सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद जागी बंगाल पुलिस, सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में दो पार्षदों सहित छह पर प्राथमिकी।

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से शुरू हुआ मतदाता सूची संशोधन (SIR) का विवाद अब प्रदेश की राजधानी कोलकाता तक पहुँच चुका है, जिससे

Apr 3, 2026 - 11:30
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सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद जागी बंगाल पुलिस, सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में दो पार्षदों सहित छह पर प्राथमिकी।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद जागी बंगाल पुलिस, सरकारी कार्य में बाधा डालने के आरोप में दो पार्षदों सहित छह पर प्राथमिकी।
  • मालदा से शुरू हुआ मतदाता सूची विवाद अब कोलकाता तक पहुँचा, मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन पर भारी कार्रवाई
  • पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मियों के बीच गहराया 'फॉर्म-6' का विवाद, निर्वाचन आयोग के दफ्तर की सुरक्षा बढ़ी, धारा 163 लागू

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से शुरू हुआ मतदाता सूची संशोधन (SIR) का विवाद अब प्रदेश की राजधानी कोलकाता तक पहुँच चुका है, जिससे राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की घटना के बाद, अब कोलकाता पुलिस ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय के बाहर हुए हिंसक प्रदर्शनों के मामले में बड़ी कानूनी कार्रवाई की है। पुलिस ने कोलकाता नगर निगम के दो सत्ताधारी दल के पार्षदों सहित कुल छह नामजद और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है। यह मामला 31 मार्च और 1 अप्रैल को स्ट्रैंड रोड स्थित चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर हुए उस विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने भारी भीड़ जमा कर सरकारी कामकाज में बाधा डाली थी।

इस कानूनी कार्रवाई की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की वह तीखी टिप्पणी है, जिसमें शीर्ष अदालत ने मालदा की घटना को न्यायिक सत्ता को चुनौती देने वाला करार दिया था। कोर्ट की फटकार के बाद प्रशासन दबाव में दिखा और आनन-फानन में उन प्रदर्शनकारियों की पहचान शुरू की गई जिन्होंने चुनाव आयोग के दफ्तर का घेराव किया था। कोलकाता पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में वार्ड संख्या 36 के पार्षद सचिन सिंह और वार्ड संख्या 32 के पार्षद शांति रंजन कुंडू को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इन पर आरोप है कि इन्होंने निषेधाज्ञा (बीएनएसएस की धारा 163) का उल्लंघन करते हुए सैकड़ों समर्थकों के साथ आधी रात को चुनाव कार्यालय के बाहर नारेबाजी की और सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास किया।

'फॉर्म-6' बना विवाद की मुख्य जड़

पश्चिम बंगाल में इस समय 'फॉर्म-6' (नया मतदाता नाम जोड़ने का फॉर्म) को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ठन गई है। सत्ताधारी दल का आरोप है कि दूसरे राज्यों के लोगों के नाम मतदाता सूची में जोड़ने के लिए भारी संख्या में फॉर्म जमा किए जा रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बता रहा है। इसी मुद्दे ने मालदा से लेकर कोलकाता तक हिंसा की आग भड़काई है।

मालदा जिले में विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे से अधिक समय तक भोजन और पानी के बिना बंधक बनाए रखने की घटना ने न्यायपालिका को झकझोर कर रख दिया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस घटना पर स्वतः संज्ञान लेते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) से जवाब तलब किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि राज्य का प्रशासनिक तंत्र न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहता है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक काला दिन है। इसी दबाव के बीच कोलकाता पुलिस ने अब उन राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है जो चुनाव आयोग की स्वायत्तता को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।

कोलकाता के स्ट्रैंड रोड स्थित निर्वाचन सदन के बाहर हुए हंगामे के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी। प्रदर्शनकारियों का दावा था कि वे केवल 'वोटर हाइजैकिंग' के खिलाफ आवाज उठा रहे थे, लेकिन पुलिस का कहना है कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर अधिकारियों को डराने-धमकाने की कोशिश की गई। पुलिस द्वारा दर्ज मामले में गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होने, लोक सेवक के आदेश की अवहेलना करने और दंगा भड़काने की कोशिश जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने भी इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यदि स्थानीय पुलिस व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं है, तो आयोग को सीधे नियंत्रण अपने हाथ में लेना पड़ेगा।

सियासी गलियारों में इस एफआईआर को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सत्ताधारी दल के नेताओं का तर्क है कि उनके पार्षदों को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे मतदाता सूची में होने वाली कथित धांधली को रोक रहे थे। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इस कार्रवाई का स्वागत करते हुए कहा है कि बंगाल में 'जंगलराज' जैसी स्थिति बन गई है जहाँ संवैधानिक संस्थाओं के दफ्तरों को भी नहीं बख्शा जा रहा है। चुनाव आयोग ने अब साफ कर दिया है कि किसी भी प्रकार की असामाजिक गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और मतदान केंद्रों से लेकर प्रशासनिक कार्यालयों तक केंद्रीय बलों की तैनाती बढ़ाई जा सकती है।

इस पूरे प्रकरण ने आगामी विधानसभा चुनावों की शुचिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मालदा में जिस तरह से मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के विरोध में राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया गया और टायर जलाए गए, उसने प्रशासन की तैयारियों की पोल खोल दी है। अब कोलकाता में पार्षदों पर हुई एफआईआर ने यह संकेत दे दिया है कि निर्वाचन आयोग किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज और वीडियो साक्ष्यों के आधार पर उन अन्य लोगों की भी पहचान कर रही है जो उस रात हंगामे में शामिल थे। प्रशासन ने निर्वाचन सदन के आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा घेरा और कड़ा कर दिया है ताकि दोबारा ऐसी स्थिति पैदा न हो।

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