महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी (Hindi Marathi) विवाद ने पकड़ा तूल, ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) पर भड़के नेता, कांग्रेस ने बनाई दूरी। 

Maharashtra Hindi-Marathi: महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी भाषा विवाद ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और...

Jul 9, 2025 - 11:11
Jul 9, 2025 - 16:47
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महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी (Hindi Marathi) विवाद ने पकड़ा तूल, ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) पर भड़के नेता, कांग्रेस ने बनाई दूरी। 
महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी विवाद ने पकड़ा तूल, ठाकरे बंधुओं पर भड़के नेता, कांग्रेस ने बनाई दूरी। 

Maharashtra Hindi-Marathi: महाराष्ट्र में हिंदी-मराठी (Hindi Marathi) भाषा विवाद ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। इस मुद्दे पर शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thakrey) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thakrey) के एक मंच पर आने के बाद देशभर में हंगामा मच गया है। दोनों नेताओं ने केंद्र और महाराष्ट्र की महायुति सरकार पर हिंदी थोपने का आरोप लगाया, जिसके बाद हिंदी भाषी राज्यों के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे, भोजपुरी अभिनेता और पूर्व सांसद दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’, और सांसद पप्पू यादव ने ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) पर निशाना साधा। वहीं, कांग्रेस ने इस विवाद से खुद को अलग रखा, जिसके पीछे उसकी सियासी रणनीति मानी जा रही है। हिंदी-मराठी (Hindi Marathi) विवाद अब केवल भाषा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मराठी अस्मिता, क्षेत्रीय राजनीति और आगामी बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों का हिस्सा बन गया है।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब महाराष्ट्र सरकार ने त्रिभाषा नीति के तहत कक्षा 1 से 5 तक हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा। 16 अप्रैल 2025 के इस सरकारी आदेश ने मराठी अस्मिता से जुड़े लोगों में नाराजगी पैदा की। राज ठाकरे (Raj Thakrey) ने इस नीति को मराठी संस्कृति पर हमला बताते हुए विरोध का ऐलान किया। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thakrey) ने भी उनका समर्थन किया। दोनों नेताओं ने 5 जुलाई 2025 को मुंबई के वर्ली में ‘विजय रैली’ आयोजित की, जिसमें सरकार द्वारा इस नीति को वापस लेने का जश्न मनाया गया। इस रैली में दोनों चचेरे भाइयों ने 20 साल बाद एक मंच साझा किया, जिसने महाराष्ट्र की सियासत में भूचाल ला दिया।

रैली में राज ठाकरे (Raj Thakrey) ने कहा कि हिंदी एक अच्छी भाषा है, लेकिन इसे बच्चों पर थोपा नहीं जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब गुजरात, उत्तर प्रदेश या बिहार में हिंदी अनिवार्य नहीं है, तो महाराष्ट्र में क्यों? उद्धव ठाकरे (Uddhav Thakrey) ने भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर मराठी के लिए आवाज उठाना गुंडागर्दी है, तो वे गुंडे हैं।

विवाद तब और गहराया जब मराठी भाषा के नाम पर हिंदीभाषियों के साथ मारपीट की घटनाएं सामने आईं। 29 जून 2025 को मीरा-भायंदर में मनसे कार्यकर्ताओं ने एक गुजराती दुकानदार को मराठी न बोलने पर पीटा। एक अन्य घटना में ठाणे स्टेशन पर शिवसेना (यूबीटी) के पूर्व सांसद राजन विचारे के समर्थकों ने एक गैर-मराठी दुकानदार को थप्पड़ मारा। इन घटनाओं के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए, जिससे सियासी बवाल मच गया।

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) को खुली चुनौती दी। उन्होंने कहा, “अगर हिम्मत है, तो मुंबई के माहिम में गैर-मराठी भाषी को मारकर दिखाएं। हिंदीभाषियों को मारते हो, तो उर्दू, तमिल, तेलुगु बोलने वालों को भी मारो।” उन्होंने यह भी कहा कि ठाकरे भाई बीएमसी चुनाव से पहले सस्ती राजनीति कर रहे हैं।

भोजपुरी अभिनेता और पूर्व सांसद दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ ने कहा कि महाराष्ट्र में हिंदीभाषियों पर हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे। उन्होंने ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) से सवाल किया कि क्या वे हिंदी सिनेमा की कमाई का बहिष्कार करेंगे? सांसद पप्पू यादव ने भी हिंदीभाषियों के समर्थन में बयान दिया और कहा कि भाषा के नाम पर हिंसा गलत है

महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे ने इस मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम कोण से जोड़ते हुए कहा, “हिंदुओं को मराठी न बोलने पर पीटा जा रहा है, लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों में मराठी बोलने की हिम्मत कोई नहीं दिखाता।” इस बयान ने विवाद को और भड़का दिया।

कांग्रेस ने इस विवाद से खुद को अलग रखा। महाराष्ट्र कांग्रेस प्रमुख हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि उनकी पार्टी हिंदी थोपने के खिलाफ है, लेकिन ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) की ‘विजय रैली’ में शामिल नहीं होगी। इसके पीछे दो कारण माने जा रहे हैं। पहला, कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव और बीएमसी चुनाव से पहले हिंदीभाषी और गैर-मराठी वोटरों को नाराज नहीं करना चाहती। दूसरा, ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) के साथ मंच साझा करने से पार्टी को कट्टर मराठी छवि मिल सकती है, जो उसकी अखिल भारतीय पहचान के लिए नुकसानदेह हो सकती है। कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा, “हम हिंदी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे अनिवार्य करने के खिलाफ हैं। यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बढ़ाया जा रहा है।”

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने निशिकांत दुबे के बयान को अनुचित बताया और कहा कि इससे भ्रम फैल सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि मराठी अनिवार्य है, और हिंदी को थोपा नहीं गया। शिक्षा मंत्री दादा भुसे ने स्पष्ट किया कि मराठी सभी स्कूलों में जरूरी है, और त्रिभाषा नीति को वापस ले लिया गया है।

महायुति गठबंधन (भाजपा, शिवसेना शिंदे गुट, और एनसीपी अजित पवार) अब बीएमसी चुनाव को ध्यान में रखकर रणनीति बना रहा है। गठबंधन का मानना है कि ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) की एकता मराठी वोटरों का ध्रुवीकरण कर सकती है। इसके जवाब में भाजपा गैर-मराठी वोटरों को साधने पर जोर दे रही है, जबकि शिंदे गुट मराठी वोटरों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है।

यह विवाद केवल भाषा तक सीमित नहीं रहा। कुछ नेताओं ने इसे हिंदुत्व और क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ दिया। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thakrey) ने कहा कि उनकी मूल भाजपा, जिसके साथ शिवसेना का गठबंधन था, अब खत्म हो चुकी है। उन्होंने भाजपा पर फूट डालो और राज करो की नीति अपनाने का आरोप लगाया।

संजय राउत ने कहा, “महाराष्ट्र में मराठी नहीं बोली जाएगी, तो क्या पाकिस्तान या बांग्लादेश में बोली जाएगी?” इस बयान ने हिंदीभाषी समुदाय में नाराजगी बढ़ाई।

भाषा विवाद ने महाराष्ट्र की सियासत को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) की एकता से मराठी अस्मिता को नई धार मिल सकती है, लेकिन यह हिंदीभाषी और गैर-मराठी वोटरों को उनसे दूर भी कर सकती है। बीएमसी चुनाव, जो भारत का सबसे अमीर नगर निगम है, इस विवाद का अगला रणक्षेत्र बन सकता है।

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद दीर्घकालिक नहीं चलेगा, क्योंकि हिंदी और मराठी की लिपि एक ही है, और दोनों भाषाओं में कोई मौलिक विरोध नहीं है। लेकिन अगर मारपीट की घटनाएं जारी रहीं, तो यह सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा बन सकता है।

महाराष्ट्र का हिंदी-मराठी (Hindi Marathi) विवाद अब एक क्षेत्रीय मुद्दे से राष्ट्रीय सियासत का हिस्सा बन गया है। ठाकरे बंधुओं (Thakrey Brothers) की एकता ने मराठी अस्मिता को तो मजबूत किया, लेकिन हिंदीभाषियों पर हमलों ने इसे विवादास्पद बना दिया।

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