उत्तराखंड उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, विधिक शिक्षा में अनुशासन सर्वोपरि रखते हुए कम उपस्थिति वाले छात्र को परीक्षा से रोका।

शैक्षणिक अनुशासन और व्यावसायिक शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए

May 27, 2026 - 12:05
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उत्तराखंड उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, विधिक शिक्षा में अनुशासन सर्वोपरि रखते हुए कम उपस्थिति वाले छात्र को परीक्षा से रोका।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, विधिक शिक्षा में अनुशासन सर्वोपरि रखते हुए कम उपस्थिति वाले छात्र को परीक्षा से रोका।
  • मापदंडों की अनदेखी से शैक्षणिक संस्थानों में पनपेगी अराजकता, नियमों के विपरीत जाकर नहीं दी जा सकती कोई भी न्यायिक राहत
  • भारतीय बार काउंसिल के कड़े दिशा-निर्देशों पर टिकी अदालत की मुहर, ग्यारह प्रतिशत हाजिरी पर दया दिखाने से साफ इनकार

शैक्षणिक अनुशासन और व्यावसायिक शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक अहम न्यायिक सिद्धांत को प्रतिपादित किया है। उच्च न्यायालय ने एक कानून की छात्रा को उसके आठवें सेमेस्टर की अंतिम परीक्षाओं में बैठने की अनुमति देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है, जिसकी उस सेमेस्टर के दौरान कुल उपस्थिति महज ग्यारह प्रतिशत दर्ज की गई थी। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक मानकों और स्थापित नियमों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। किसी भी छात्र को केवल सहानुभूति के आधार पर अनिवार्य नियमों से छूट प्रदान करना पूरे शिक्षा तंत्र के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

यह संपूर्ण कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब एक निजी विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई कर रही छात्रा ने अपनी अंतिम परीक्षाओं से रोके जाने के बाद न्यायपालिका की शरण ली थी। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रा की उपस्थिति में भारी कमी पाए जाने के बाद उसे चौदह मई से शुरू हुई आठवें सेमेस्टर की सत्रांत परीक्षा में सम्मिलित होने की अनुमति देने से मना कर दिया था। इस प्रशासनिक निर्णय के विरोध में याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर 'रिट ऑफ मैंडमस' यानी एक प्रकार के परमादेश की मांग की थी। याचिका में गुहार लगाई गई थी कि विश्वविद्यालय के संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश जारी किए जाएं ताकि वह छात्रा शेष बची हुई परीक्षाओं में शामिल हो सके और उसका शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होने से बच जाए।

न्यायिक प्रक्रिया के दौरान इस मामले की बारीकियों को परखते हुए यह बात सामने आई कि विधिक शिक्षा के संचालन के लिए एक विशिष्ट नियामक संस्था द्वारा तैयार किए गए नियम बेहद स्पष्ट और बाध्यकारी हैं। भारतीय बार काउंसिल द्वारा बनाए गए विधिक शिक्षा नियम, २००८ के तहत प्रत्येक कानून के छात्र के लिए हर सेमेस्टर में न्यूनतम सत्तर प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य की गई है ताकि वे परीक्षा में बैठने के पात्र बन सकें। इन नियमों में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी छात्र की उपस्थिति पैंसठ प्रतिशत से सत्तर प्रतिशत के बीच होती है, तो विशेष और उचित कारणों के आधार पर विश्वविद्यालय के कुलपति या डीन को सीमित राहत देने का विवेकाधिकार प्राप्त होता है। हालांकि, वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता की उपस्थिति इस निर्धारित रियायती सीमा से भी बहुत नीचे, यानी मात्र ग्यारह प्रतिशत थी, जिसके कारण विश्वविद्यालय प्रशासन के पास दया दिखाने का कोई वैधानिक आधार शेष नहीं बचा था। नियमों के तहत विधिक शिक्षा में ७० प्रतिशत न्यूनतम उपस्थिति अनिवार्य है, जबकि कुलपति या डीन को केवल ६५ से ७० प्रतिशत के बीच की कमी पर ही विचार करने का सीमित अधिकार प्राप्त है।

मामले की सुनवाई कर रहे एकल पीठ के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी ने इस याचिका पर गहन विचार-विमर्श करने के बाद नियामक संस्था की दलीलों और वैधानिक नियमों को पूरी तरह सही ठहराया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में बेहद सख्त और दूरगामी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि न्यूनतम उपस्थिति के मानकों को पूरा न करने वाले छात्रों को केवल सहानुभूति के आधार पर परीक्षाओं में बैठने की छूट दी जाने लगेगी, तो इससे शैक्षणिक संस्थानों में एक बेहद गलत परंपरा की शुरुआत होगी। अदालत का मानना था कि इस प्रकार की रियायतें अंततः शिक्षण संस्थानों के भीतर प्रशासनिक और शैक्षणिक अव्यवस्था को जन्म देंगी, जिससे न केवल अनुशासन भंग होगा बल्कि विधिक शिक्षा के समग्र स्तर और गरिमा में भी भारी गिरावट आएगी।

अदालत ने अपने फैसले में कानून के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए यह भी साफ किया कि न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहकर किसी सार्वजनिक या शैक्षणिक प्राधिकारी को स्थापित कानूनों और वैधानिक प्रावधानों के विपरीत कार्य करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि भारतीय बार काउंसिल एक वैधानिक नियामक संस्था है, जिसका मुख्य कार्य देश के भीतर कानूनी शिक्षा और वकालत के पेशे में अनुशासन, सुचारू व्यवस्था और उच्च मानकों को सुनिश्चित करना है। इसलिए, जब नियम इतने स्पष्ट हों, तब अदालतें अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करके किसी ऐसे व्यक्ति के पक्ष में परमादेश जारी नहीं कर सकतीं, जिसने खुद अनिवार्य नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया हो।

इस कानूनी बहस के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अन्य उच्च न्यायालयों के कुछ पुराने और अलग संदर्भों का भी हवाला दिया गया था, जिसमें पूर्व में कुछ छात्रों को शैक्षणिक निरंतरता बनाए रखने के लिए अंतरिम राहत दी गई थी। हालांकि, उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस बात का संज्ञान लिया कि ऐसे ही एक अन्य मामले में आए फैसले को पहले से ही देश की सर्वोच्च अदालत के समक्ष चुनौती दी जा चुकी है और वह मामला वर्तमान में विचाराधीन है। इस स्थिति को देखते हुए उच्च न्यायालय ने पूर्व के उन संदर्भों के आधार पर वर्तमान वैधानिक ढांचे से हटने और याचिकाकर्ता को किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत देने से पूरी तरह मना कर दिया।

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