45 साल पुराना वो कल्ट गाना जिसके पीछे छिपी है सदी के महानायक की घबराहट की दिलचस्प दास्तान
अमिताभ बच्चन के लिए मोहम्मद रफी साहब के साथ एक ही स्टूडियो में खड़े होकर गाना गाना किसी बहुत बड़ी परीक्षा से कम नहीं था। मोहम्मद रफी उस समय तक भारतीय संगीत उद्योग के शिखर पर थे और उनकी आवाज का जादू पूरी दुनिया के सिर चढ़कर बोल रहा था। अमिताभ बच्चन अच्छी
- महानायक अमिताभ बच्चन की वो रात जब मोहम्मद रफी के डर से आँखों से उड़ गई थी नींद
- सुरों के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी के सामने बिग बी को सता रहा था अपनी आवाज का डर
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ किस्से ऐसे होते हैं जो दशकों बाद भी उतने ही तरोताजा और दिलचस्प लगते हैं जितने वो अपने दौर में थे। ऐसा ही एक यादगार और बेहद हैरान करने वाला वाकया सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और संगीत जगत के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी से जुड़ा हुआ है। यह बात आज से करीब 45 साल पुरानी है जब एक फिल्म के कल्ट गाने की रिकॉर्डिंग होनी थी। परदे पर अपनी दमदार आवाज और रौबीली शख्सियत से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन उस रात ठीक से सो नहीं पाए थे। उनके मन में एक अजीब सा डर और घबराहट बैठ गई थी, और इस डर की वजह कोई और नहीं बल्कि खुद महान गायक मोहम्मद रफी साहब थे। अमिताभ बच्चन जैसे बड़े कलाकार का मोहम्मद रफी के नाम से इस कदर सहम जाना, संगीत और अभिनय के दो दिग्गजों के बीच के आपसी सम्मान और उस दौर के काम के प्रति समर्पण को बयां करता है।
यह पूरा माजरा साल 1981 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म 'नसीब' के एक बेहद लोकप्रिय गाने की रिकॉर्डिंग के समय का है। इस फिल्म का निर्देशन मनमोहन देसाई कर रहे थे और इसके संगीत की जिम्मेदारी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी के कंधों पर थी। फिल्म में एक गाना था 'चल चल मेरे भाई', जिसे अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर पर फिल्माया जाना था। मनमोहन देसाई की ख्वाहिश थी कि इस गाने को स्क्रीन पर निभाने वाले कलाकार ही अपनी आवाज में गाएं या फिर उनके साथ असली पाशर्व गायक जुगलबंदी करें। आखिरकार यह तय हुआ कि इस गाने में ऋषि कपूर की आवाज के लिए मोहम्मद रफी गाएंगे, जबकि अमिताभ बच्चन को अपने हिस्से की लाइनें खुद अपनी प्रामाणिक आवाज में गानी और बोलनी होंगी। जैसे ही अमिताभ बच्चन को पता चला कि उन्हें मोहम्मद रफी जैसे महान फनकार के साथ माइक साझा करना है, उनके हाथ-पांव फूल गए।
अमिताभ बच्चन के लिए मोहम्मद रफी साहब के साथ एक ही स्टूडियो में खड़े होकर गाना गाना किसी बहुत बड़ी परीक्षा से कम नहीं था। मोहम्मद रफी उस समय तक भारतीय संगीत उद्योग के शिखर पर थे और उनकी आवाज का जादू पूरी दुनिया के सिर चढ़कर बोल रहा था। अमिताभ बच्चन अच्छी तरह जानते थे कि वह एक बेहतरीन अभिनेता हैं, लेकिन गायक के तौर पर उनका मुकाबला सीधे सुरों के सम्राट से होने जा रहा था। इसी उधेड़बुन और घबराहट में रिकॉर्डिंग से ठीक पहली वाली रात अमिताभ बच्चन के लिए भारी हो गई। उनके दिमाग में लगातार यही ख्याल आ रहे थे कि अगर वह रफी साहब के सामने सुर से भटक गए या उनकी आवाज कमजोर पड़ गई तो क्या होगा। इसी गहरी चिंता और मानसिक दबाव के कारण वह पूरी रात करवटें बदलते रहे और उनकी आँखों से नींद पूरी तरह गायब हो गई। मोहम्मद रफी साहब अपनी विनम्रता के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनका ऊंचा संगीतमय कद ही ऐसा था कि अच्छे-अच्छे स्थापित कलाकार भी उनके सामने आने से पहले अपनी लाइनें कई बार दोहराते थे। अमिताभ बच्चन का यह डर किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि संगीत के प्रति उनके गहरे आदर का प्रतीक था।
अगली सुबह जब अमिताभ बच्चन रिकॉर्डिंग स्टूडियो पहुंचे, तो उनकी आंखों में रात भर न सोने की थकान साफ दिख रही थी, लेकिन मन में काम को बेहतर करने का जज्बा भी था। स्टूडियो का माहौल बेहद संजीदा था और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल अपनी पूरी टीम के साथ तैयार थे। मोहम्मद रफी साहब जब स्टूडियो में दाखिल हुए तो उन्होंने हमेशा की तरह अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ सबका अभिवादन किया। अमिताभ बच्चन ने बेहद सम्मान के साथ रफी साहब को प्रणाम किया और अपनी घबराहट को छुपाने की कोशिश करने लगे। रिकॉर्डिंग शुरू होने से पहले जब दोनों कलाकारों ने एक साथ रिहर्सल करना शुरू किया, तो रफी साहब को तुरंत अंदाजा हो गया कि अमिताभ बच्चन थोड़े असहज और तनाव में हैं। रफी साहब ने बड़े भाई की तरह अमिताभ बच्चन का हौसला बढ़ाया और माहौल को हल्का-फुल्का बनाने की कोशिश की ताकि वह खुलकर गा सकें।
जब फाइनल टेक की शुरुआत हुई, तो स्टूडियो के भीतर का नजारा देखने लायक था। 'चल चल मेरे भाई' गाने की प्रकृति ऐसी थी जिसमें एक शराबी भाई दूसरे भाई को मनाता है, इसलिए इसमें गायकी के साथ-साथ अभिनय के पुट की भी जरूरत थी। मोहम्मद रफी ने ऋषि कपूर के किरदार के लिए अपनी आवाज में वो मस्ती और खनक पैदा की, जिसकी मांग गाना कर रहा था। वहीं दूसरी तरफ, अमिताभ बच्चन ने अपनी भारी और रोबीली आवाज में संवाद अदायगी के अंदाज में गाना शुरू किया। रफी साहब के सुरों की तान के बीच अमिताभ बच्चन ने जिस तरह से अपनी पंक्तियों को संभाला, उसने गाने में एक अनोखा आकर्षण पैदा कर दिया। पूरी रिकॉर्डिंग के दौरान रफी साहब लगातार अमिताभ बच्चन को इशारों से प्रोत्साहित करते रहे, जिससे बिग बी का आत्मविश्वास बढ़ता चला गया और डर धीरे-धीरे गायब हो गया।
जब गाना पूरी तरह से रिकॉर्ड हो गया, तो स्टूडियो में मौजूद हर शख्स ने तालियां बजाकर दोनों की जुगलबंदी की सराहना की। संगीतकारों और निर्देशक मनमोहन देसाई के चेहरे की खुशी साफ बता रही थी कि जो कल्ट गाना वो चाहते थे, वह बनकर तैयार हो चुका था। अमिताभ बच्चन ने राहत की सांस ली और मोहम्मद रफी साहब का शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने अपनी सहूलियत और बड़े दिल से इस मुश्किल काम को बेहद आसान बना दिया था। यह गाना जब फिल्म के रिलीज होने के बाद सिनेमाघरों में गूंजा, तो दर्शकों ने इस पर जमकर प्यार लुटाया। आज 45 साल बीत जाने के बाद भी यह गाना उतना ही लोकप्रिय है और जब भी दोस्ती या भाइयों के प्यार की बात होती है, तो यह गाना लोगों की जुबान पर आ जाता है।
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