उत्तर प्रदेश में भीषण बिजली संकट: पावर कट और बार-बार ट्रिपिंग से हाहाकार, कई बड़े शहरों में बड़ा प्रशासनिक और जन-तनाव।
उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी और उमस के बीच बिजली आपूर्ति की चरमराती व्यवस्था ने आम नागरिकों के
- अखिलेश यादव का योगी सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला, स्मार्ट मीटरों और बिजली व्यवस्था को लेकर भ्रष्टाचार के लगाए बड़े आरोप
- सड़कों पर उतरा जनता का आक्रोश: अघोषित कटौती और बेतहाशा बढ़ते बिलों के खिलाफ सब-स्टेशनों पर विरोध प्रदर्शन तेज, सुरक्षा बल तैनात
उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी और उमस के बीच बिजली आपूर्ति की चरमराती व्यवस्था ने आम नागरिकों के जीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। राज्य के कई प्रमुख शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों से लगातार आ रही अघोषित पावर कट की खबरों ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है, जिसके चलते कई जिलों में कानून व्यवस्था और प्रशासनिक स्तर पर भारी तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, आगरा और प्रयागराज जैसे बड़े महानगरों में भी दिन में आठ से दस बार होने वाली अनियंत्रित ट्रिपिंग और घंटों की कटौती ने बिजली विभाग के उन तमाम दावों की हवा निकाल दी है, जिसमें चौबीस घंटे निर्बाध आपूर्ति का भरोसा दिया गया था। इस विकट स्थिति के कारण न केवल आम जनजीवन बल्कि स्थानीय व्यापार, पेयजल आपूर्ति और चिकित्सा सेवाएं भी बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं, जिससे नागरिकों के भीतर सरकार के प्रति भारी असंतोष और गुस्सा पनप रहा है।
इस बड़े जन-संकट को भांपते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सत्ताधारी योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए एक बेहद तीखा और चौतरफा राजनीतिक हमला बोला है। पूर्व मुख्यमंत्री ने सरकार की नीतियों और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया है कि राज्य का बिजली क्षेत्र पूरी तरह से प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। उन्होंने वर्तमान सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि पिछले लगभग एक दशक के शासनकाल में सरकार ने राज्य के भीतर बिजली उत्पादन बढ़ाने के लिए एक भी नया पावर प्लांट स्थापित नहीं किया और न ही पुरानी पड़ चुकी ट्रांसमिशन लाइनों को बदलने के लिए कोई ठोस कदम उठाया, जिसके दुष्परिणाम आज राज्य की जनता को भुगतने पड़ रहे हैं।
समीक्षा और जमीनी हकीकत :
सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन होने के दावे किए जा रहे हैं, परंतु बुनियादी ढांचे की कमजोरी के कारण जमीनी स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में 12 से 14 घंटे तक की अघोषित बिजली कटौती हो रही है, जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
राजनीतिक बयानों और तीखे हमलों के क्रम में विपक्ष की ओर से यह भी कहा गया है कि सरकार द्वारा जोर-शोर से लगाए जा रहे स्मार्ट प्रीपेड बिजली मीटर असल में जनता की जेब पर डाका डालने का एक नया जरिया बन चुके हैं। इन नए मीटरों की तेज रीडिंग और सुरक्षा मानकों की कमी के चलते उपभोक्ताओं को अचानक भारी-भरकम बिजली बिल थमा दिए जा रहे हैं, और बिल जमा होने के बावजूद तकनीकी गड़बड़ियों के कारण बिना किसी पूर्व सूचना के उपभोक्ताओं के कनेक्शन काट दिए जा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इन मीटरों की खरीद और बिजली कंपनियों को ठेके देने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई है, जिसका सीधा हर्जाना अब प्रदेश के गरीब और मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं को अत्यधिक भुगतानों और अंधकार के रूप में चुकाना पड़ रहा है।
बिजली संकट और प्रशासनिक अनदेखी के खिलाफ जनता का यह गुस्सा अब केवल घरों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रदेश के कई हिस्सों में लोग सड़कों पर उतरकर हिंसक और उग्र प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए हैं। आगरा, फतेहपुर और मेरठ जैसे शहरों में स्थिति उस समय बेहद तनावपूर्ण हो गई जब आक्रोशित महिलाओं और स्थानीय नागरिकों ने बड़ी संख्या में बिजली उपकेंद्रों (सब-स्टेशनों) का घेराव किया और वहां लगे स्मार्ट मीटरों को उखाड़कर सड़कों पर फेंक दिया। कई स्थानों पर बिजली विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को बंधक बनाए जाने और उनके साथ धक्का-मुक्की की घटनाएं भी सामने आई हैं, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सब-स्टेशनों पर भारी पुलिस बल और सुरक्षा पिकेट तैनात करनी पड़ी है।
इस गंभीर होते संकट और चौतरफा घिरने के बाद बिजली कॉर्पोरेशन और शासन के आला अधिकारियों के बीच हड़कंप मच गया है। पावर कॉर्पोरेशन के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि बिजली की उपलब्धता में कोई बड़ी कमी नहीं है, बल्कि समस्या दशकों पुराने जर्जर बुनियादी ढांचे, पुराने ट्रांसफार्मरों पर क्षमता से अधिक लोड होने और स्थानीय स्तर पर आने वाले तकनीकी फॉल्ट्स के कारण उत्पन्न हो रही है। इसके साथ ही, हाल ही में बिजली विभाग से बड़े पैमाने पर संविदा कर्मचारियों की छंटनी किए जाने के कारण सब-स्टेशनों पर मैनपावर (कर्मचारियों) की भारी किल्लत हो गई है, जिससे किसी भी लाइन या फीडर में आने वाले फॉल्ट को ठीक करने में कई-कई घंटों का लंबा समय लग रहा है और मरम्मत कार्य पूरी तरह ठप हो गया है।
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