेयक गिर गया। सदन में मौजूद 528 सदस्यों में से 298 ने पक्ष में और 230 ने विपक्ष में मतदान किया, जो संविधान संशोधन के लिए अनिवार्य दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से काफी दूर रह गया। इस विधायी विफलता के तुरंत बाद राजनीतिक बयानबाजी का दौर शुरू हो गया। भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं ने इसे विपक्ष द्वारा विकास और महिला सशक्तिकरण की राह में रोड़ा अटकाने वाला कदम बताया। इसी कड़ी में दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने कड़े तेवर अपनाते हुए कहा कि आज भले ही यह विधेयक तकनीकी कारणों से पास न हो सका हो, लेकिन सरकार का संकल्प अटल है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि "आज नहीं तो कल हम बिल पास करवाकर ही रहेंगे।" तिवारी का यह बयान स्पष्ट करता है कि सरकार इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने के मूड में नहीं है और आने वाले समय में इसे फिर से पेश करने या इसके समर्थन में जनमत तैयार करने की रणनीति बनाई जाएगी। भाजपा के लिए यह केवल एक बिल नहीं, बल्कि देश की बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक बड़ा मिशन है।

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के प्रावधानों पर विस्तार से नजर डालें तो यह देश की लोकतांत्रिक संरचना में एक आमूलचूल परिवर्तन की वकालत करता है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य लोकसभा की वर्तमान सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 करना था। इसके पीछे तर्क यह दिया गया है कि पिछले कई दशकों में भारत की जनसंख्या में भारी वृद्धि हुई है और वर्तमान परिसीमन पुरानी जनगणना पर आधारित है। सीटों की संख्या बढ़ने से राज्यों का प्रतिनिधित्व अधिक प्रभावी हो सकेगा। इसके साथ ही, यह बिल 2023 में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण) के तत्काल क्रियान्वयन की राह प्रशस्त करने वाला था। सरकार चाहती थी कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करके परिसीमन की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाए, ताकि महिलाओं को संसद में उनका हक जल्दी मिल सके। भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए सदन की कुल सदस्यता के बहुमत के साथ-साथ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। इस मामले में 528 सदस्यों की उपस्थिति के हिसाब से सरकार को लगभग 352 मतों की दरकार थी, जबकि उसे केवल 298 मत ही मिले। विपक्ष ने इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया और इसे देश के संघीय ढांचे के लिए एक संभावित खतरा बताया। विपक्षी दलों का मुख्य तर्क यह है कि यदि 2011 की जनगणना या भविष्य की आबादी के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो इससे दक्षिण भारत के उन राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन प्रदर्शन किया है। विपक्ष का कहना है कि सीटों की संख्या बढ़ने से उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व बढ़ जाएगा, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा। संसद में मतदान से पहले हुई बहस में विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन की राजनीति कर रही है। इसी गतिरोध के चलते सदन में आम सहमति नहीं बन सकी और बिल गिर गया, जिसके बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य दो विधेयकों केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक को भी वापस लेने का फैसला किया।

संसद के बाहर इस घटनाक्रम का असर सड़क पर भी देखने को मिला। दिल्ली के जंतर-मंतर और अन्य प्रमुख स्थानों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी के नेताओं का मानना है कि विपक्ष ने महिलाओं के सपनों को कुचला है। मनोज तिवारी और अन्य सांसदों ने इस बात को जनता के बीच ले जाने का संकल्प लिया है कि किस तरह एक ऐतिहासिक सुधार को विपक्षी दलों ने एकजुट होकर रोक दिया। भाजपा की रणनीति अब इसे एक चुनावी मुद्दा बनाने की है, विशेषकर महिला मतदाताओं के बीच। पार्टी का तर्क है कि वे तो आरक्षण देना चाहते थे, लेकिन विपक्ष ने इसमें बाधा डाली। यह दलील आने वाले विधानसभा चुनावों और भविष्य के लोकसभा चुनावों में एक बड़ा नैरेटिव सेट कर सकती है, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण और तेज होने की संभावना है। सरकार के लिए यह हार एक बड़ा सबक भी लेकर आई है। संवैधानिक संशोधनों के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता, इसके लिए व्यापक राजनीतिक संवाद और विपक्षी दलों को विश्वास में लेना अनिवार्य है। प्रधानमंत्री ने भी इस स्थिति पर दुख व्यक्त करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए एक काला दिन बताया और कहा कि देश की महिलाएं इस व्यवहार को देख रही हैं। हालांकि, तकनीकी रूप से यह विधेयक अभी के लिए समाप्त हो गया है, लेकिन सरकार के पास विकल्प खुले हैं। भविष्य में सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन के मुद्दे पर एक नई समिति का गठन किया जा सकता है या फिर विपक्षी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए विशेष वित्तीय पैकेज या प्रतिनिधित्व के वैकल्पिक फॉर्मूले पर चर्चा हो सकती है

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