UP: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई फटकार, गाजियाबाद जेल में जमानत के बावजूद हिरासत में रखे गए आफताब को 5 लाख मुआवजा, जिम्मेदार अधिकारियों पर होगी कार्रवाई।

भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार और गाजियाबाद जेल प्रशासन को एक गंभीर मामले में कड़ी फटकार लगाई है, जिसमें एक व्यक्ति...

Jun 26, 2025 - 11:12
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UP: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को लगाई फटकार, गाजियाबाद जेल में जमानत के बावजूद हिरासत में रखे गए आफताब को 5 लाख मुआवजा, जिम्मेदार अधिकारियों पर होगी कार्रवाई।

भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार और गाजियाबाद जेल प्रशासन को एक गंभीर मामले में कड़ी फटकार लगाई है, जिसमें एक व्यक्ति, आफताब, को जमानत मिलने के बावजूद 28 दिनों तक जेल में रखा गया। यह मामला न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन को उजागर करता है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और तकनीकी खामियों के कारण संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर भी सवाल उठाता है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आफताब को 5 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दिया है और गाजियाबाद के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज को इस मामले की जांच सौंपी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के बाद जिम्मेदार अधिकारियों से मुआवजे की वसूली पर विचार किया जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 18 अगस्त 2025 को होगी।

  • जमानत के बावजूद हिरासत

आफताब, जिसे जनवरी 2024 में एक हिंदू महिला से मंदिर में विवाह करने के कुछ दिनों बाद गिरफ्तार किया गया था, पर उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1), साथ ही भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 (अपहरण या विवाह के लिए प्रलोभन) के तहत आरोप लगाए गए थे। यह शिकायत उनकी पत्नी की मौसी ने दर्ज की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आफताब ने अपहरण और जबरन धर्मांतरण किया। सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल 2024 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष आफताब को जमानत दे दी थी। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था और यह एक व्यवस्थित विवाह था। इसके बाद, गाजियाबाद की निचली अदालत ने 27 मई 2024 को रिहाई का आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि 1.5 लाख रुपये का निजी मुचलका और दो जमानतदारों के साथ आफताब को रिहा किया जाए।

हालांकि, गाजियाबाद जेल प्रशासन ने रिहाई आदेश को यह कहकर लागू करने से इनकार कर दिया कि आदेश में धारा 5(1) का उल्लेख नहीं था, बल्कि केवल धारा 5 लिखा गया था। इस तकनीकी खामी के कारण आफताब को 24 जून 2024 तक, यानी 28 दिनों तक, जेल में रखा गया। इस दौरान, आफताब के वकील, अभिषेक सिंह, ने सुप्रीम कोर्ट में एक विविध याचिका दायर की, जिसमें जमानत आदेश में संशोधन की मांग की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और 24 जून 2025 को उत्तर प्रदेश के डीजी (जेल) पी.सी. मीणा और गाजियाबाद जेल के सीनियर सुपरिंटेंडेंट सीता राम शर्मा को तलब किया।

  • सुप्रीम कोर्ट की तीखी प्रतिक्रिया

25 जून 2025 को सुनवाई के दौरान, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने जेल प्रशासन की इस लापरवाही को "न्याय का मजाक" और "संवैधानिक स्वतंत्रता का हनन" करार दिया। कोर्ट ने कहा, "स्वतंत्रता एक अत्यंत मूल्यवान और कीमती अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को गारंटीकृत है। इसे ऐसी तुच्छ तकनीकी खामियों के आधार पर छीना नहीं जा सकता।" जस्टिस विश्वनाथन ने डीजी (जेल) पी.सी. मीणा और जेल सुपरिंटेंडेंट से सवाल किया, "क्या आप अपने अधिकारियों को यही सिखाते हैं कि वे धाराओं के उप-खंडों की तलाश करें और आदेशों को लागू न करें? उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जिसमें कई जेलें हैं, भगवान जाने कितने लोग ऐसी तकनीकी खामियों के कारण जेलों में बंद हैं।"

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) गरिमा प्रसाद के तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि जेल अधिकारियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक फैसले का पालन किया, जिसमें रिहाई आदेशों में सभी प्रासंगिक धाराओं का उल्लेख अनिवार्य था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय का वह फैसला जाली आदेशों से संबंधित था और इस मामले में लागू नहीं होता। कोर्ट ने कहा, "जब मामले का क्राइम नंबर, अपराध, और धाराएं स्पष्ट थीं, तो इस तरह की तकनीकी खामी का बहाना बनाना हास्यास्पद है।"

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह आफताब को 5 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा दे और 27 जून 2025 तक अनुपालन रिपोर्ट (कंप्लायंस रिपोर्ट) प्रस्तुत करे। कोर्ट ने इसे "प्रोविजनल" मुआवजा करार दिया, यह कहते हुए कि अंतिम मुआवजे की राशि गाजियाबाद के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की जांच रिपोर्ट के आधार पर तय की जाएगी। इस जांच में यह पता लगाया जाएगा कि क्या यह देरी केवल लापरवाही थी या इसमें "कुछ और गंभीर" (जैसे जानबूझकर किया गया कृत्य) शामिल था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होती है, तो मुआवजे की राशि या उसका हिस्सा उनसे वसूला जा सकता है।

डीजी (जेल) पी.सी. मीणा ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह सभी जेल अधिकारियों को संवेदनशील बनाएंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। कोर्ट ने उन्हें निर्देश दिया कि वे पूरे राज्य में जेलों को रिहाई आदेशों को "मूल रूप से" लागू करने की हिदायत दें, न कि छोटी-मोटी तकनीकी खामियों पर अटकें।

यह मामला केवल एक व्यक्ति की रिहाई में देरी का नहीं है, बल्कि यह भारत के जेल प्रशासन और नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है। X पर इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, जहां कई यूजर्स ने इसे "नौकरशाही की मनमानी" और "न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग" करार दिया। एक यूजर ने लिखा, "यह शर्मनाक है कि तकनीकी खामियों के नाम पर किसी की स्वतंत्रता छीनी जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई स्वागत योग्य है।"

यह घटना उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 के दुरुपयोग के संदर्भ में भी चर्चा में रही है। आफताब ने दावा किया था कि उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया और वह स्वयं हिंदू धर्म में परिवर्तित हो चुका था। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने जमानत आदेश में उल्लेख किया था कि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था, और इसमें कोई जबरदस्ती नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल आफताब के लिए न्याय सुनिश्चित करता है, बल्कि यह एक मिसाल भी कायम करता है कि संवैधानिक स्वतंत्रता को तकनीकी खामियों के आधार पर हल्के में नहीं लिया जा सकता। गाजियाबाद जेल प्रशासन की इस लापरवाही ने न केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन किया, बल्कि उत्तर प्रदेश के जेल तंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए। कोर्ट द्वारा आदेशित जांच और मुआवजा जिम्मेदार अधिकारियों के लिए एक चेतावनी है कि वे अपने कर्तव्यों का पालन करें और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानें।

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