हापुड़ की आंखों में आंसू: विदाई समारोह में उमड़ा जनसैलाब, डीएम अभिषेक की कार्यशैली ने जीता जनता का दिल।
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में एक प्रशासनिक अधिकारी की विदाई का दृश्य किसी भावुक फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा प्रतीत हुआ, जहाँ सरकारी
- अधिकारी नहीं, जनसेवक के रूप में बनाई पहचान: विकास और समर्पण की मिसाल पेश कर विदा हुए जिलाधिकारी
- यादों में बसेगा अभिषेक सिंह का कार्यकाल: हापुड़ के हर वर्ग ने नम आंखों से दी अपने चहेते प्रशासनिक मुखिया को विदाई
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में एक प्रशासनिक अधिकारी की विदाई का दृश्य किसी भावुक फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा प्रतीत हुआ, जहाँ सरकारी प्रोटोकॉल और औपचारिकताओं से परे जनता का सच्चा प्रेम देखने को मिला। जिलाधिकारी अभिषेक सिंह के तबादले की खबर आते ही जिले के आम नागरिकों से लेकर प्रशासनिक अमले तक में उदासी छा गई। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने हापुड़ की तस्वीर बदलने के लिए जो प्रयास किए, उसी का परिणाम था कि उनके विदाई समारोह में हजारों की संख्या में लोग स्वेच्छा से एकत्र हुए। यह विदाई केवल एक पद का हस्तांतरण नहीं थी, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व का सम्मान था जिसने सत्ता के गलियारों और आम जनता के बीच की दूरी को समाप्त कर दिया था। हापुड़ के इतिहास में बहुत कम ऐसे अवसर आए हैं जब किसी आईएएस अधिकारी के जाने पर आम आदमी की आंखों में इस कदर आंसू देखे गए हों। अभिषेक सिंह का हापुड़ में बिताया गया समय विकास कार्यों और जनसुनवाई के नए मानकों को स्थापित करने के लिए जाना जाएगा। उन्होंने जिले की बागडोर संभालते ही सबसे पहले उन बुनियादी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया जो दशकों से लंबित थीं। चाहे वह ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछाना हो, शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना हो या फिर स्वास्थ्य सेवाओं को सुदूर गांवों तक पहुँचाना हो, डीएम ने हर मोर्चे पर अपनी सक्रियता दिखाई। उन्होंने केवल कार्यालय में बैठकर फाइलें नहीं निपटाईं, बल्कि धूल भरी सड़कों और खेतों की मेड़ों पर जाकर वास्तविक स्थिति का जायजा लिया। उनकी इसी कार्यशैली ने उन्हें एक 'ग्राउंड ऑफिसर' की छवि दी, जिससे हापुड़ की जनता स्वयं को उनसे गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करने लगी।
जन-संवाद का नया मॉडल
अभिषेक सिंह ने जिले में 'खुली चौपाल' की परंपरा को मजबूती दी, जहाँ कोई भी पीड़ित व्यक्ति बिना किसी डर या बिचौलिए के सीधे अपनी बात रख सकता था। उन्होंने तकनीक का उपयोग करते हुए शिकायतों के निस्तारण की ऑनलाइन निगरानी शुरू की, जिससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगी और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक सीधे पहुँचने लगा। उनके कार्यकाल में हापुड़ ने स्वच्छता सर्वेक्षण और जल संरक्षण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को हापुड़ की आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखेंगी। उन्होंने सरकारी स्कूलों के कायाकल्प के लिए विशेष अभियान चलाया, जिसके तहत बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा दिया गया। अभिषेक सिंह का मानना था कि एक विकसित समाज की नींव बेहतर शिक्षा पर टिकी होती है, इसलिए उन्होंने स्वयं कई बार स्कूलों का औचक निरीक्षण कर शिक्षकों और छात्रों को प्रोत्साहित किया। उनके प्रयासों से जिले के कई जर्जर स्कूल आज मॉडल स्कूलों के रूप में पहचान बना चुके हैं। खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर खेल मैदानों के निर्माण और प्रतियोगिताओं के आयोजन पर भी विशेष बल दिया, जिससे जिले के युवाओं में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। जिले के व्यापारियों और किसानों के बीच भी अभिषेक सिंह की लोकप्रियता शिखर पर रही। किसानों की समस्याओं, विशेषकर गन्ना भुगतान और खाद की उपलब्धता को लेकर उन्होंने हमेशा त्वरित कार्रवाई की। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी किसान को अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। वहीं, व्यापारियों के लिए उन्होंने सुरक्षा और सुगम व्यापार का ऐसा वातावरण तैयार किया कि औद्योगिक गतिविधियों में तेजी आई। विदाई के समय जब विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि उनसे मिलने पहुँचे, तो उनके चेहरे पर अपने प्रिय अधिकारी को खोने का गम साफ झलक रहा था। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति से हाथ मिलाया और उन्हें आश्वासन दिया कि वे जहाँ भी रहेंगे, हापुड़ के विकास की कामना करते रहेंगे।
प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ अभिषेक सिंह की मानवीय संवेदनाओं ने उन्हें सबसे अलग बनाया। आपदा के समय हो या किसी गरीब परिवार की व्यक्तिगत त्रासदी, वे हमेशा सबसे पहले मदद के लिए खड़े दिखे। उनकी विनम्रता का आलम यह था कि वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ भी परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करते थे। विदाई समारोह के दौरान कलेक्ट्रेट के कर्मचारी भी अपने आंसू नहीं रोक पाए। उन्होंने बताया कि डीएम साहब ने कभी भी उन पर काम का बोझ नहीं डाला, बल्कि टीम वर्क के जरिए बड़े से बड़े लक्ष्य को आसान बना दिया। उनके कार्यकाल में जिले में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी सुदृढ़ रही और सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने कई सफल पहल कीं। हापुड़ की जनता के लिए अभिषेक केवल एक नाम नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक बन गए थे। सोशल मीडिया से लेकर शहर की चौराहों तक, हर जगह उनकी विदाई की चर्चा थी। लोगों का कहना था कि जिले को बहुत कम समय में एक ऐसा नेतृत्व मिला जिसने राजनीति और नौकरशाही के पुराने ढर्रे को तोड़कर केवल सेवा को प्राथमिकता दी। विदाई काफिले के दौरान जब उनकी गाड़ी जिला मुख्यालय से रवाना हुई, तो सड़कों के दोनों ओर खड़े लोगों ने फूल बरसाकर उनका अभिनंदन किया। यह दृश्य हापुड़ के प्रशासनिक इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है, जो यह सिखाता है कि यदि एक अधिकारी ईमानदारी और समर्पण से काम करे, तो वह जनता के दिलों में अपनी जगह स्थायी बना सकता है।
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