देश- विदेश: पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ की सऊदी अरब से भारत के साथ शांति वार्ता की अपील, POK, आतंकवाद और व्यापार पर बातचीत की पेशकश, भारत की शर्तें बरकरार।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब्दुलअजीज अल सऊद के ...
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब्दुलअजीज अल सऊद के समक्ष भारत के साथ शांति वार्ता शुरू करने की इच्छा जताई है। यह बयान 25 जून 2025 को दिया गया, जिसमें शरीफ ने कहा कि वह भारत के साथ आतंकवाद, पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK), सिंधु जल संधि, और व्यापार जैसे मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाने को तैयार हैं। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के महीनों में तनाव चरम पर रहा, खासकर 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और इसके जवाब में भारत द्वारा 6-7 मई को शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद। शरीफ की इस पेशकश को कुछ लोग शांति की दिशा में एक कदम मान रहे हैं, जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि बातचीत केवल आतंकवाद और POK के मुद्दे पर होगी, और वह भी तब, जब पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई करेगा।
- शहबाज शरीफ की अपील
पाकिस्तान और भारत के बीच संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं, जिसमें कश्मीर, आतंकवाद, और जल बंटवारे जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। हाल ही में, 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले, जिसमें 26 लोग मारे गए थे, ने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया। भारत ने इस हमले का जवाब ऑपरेशन सिंदूर के जरिए दिया, जिसमें 6-7 मई को पाकिस्तान और POK में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए गए, जिसमें 100 से अधिक आतंकवादी मारे गए। इसके बाद, पाकिस्तान ने 8, 9 और 10 मई को भारतीय सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइल हमले करने की कोशिश की, जिसका भारत ने कड़ा जवाब दिया। 10 मई को दोनों देशों के डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस) के बीच बातचीत के बाद युद्धविराम पर सहमति बनी।
इस सैन्य तनाव के बाद, शहबाज शरीफ ने कई मौकों पर भारत के साथ शांति वार्ता की इच्छा जताई। 26 मई 2025 को तेहरान में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरीफ ने कहा था कि वह कश्मीर, आतंकवाद, जल, और व्यापार के मुद्दों पर भारत से बातचीत को तैयार हैं। अब, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस से उनकी मुलाकात में, शरीफ ने सऊदी अरब को एक "तटस्थ स्थान" के रूप में प्रस्तावित किया, जहां भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत हो सकती है। उन्होंने सऊदी नेतृत्व से मध्यस्थता की अपील की, यह कहते हुए कि वह सभी विवादों को सुलझाने के लिए तैयार हैं।
- भारत का रुख: आतंकवाद और POK पर सख्ती
भारत ने शहबाज शरीफ की इस पेशकश पर ठंडी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 29 मई 2025 को एक प्रेस ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि भारत के साथ कोई भी बातचीत केवल आतंकवाद और POK के मुद्दे पर होगी, और वह भी तब, जब पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ "विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय" कदम उठाएगा। भारत ने यह भी दोहराया कि कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं, और POK को वापस करने की प्रक्रिया और समयसीमा ही बातचीत का आधार हो सकती है।
भारत ने साफ किया है कि "आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते, आतंकवाद और व्यापार साथ नहीं हो सकते, और खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।" भारत ने सिंधु जल संधि को भी निलंबित कर रखा है, जिसे लेकर पाकिस्तान ने कई बार चिंता जताई है। सिंधु जल संधि, जो 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी, के तहत झेलम, चिनाब, और सिंधु नदियों का पानी पाकिस्तान को, जबकि रावी, ब्यास, और सतलज का पानी भारत को आवंटित किया गया था। पहलगाम हमले के बाद भारत ने इस संधि को निलंबित कर दिया, जिसके कारण पाकिस्तान में जल संकट की आशंका बढ़ गई है।
- सऊदी अरब की भूमिका और भू-राजनीतिक परिदृश्य
शहबाज शरीफ का सऊदी अरब को तटस्थ मध्यस्थ के रूप में प्रस्तावित करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सऊदी अरब भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और इसका पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड (PIF) भारत में भारी निवेश कर रहा है। इसके अलावा, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच भी लंबे समय से घनिष्ठ संबंध रहे हैं, विशेष रूप से आर्थिक और सैन्य सहयोग के क्षेत्र में। शरीफ ने सऊदी क्राउन प्रिंस से यह अपील इसलिए की, क्योंकि भारत ने अमेरिका और चीन जैसे अन्य देशों को मध्यस्थता के लिए अस्वीकार कर दिया है। भारत ने बार-बार कहा है कि पाकिस्तान के साथ उसका मसला द्विपक्षीय है, और किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि, सऊदी अरब की मध्यस्थता की संभावना को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इसके लिए सहमत नहीं होगा, क्योंकि वह कश्मीर को अपनी संप्रभुता और भावनात्मक मूल्य का मसला मानता है। फिर भी, सऊदी अरब की भारत के साथ मजबूत आर्थिक साझेदारी और पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक संबंध इसे एक संभावित मध्यस्थ बनाते हैं, बशर्ते भारत अपनी शर्तों पर सहमत हो।
- पाकिस्तान की दोहरी नीति और विश्वसनीयता पर सवाल
शहबाज शरीफ की शांति की अपील के बावजूद, पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। 5 फरवरी 2025 को, जब शरीफ ने मुजफ्फराबाद में POK विधानसभा में शांति वार्ता की बात कही, उसी दिन POK के रावलाकोट में जैश-ए-मोहम्मद (JeM) और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे आतंकी संगठनों के नेताओं ने हमास के प्रतिनिधियों के साथ एक सम्मेलन में भाग लिया, जहां भारत-विरोधी नारे लगाए गए। यह दोहरा रवैया भारत के संदेह को और मजबूत करता है कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने में गंभीर नहीं है।
X पर इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक यूजर ने लिखा, "पहले POK खाली करो, आतंकियों को सौंपो, फिर बातचीत की सोचो।" एक अन्य यूजर ने कहा, "पाकिस्तान की शांति की बातें सिर्फ दिखावा हैं। भारत की शर्तें साफ हैं—आतंकवाद बंद करो, POK लौटाओ।"
शहबाज शरीफ की यह पेशकश भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकती है, बशर्ते पाकिस्तान भारत की शर्तों को माने। भारत ने बार-बार कहा है कि वह आतंकवाद-मुक्त वातावरण में सामान्य पड़ोसी संबंध चाहता है। हालांकि, 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से, जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटा गया, पाकिस्तान ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश की, लेकिन उसे व्यापक समर्थन नहीं मिला।
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी इस समय कमजोर है, और सिंधु जल संधि का निलंबन उसके लिए एक बड़ा संकट बन गया है, क्योंकि यह संधि उसके 80% कृषि और एक-तिहाई हाइड्रोपावर के लिए महत्वपूर्ण है। शरीफ की शांति की अपील को कुछ विश्लेषक इस आर्थिक दबाव से जोड़कर देख रहे हैं।
शहबाज शरीफ की सऊदी अरब से भारत के साथ शांति वार्ता की अपील एक ओर शांति की संभावना को दर्शाती है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान की दोहरी नीति और भारत की सख्त शर्तों के बीच जटिलताओं को उजागर करती है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद के खिलाफ ठोस कार्रवाई और POK की वापसी ही बातचीत का आधार हो सकती है। सऊदी अरब जैसे तटस्थ मध्यस्थ की संभावना के बावजूद, भारत की द्विपक्षीय नीति और आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस का रुख इस प्रक्रिया को जटिल बनाता है। यह मामला न केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक भू-राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है।
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