डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला का भीषण प्रकोप, 900 के पार पहुंची मामलों की संख्या, 119 मौत दर्ज।

अफ्रीकी महाद्वीप के मध्य में स्थित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो एक बार फिर एक बेहद ही गंभीर और जानलेवा स्वास्थ्य संकट

May 25, 2026 - 14:18
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डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला का भीषण प्रकोप, 900 के पार पहुंची मामलों की संख्या, 119 मौत दर्ज।
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला का भीषण प्रकोप, 900 के पार पहुंची मामलों की संख्या, 119 मौत दर्ज।
  • स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ा भारी दबाव, संक्रमण के चलते अब तक एक सौ उन्नीस लोगों ने गंवाई अपनी जान
  • पूर्वी क्षेत्र में तेजी से पैर पसार रही जानलेवा बीमारी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोषित किया गया जन स्वास्थ्य आपातकाल

अफ्रीकी महाद्वीप के मध्य में स्थित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो एक बार फिर एक बेहद ही गंभीर और जानलेवा स्वास्थ्य संकट की चपेट में आ गया है। इस देश के पूर्वी हिस्से में इबोला वायरस ने इस कदर हाहाकार मचा रखा है कि संक्रमितों और संदिग्ध मरीजों की कुल संख्या तेजी से बढ़ते हुए नौ सौ के आंकड़े को पार कर चुकी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किए गए हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश में अब तक नौ सौ चार संदिग्ध मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जिसके कारण स्थानीय प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। इस घातक संक्रामक बीमारी के चलते देश के विभिन्न हिस्सों में अब तक एक सौ उन्नीस लोगों की दर्दनाक मौत दर्ज की जा चुकी है, जिसके बाद से प्रभावित क्षेत्रों में डर और दहशत का माहौल बना हुआ है।

इस बार कांगो में फैले इस संक्रमण को बेहद खतरनाक माना जा रहा है क्योंकि प्रयोगशाला जांच में यह बात सामने आई है कि यह इबोला का 'बुंडिबुग्यो' स्ट्रेन है। इस विशिष्ट प्रजाति के वायरस के फैलने के कारण स्थिति और अधिक जटिल हो गई है, क्योंकि वर्तमान में इसके खिलाफ कोई प्रमाणित या स्वीकृत टीका उपलब्ध नहीं है। चिकित्सा टीमों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे केवल मरीजों के लक्षणों को प्रबंधित करके और उन्हें सहायक चिकित्सा प्रदान करके ही उनकी जान बचाने का प्रयास कर रहे हैं। इस जानलेवा बीमारी की शुरुआत अप्रैल महीने के अंतिम सप्ताह में हुई थी जब एक स्वास्थ्य कर्मी में इसके शुरुआती लक्षण देखे गए थे, और देखते ही देखते यह संक्रमण एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैल गया जो आकार में कई बड़े राज्यों से भी अधिक विस्तृत है।

कांगो का पूर्वी प्रांत 'इतुरी' इस समय इस महामारी का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां के मोंगबवालु और र्वमपारा जैसे स्वास्थ्य क्षेत्रों में सबसे ज्यादा तबाही देखने को मिल रही है। यह पूरा इलाका सोने की खदानों और घनी आबादी वाले व्यावसायिक केंद्रों के लिए जाना जाता है, जिसके कारण लोगों की आवाजाही बहुत अधिक रहती है और इसी वजह से वायरस को फैलने के लिए अनुकूल माहौल मिल गया। इसके अलावा, संक्रमण के मामले अब पड़ोसी प्रांतों जैसे उत्तर कीवू और दक्षिण कीवू तक भी पहुंच चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बीमारी स्थानीय स्तर पर सीमित न रहकर पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले रही है। शुरुआती दिनों में बीमारी की पहचान समय पर न हो पाने के कारण यह वायरस कई हफ्तों तक बिना किसी रोक-टोक के आबादी के बीच फैलता रहा।

महामारी के इस तेजी से होते विस्तार को देखते हुए वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं ने इस संकट को अत्यंत गंभीरता से लिया है और इसे अंतरराष्ट्रीय चिंता का जन स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है। कांगो के भीतर इस बीमारी के फैलने के जोखिम स्तर को बढ़ाकर 'बेहद उच्च' कर दिया गया है, क्योंकि इस क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति पहले से ही बेहद नाजुक है। प्रभावित इलाकों में सक्रिय विभिन्न सशस्त्र विद्रोही समूहों की हिंसा, बड़े पैमाने पर विस्थापित हो रही आबादी और स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी के कारण राहत और बचाव कार्यों को सुचारू रूप से चला पाना बेहद कठिन साबित हो रहा है। कई दूरदराज के गांवों में तो स्वास्थ्य कर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों की तलाश और उनकी निगरानी करने के लिए मजबूर हैं।

इस स्वास्थ्य संकट के बीच एक और चिंताजनक पहलू यह सामने आया है कि कुछ प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों और चिकित्सा टीमों पर हमले की घटनाएं भी देखने को मिली हैं। स्थानीय स्तर पर फैली कुछ भ्रांतियों और बाहरी सहायता को लेकर उपजे अविश्वास के कारण पिछले दिनों दो बड़े उपचार केंद्रों में आगजनी की घटनाएं हुईं, जिससे राहत कार्यों को बड़ा झटका लगा है। इस प्रकार की हिंसा के कारण संदिग्ध मरीजों के संपर्क में आए लोगों की ट्रैकिंग करने का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और कई लोग आइसोलेशन में आने से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती और स्थानीय प्रशासनिक विफलता ने मिलकर इस मानवीय संकट की आग में घी डालने का काम किया है।

भौगोलिक रूप से कांगो की सीमाएं कई पड़ोसी देशों से सटी हुई हैं, जिसके कारण इस वायरस के अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने का खतरा हमेशा बना रहता है। इस आशंका को सच साबित करते हुए पड़ोसी देश युगांडा की राजधानी कंपाला और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में भी इबोला के पांच पुख्ता मामलों की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें से एक मरीज की मौत भी दर्ज की जा चुकी है। बताया जा रहा है कि यह संक्रमण कांगो से यात्रा करके आए एक नागरिक के माध्यम से वहां पहुंचा था, जिसके बाद युगांडा सरकार ने भी अपनी सीमाओं पर थर्मल स्क्रीनिंग और निगरानी व्यवस्था को अत्यधिक कड़ा कर दिया है। कई अन्य देशों ने भी कांगो और उसके आसपास के क्षेत्रों से आने वाले हवाई यात्रियों के लिए विशेष स्वास्थ्य दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।

यह कांगो के इतिहास में इबोला वायरस का सत्रहवां प्रकोप है, जो यह दर्शाता है कि यह देश लंबे समय से इस भयानक जैविक खतरे का सामना करता आ रहा है। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि वास्तविक संक्रमितों और मौतों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि ग्रामीण और अशांत क्षेत्रों में कई मौतें बिना किसी चिकित्सीय जांच और रिपोर्टिंग के ही हो रही हैं। आने वाले दिनों में अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर दवाओं, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों और विशेषज्ञ डाक्टरों की तैनाती नहीं की गई, तो यह महामारी पूरे मध्य अफ्रीका के लिए एक बेकाबू आपदा का रूप ले सकती है, जिससे उबरने में कई साल का समय लग जाएगा।

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