कर्नाटक में बड़ा सियासी उलटफेर- मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा, राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने किया स्वीकार, राष्ट्रीय राजनीति का प्रस्ताव ठुकराया।

दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक सियासी उलटफेर देखने को मिला है। राज्य

May 29, 2026 - 12:32
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कर्नाटक में बड़ा सियासी उलटफेर- मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा, राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने किया स्वीकार, राष्ट्रीय राजनीति का प्रस्ताव ठुकराया।
कर्नाटक में बड़ा सियासी उलटफेर- मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा, राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने किया स्वीकार, राष्ट्रीय राजनीति का प्रस्ताव ठुकराया।
  • पावर शेयरिंग फॉर्मूले के तहत डीके शिवकुमार के सिर सजेगा ताज, सिद्धारमैया बने रहेंगे कार्यवाहक मुख्यमंत्री
  • कांग्रेस हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद थमा तीन साल पुराना नेतृत्व विवाद, बेंगलुरु से दिल्ली तक हलचल तेज

दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक सियासी उलटफेर देखने को मिला है। राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से आधिकारिक तौर पर इस्तीफा दे दिया है। पिछले कई दिनों से चल रहे लंबे सियासी सस्पेंस और अंदरूनी खींचतान के बाद यह कदम उठाया गया है। चूंकि राज्यपाल थावरचंद गहलोत राज्य से बाहर थे, इसलिए सिद्धारमैया ने शुरुआत में अपना त्यागपत्र राजभवन के विशेष सचिव प्रभु शंकर को सौंपा था। इसके बाद बेंगलुरु लौटते ही राज्यपाल ने सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। राजभवन से जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, नया मुख्यमंत्री चुने जाने और शपथ ग्रहण होने तक सिद्धारमैया कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते रहेंगे। इस बड़े घटनाक्रम के बाद से पूरे कर्नाटक में राजनीतिक सरगर्मियां सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं।

इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि साल 2023 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों के समय ही तैयार हो गई थी, जब कांग्रेस पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में वापसी की थी। उस समय मुख्यमंत्री पद के लिए दो सबसे बड़े चेहरों सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच तीखी प्रतिद्वंद्विता देखने को मिली थी। दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मौजूदगी में कई दिनों तक चली मैराथन बैठकों के बाद एक गुप्त 'रोटेशनल पावर शेयरिंग फॉर्मूला' तय किया गया था। इस फॉर्मूले के तहत दोनों नेताओं को ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री का पद संभालना था। हालांकि, सिद्धारमैया ने अपने दूसरे कार्यकाल में तीन साल का समय पूरा कर लिया, जिसके बाद डीके शिवकुमार कैंप की ओर से सत्ता हस्तांतरण के लिए दबाव लगातार बढ़ने लगा था।

सत्ता परिवर्तन की अंतिम रूपरेखा हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक बेहद महत्वपूर्ण और बंद कमरे की बैठक में तैयार की गई थी। इस उच्च स्तरीय बैठक में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ खुद सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार शामिल हुए थे। केंद्रीय नेतृत्व ने साफ कर दिया था कि पार्टी के वादे और अनुशासन को बनाए रखने के लिए अब सत्ता की कमान बदलने का समय आ गया है। हाईकमान के इस कड़े रुख के बाद सिद्धारमैया ने अनुशासन का परिचय देते हुए पद छोड़ने पर सहमति जताई और बेंगलुरु वापस आकर कैबिनेट की आखिरी बैठक बुलाई, जहां उन्होंने अपने सहयोगियों को इस फैसले से अवगत कराया।

राष्ट्रीय राजनीति का प्रस्ताव ठुकराया

मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद एक भावुक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सिद्धारमैया ने एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें सम्मानपूर्वक राष्ट्रीय राजनीति में आने और राज्यसभा सीट देने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, उन्होंने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया कि उनकी रुचि राष्ट्रीय राजनीति में बिल्कुल नहीं है और वे अगले दो साल तक विधायक के रूप में केवल कर्नाटक की जनता की सेवा करना चाहते हैं।

त्यागपत्र सौंपने के बाद मीडिया से बात करते हुए निर्वतमान मुख्यमंत्री काफी भावुक नजर आए। उन्होंने अपने पांच दशक लंबे राजनीतिक जीवन को एक खुली किताब बताते हुए कहा कि वे एक छोटे से गांव में पैदा हुए और पले-बढ़े, जहां उन्होंने कभी राज्य का मुख्यमंत्री बनने का सपना भी नहीं देखा था। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों पर संतोष जताते हुए कहा कि उनकी सरकार ने अपने शासनकाल में किए गए वादों में से लगभग तीन सौ वादे और पांच मुख्य गारंटी योजनाओं को पूरी ईमानदारी से लागू किया। उन्होंने शीर्ष नेतृत्व का आभार जताते हुए संकल्प लिया कि वे अपनी आखिरी सांस तक सामाजिक न्याय के लिए और संविधान विरोधी तथा सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखेंगे।

इस बड़े इस्तीफे के बाद अब राज्य की कमान आधिकारिक तौर पर संकटमोचक माने जाने वाले डीके शिवकुमार के हाथों में जाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाकर उन्हें औपचारिक रूप से नया नेता चुना जाएगा, जिसके बाद वे राज्यपाल के समक्ष नई सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। सियासी गलियारों में इस बात की भी पुरजोर चर्चा है कि नई सरकार में गुटीय संतुलन और जातीय समीकरणों को साधने के लिए डीके शिवकुमार के साथ चार नए उपमुख्यमंत्री भी बनाए जा सकते हैं, जिनमें सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र और मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियंक खड़गे के नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है।

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