इंजीनियर राशिद का संसद में दर्द- डेढ़ लाख रुपये रोज़ खर्च कर पहुंचे, बोले- मुझे बोलने का मौका दीजिए।
Political News: जम्मू-कश्मीर के बारामूला से निर्दलीय लोकसभा सांसद शेख अब्दुल राशिद, जिन्हें इंजीनियर राशिद के नाम से जाना जाता है, ने 29 जुलाई 2025 को ....
जम्मू-कश्मीर के बारामूला से निर्दलीय लोकसभा सांसद शेख अब्दुल राशिद, जिन्हें इंजीनियर राशिद के नाम से जाना जाता है, ने 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में एक भावुक भाषण दिया। आतंकवादी वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) मामले में 2019 से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद राशिद को संसद के मानसून सत्र में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने कस्टडी पैरोल दी थी। लेकिन इस पैरोल के साथ एक शर्त थी कि उन्हें जेल से संसद तक आने-जाने और सुरक्षा व्यवस्था का खर्च खुद उठाना होगा, जो प्रतिदिन 1.45 लाख रुपये है। इस खर्च का जिक्र करते हुए राशिद ने लोकसभा में कहा, “मैं डेढ़ लाख रुपये देकर आया हूं, मुझे बोलने दीजिए। शायद मैं आज के बाद संसद न आ पाऊं।”
- इंजीनियर राशिद का भाषण और कश्मीर का मुद्दा
लोकसभा में अपनी स्पीच शुरू करने से पहले इंजीनियर राशिद ने मशहूर उर्दू शायर हबीब जालिब की नज़्म ‘दस्तूर’ पढ़ी, जो अन्याय और दमन के खिलाफ एक प्रतीक मानी जाती है। उन्होंने कश्मीर के मुद्दों को उठाते हुए कहा, “कश्मीरियों को क्यों मारा जा रहा है? हमारा कसूर क्या है? हमारे खून का जवाब कौन देगा?” उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि कश्मीर की संस्कृति और जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) के साथ छेड़छाड़ न की जाए। राशिद ने कहा, “आपको हिंदू राष्ट्र बनाना है, तो बनाइए, लेकिन कश्मीर को कश्मीर रहने दीजिए। पाकिस्तान के साथ आपका जो झगड़ा है, हमें उससे क्या लेना-देना? हम बीच में क्यों मारे जा रहे हैं?”
उनके भाषण ने संसद में मौजूद सांसदों का ध्यान खींचा, क्योंकि यह न केवल उनकी व्यक्तिगत परेशानी को दर्शाता था, बल्कि कश्मीर में चल रहे हालात पर भी सवाल उठाता था। राशिद ने यह भी कहा कि वह अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने के लिए संसद में हैं, लेकिन हर दिन डेढ़ लाख रुपये का खर्च उनके लिए असहनीय है।
- टेरर फंडिंग मामले में गिरफ्तारी
इंजीनियर राशिद को 2019 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया था। उन पर 2017 के आतंकवादी वित्तपोषण मामले में शामिल होने का आरोप है। एनआईए के अनुसार, राशिद का नाम कश्मीरी कारोबारी जहूर वटाली की जांच के दौरान सामने आया, जिसे आतंकवादी समूहों और अलगाववादियों को फंडिंग करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। एनआईए का दावा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों ने जम्मू-कश्मीर में हिंसा और हमले किए। राशिद पर भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), 121 (सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना), 124ए (देशद्रोह) और यूएपीए की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं।
राशिद इससे पहले 2005 में भी श्रीनगर में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप द्वारा आतंकियों की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार हुए थे। उस समय वे तीन महीने और 17 दिन तक राजबाग जेल में रहे, लेकिन बाद में मानवीय आधार पर सभी आरोपों से बरी कर दिए गए।
इंजीनियर राशिद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में तिहाड़ जेल से ही बारामूला सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में हिस्सा लिया। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला को करीब दो लाख वोटों से हराया। इस जीत को कश्मीर की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर माना गया। राशिद की पार्टी, जम्मू-कश्मीर अवामी इत्तेहाद पार्टी, और उनके बेटों ने इस चुनाव में केवल 27,000 रुपये खर्च कर प्रचार किया। इस जीत ने राशिद को कश्मीर में एक मजबूत राजनीतिक चेहरा बना दिया, लेकिन उनकी जेल में बंदी ने उनकी संसदीय जिम्मेदारियों को पूरा करने में बाधा डाली।
राशिद को संसद सत्र में हिस्सा लेने के लिए कई बार कस्टडी पैरोल दी गई। कस्टडी पैरोल का मतलब है कि उन्हें सशस्त्र पुलिस की निगरानी में संसद ले जाया जाता है और सत्र खत्म होने के बाद वापस जेल लाया जाता है। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 22 जुलाई 2025 को उन्हें 24 जुलाई से 4 अगस्त तक मानसून सत्र में हिस्सा लेने के लिए कस्टडी पैरोल दी थी। लेकिन कोर्ट ने शर्त रखी कि उन्हें हर दिन 1.45 लाख रुपये का खर्च खुद वहन करना होगा, जिसमें परिवहन और सुरक्षा व्यवस्था शामिल है। इसके अलावा, उन्हें मीडिया से बात करने या मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है।
राशिद ने इस खर्च को वहन करने में असमर्थता जताई और दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इस शर्त को हटाने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि एक निर्वाचित सांसद के रूप में अपने संवैधानिक कर्तव्यों को निभाने के लिए उन्हें इस भारी खर्च से मुक्त किया जाना चाहिए। उनकी याचिका में कहा गया कि छह दिनों के सत्र के लिए उन्हें 8.74 लाख रुपये खर्च करने पड़ेंगे, जो उनके लिए संभव नहीं है।
29 जुलाई 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को उस पीठ को स्थानांतरित करने का संकेत दिया, जिसने पहले बजट सत्र के लिए उनकी याचिका पर विचार किया था। कोर्ट ने कहा कि एक ही मामले को अलग-अलग पीठों द्वारा सुनना उचित नहीं है। इस मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई 2025 को होनी है।
राशिद ने कई बार नियमित और अंतरिम जमानत के लिए याचिका दायर की, लेकिन उन्हें बार-बार निराशा हाथ लगी। 10 सितंबर 2024 को पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए 2 अक्टूबर तक अंतरिम जमानत दी थी। इस दौरान उन्होंने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया। 28 अक्टूबर 2024 को उन्होंने तिहाड़ जेल में सरेंडर कर दिया।
10 मार्च 2025 को पटियाला हाउस कोर्ट ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने 26 मार्च से 4 अप्रैल तक के लिए कस्टडी पैरोल दी, लेकिन खर्च की शर्त बरकरार रखी। 21 मार्च 2025 को उनकी नियमित जमानत याचिका भी खारिज हो गई। एनआईए ने उनकी जमानत का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें सांसद के रूप में अपनी स्थिति का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
24 फरवरी 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट ने पटियाला हाउस कोर्ट के स्पेशल एनआईए कोर्ट को उनकी जमानत याचिका पर जल्द फैसला लेने का निर्देश दिया। लेकिन राशिद ने बाद में अपनी याचिका वापस ले ली, क्योंकि हाई कोर्ट ने पहले ही प्रशासनिक निर्देश दे दिए थे कि एनआईए कोर्ट ही मामले की सुनवाई करेगी।
इंजीनियर राशिद की लोकसभा में मौजूदगी और उनके बयानों ने कश्मीर की राजनीति में हलचल मचा दी। उनकी जीत ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसे स्थापित दलों को चुनौती दी। उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने उनकी जमानत को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा और दावा किया कि यह कश्मीर की राजनीति में हस्तक्षेप का हिस्सा है।
राशिद के समर्थकों का मानना है कि उनकी गिरफ्तारी राजनीति से प्रेरित है। उनकी पार्टी, अवामी इत्तेहाद पार्टी, कश्मीर में युवाओं और स्थानीय मुद्दों को उठाने के लिए जानी जाती है। राशिद के बेटों और समर्थकों ने उनके लिए जेल से बाहर रहकर प्रचार किया, जिसने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया।
इंजीनियर राशिद की कहानी जम्मू-कश्मीर की जटिल राजनीति और कानूनी चुनौतियों का प्रतीक है। एक तरफ वे एक निर्वाचित सांसद हैं, जो अपने क्षेत्र के लोगों की आवाज संसद में उठाना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ टेरर फंडिंग जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। डेढ़ लाख रुपये प्रतिदिन के खर्च की शर्त ने उनकी संसदीय भागीदारी को मुश्किल बना दिया है।
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