क्या आप जानते हैं दवाइयों के पैकेट पर क्यों बनी होती है लाल रंग की लाइन? यहां जानें

कई बार हम दवा की पट्टी या पैकेट पर एक लाल रंग की रेखा देखते हैं। यह रेखा इतनी सामान्य लगती है कि हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यह कोई साधारण डिजाइन नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी

Oct 8, 2025 - 11:41
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क्या आप जानते हैं दवाइयों के पैकेट पर क्यों बनी होती है लाल रंग की लाइन? यहां जानें
क्या आप जानते हैं दवाइयों के पैकेट पर क्यों बनी होती है लाल रंग की लाइन? यहां जानें

कई बार हम दवा की पट्टी या पैकेट पर एक लाल रंग की रेखा देखते हैं। यह रेखा इतनी सामान्य लगती है कि हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यह कोई साधारण डिजाइन नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी है, जो बताती है कि अंदर की दवा डॉक्टर के पर्चे के बिना नहीं लेनी चाहिए। स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी इस पर जागरूकता अभियान चलाया है। यह रेखा एंटीबायोटिक्स और अन्य शक्तिशाली दवाओं पर लगाई जाती है, ताकि लोग बिना सोचे-समझे इन्हें न खरीदें। इसका मकसद दवाओं के गलत इस्तेमाल को रोकना और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी गंभीर समस्या से बचाना है। आज हम इसी लाल रेखा के पीछे के रहस्य को समझेंगे।

यह रेखा 2016 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने शुरू की थी। इसका नाम रेड लाइन कैंपेन है। मंत्रालय ने ट्विटर पर एक पोस्ट डाली, जिसमें लिखा था कि दवा की पट्टी पर लाल रेखा वाली दवाएं बिना डॉक्टर के पर्चे के न लें। यह अभियान एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग को रोकने के लिए था। भारत में हर साल करोड़ों एंटीबायोटिक्स बिना जरूरत के बिकते हैं। इससे बैक्टीरिया मजबूत हो जाते हैं और साधारण संक्रमण भी घातक बन जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस से 2030 तक 10 लाख से ज्यादा मौतें हो सकती हैं। रेड लाइन इसी खतरे से बचाव का सरल तरीका है। यह रेखा दवा की पट्टी के किनारे पर खड़ी होती है और कभी-कभी एक लाल बॉक्स के रूप में भी दिखती है।

लाल रेखा वाली दवाओं को शेड्यूल एच1 दवाएं कहा जाता है। भारत के ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत ये दवाएं हैं, जिन्हें फार्मेसी केवल डॉक्टर के पर्चे पर ही बेच सकती है। शेड्यूल एच सामान्य पर्चे वाली दवाएं हैं, लेकिन शेड्यूल एच1 में सख्ती ज्यादा है। इन पर लाल रेखा के साथ लिखा होता है, 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के तहत रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर के पर्चे पर ही बेचें।' एंटीबायोटिक्स जैसे एमॉक्सिसिलिन, सिप्रोफ्लॉक्सासिन और सेफालोस्पोरिन्स पर यह रेखा आम है। ये दवाएं बैक्टीरिया को मारती हैं, लेकिन बिना जांच के लेने से शरीर में रेजिस्टेंस विकसित हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 70 फीसदी एंटीबायोटिक्स बिना पर्चे के बिकते हैं। रेड लाइन कैंपेन ने इसे 50 फीसदी तक कम करने में मदद की है।

यह रेखा सिर्फ एंटीबायोटिक्स तक सीमित नहीं है। कुछ दवाओं पर अन्य रंगों की रेखाएं भी होती हैं। उदाहरण के लिए, हरी रेखा वाली दवाएं अस्पतालों या क्लिनिक्स के लिए होती हैं। नीली रेखा सामान्य दवाओं को दर्शाती है, जो बिना पर्चे के मिल सकती हैं। काली रेखा कुछ विशेष दवाओं के लिए होती है। लेकिन लाल रेखा सबसे महत्वपूर्ण है। यह चेतावनी देती है कि दवा का गलत इस्तेमाल जानलेवा हो सकता है। साइड इफेक्ट्स जैसे एलर्जी, लीवर डैमेज या किडनी समस्या हो सकती हैं। डॉक्टर जांच के बाद ही डोज तय करते हैं, जो व्यक्ति की उम्र, वजन और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। बिना सलाह के दवा लेने से ये खतरे बढ़ जाते हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने मार्च 2024 में फिर से इस पर ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, 'एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को रोकें। दवा की पट्टी पर लाल रेखा का मतलब है कि डॉक्टर के पर्चे के बिना न लें।' इस ट्वीट के साथ एक इमेज थी, जिसमें लाल रेखा वाली पट्टी दिखाई गई। मंत्रालय ने कहा कि फार्मासिस्ट को पर्चा चेक करना अनिवार्य है। अगर बिना पर्चे बेचा, तो जुर्माना या जेल हो सकती है। लेकिन जागरूकता की कमी से समस्या बनी हुई है। एक सर्वे में पाया गया कि 42 फीसदी मरीज एंटीबायोटिक्स पहचानते हैं, लेकिन रेड लाइन का मतलब सिर्फ 6 फीसदी डॉक्टर जानते हैं। नर्स और मरीजों में यह संख्या शून्य थी। इससे साफ है कि अभियान को और मजबूत करने की जरूरत है।

दवा की पैकेजिंग पर अन्य जानकारी भी महत्वपूर्ण होती है। एक्सपायरी डेट चेक करना जरूरी है। पुरानी दवा बेअसर हो जाती है या हानिकारक। डोजेज लेबल पर लिखी होती है, जैसे वयस्कों के लिए कितनी गोली। बच्चों की दवा अलग डोज वाली होती है। एलर्जी वार्निंग बताती है कि किसे न लें। स्टोरेज कंडीशन जैसे 'ठंडी जगह रखें' का पालन न करने से दवा खराब हो जाती है। पेशेंट इंफॉर्मेशन लीफलेट पढ़ें, जिसमें साइड इफेक्ट्स और इंटरैक्शन की डिटेल्स होती हैं। लेकिन लाल रेखा इन सब से अलग है, क्योंकि यह दवा खरीदने के समय ही अलर्ट करती है।

भारत में दवा उद्योग बड़ा है। सालाना 1.5 लाख करोड़ का बाजार है। लेकिन ओवर द काउंटर सेल से समस्या बढ़ रही है। रेड लाइन कैंपेन ने फार्मासिस्टों को ट्रेनिंग दी। अब कई दुकानों पर बोर्ड लगे हैं, 'लाल रेखा वाली दवा बिना पर्चे नहीं।' फिर भी, ग्रामीण इलाकों में जागरूकता कम है। विशेषज्ञ कहते हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में इसे पढ़ाया जाए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारत की इस पहल की तारीफ की। उन्होंने कहा कि यह ग्लोबल एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को रोकने का अच्छा उदाहरण है।

एक उदाहरण लें। सर्दी-जुकाम में लोग खुद एंटीबायोटिक्स ले लेते हैं। लेकिन जुकाम वायरल होता है, बैक्टीरियल नहीं। एंटीबायोटिक्स बेकार जाते हैं और रेजिस्टेंस बढ़ता है। लाल रेखा इसी गलती को रोकती है। डॉक्टर कहते हैं कि दवा का कोर्स पूरा करें। बीच में छोड़ने से बैक्टीरिया मजबूत हो जाते हैं। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। लाल रेखा वाली दवा लेने से पहले हमेशा डॉक्टर से पूछें।

यह रेखा दवा कंपनियों के लिए भी जरूरी है। पैकेजिंग पर इसे अनिवार्य करना पड़ता है। अगर न लगाएं, तो लाइसेंस रद्द हो सकता है। कंपनियां जैसे सन फार्मा और सिप्ला इसे फॉलो करती हैं। उपभोक्ता संगठन कहते हैं कि लेबलिंग और मजबूत हो। रेड लाइन ने लाखों लोगों को बचाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अभियान के बाद एंटीबायोटिक्स की बिक्री 20 फीसदी घटी। लेकिन अभी भी काम बाकी है।

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