जवानी में ही घेर रही बुढ़ापे की बीमारियाँ: लाइफस्टाइल में बदलाव ने भारत के हर चौथे वयस्क को बनाया डायबिटीज और हाइपरटेंशन का शिकार।
भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के कारण स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। हालिया आंकड़ों और
- साइलेंट किलर का साया: भारत में जीवनशैली की चूक से 'बीमारियों की राजधानी' बनने का खतरा, हाई बीपी और शुगर ने तोड़े रिकॉर्ड
- आधुनिकता की कीमत सेहत से चुका रहा भारत: अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और तनाव ने बढ़ाई गैर-संचारी रोगों की रफ्तार, सरकार ने कड़े किए नियम
भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली और शहरीकरण के कारण स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। हालिया आंकड़ों और स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, देश में गैर-संचारी रोगों (NCDs) का बोझ इस कदर बढ़ गया है कि अब ये कुल मौतों के 65 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार हैं। 2026 की शुरुआत तक के रुझान बताते हैं कि हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) और डायबिटीज (मधुमेह) जैसी बीमारियां अब केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रही हैं, बल्कि 30 साल से कम उम्र के युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शारीरिक सक्रियता में कमी, असंतुलित खान-पान और बढ़ता मानसिक तनाव इस स्वास्थ्य गिरावट के प्रमुख कारक हैं। भारत अब दुनिया के उन देशों की सूची में शीर्ष पर है जहाँ मेटाबॉलिक डिसऑर्डर की दर सबसे तेजी से बढ़ रही है, जो भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। स्वास्थ्य मंत्रालय के '75/25' महत्वाकांक्षी अभियान के तहत अब तक करोड़ों लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है, जिससे यह चौंकाने वाला सच सामने आया है कि भारत में लगभग 10 करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज और करीब 31 करोड़ लोग हाई बीपी के साथ जी रहे हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्हें यह पता ही नहीं था कि वे इन बीमारियों के शिकार हैं। 'साइलेंट किलर' कही जाने वाली ये बीमारियां चुपके से शरीर के अंगों, विशेषकर किडनी, आंखों और हृदय को नुकसान पहुँचाती हैं। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में इन बीमारियों का प्रसार अधिक है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गांवों में भी जीवनशैली बदलने से वहां भी इन रोगों के मामलों में भारी उछाल देखा गया है।
सेहत पर मंडराता संकट
सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, भारत में 30 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 13 प्रतिशत लोग किसी न किसी पुरानी बीमारी (Chronic Ailment) से जूझ रहे हैं। 2017-18 की तुलना में 2025-26 तक अस्पताल में भर्ती होने की दर में भी वृद्धि हुई है, जिसका सबसे बड़ा कारण एंडोक्राइन और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां हैं। यह इंगित करता है कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ बढ़ रहा है और निवारक स्वास्थ्य (Preventive Health) अब समय की मांग है।
जीवनशैली में सबसे बड़ा नकारात्मक बदलाव हमारे भोजन की थाली में आया है। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF), पैकेज्ड स्नैक्स और शुगर युक्त ड्रिंक्स का सेवन पिछले एक दशक में भारत में कई गुना बढ़ गया है। एक ताजा आकलन के अनुसार, शहरी भारतीय अपनी दैनिक कैलोरी का लगभग 11 से 20 प्रतिशत हिस्सा इन प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से प्राप्त कर रहे हैं। इन खाद्य पदार्थों में नमक, चीनी और हानिकारक वसा (Trans Fat) की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो सीधे तौर पर इंसुलिन प्रतिरोध और धमनियों में रुकावट पैदा करती है। इसके साथ ही, 'सिडेंटरी लाइफस्टाइल' यानी घंटों तक कुर्सी पर बैठकर काम करना और व्यायाम की कमी ने मोटापे की समस्या को महामारी का रूप दे दिया है, जिसे अब एक जीवनशैली की स्थिति के बजाय एक क्रोनिक बीमारी के रूप में देखा जा रहा है। तनाव और नींद की कमी ने भी इस संकट को और गहरा कर दिया है। 2026 की स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार, करीब 60 प्रतिशत भारतीय वयस्क रात में 7 घंटे से कम की नींद ले रहे हैं। डिजिटल उपकरणों का अत्यधिक उपयोग और काम का दबाव 'सर्कैडियन रिदम' (जैविक घड़ी) को बिगाड़ रहा है, जिससे शरीर में कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर हमेशा उच्च बना रहता है। यह स्थिति न केवल उच्च रक्तचाप को जन्म देती है बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कमजोर करती है। तनाव के कारण लोग 'इमोशनल ईटिंग' का शिकार हो रहे हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से मेटाबॉलिक बीमारियों को न्योता दे रहा है। मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य के इस अंतर्संबंध ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चिंता में डाल दिया है।
सरकार ने इस बढ़ते खतरे को देखते हुए व्यापक स्तर पर बुनियादी ढांचे में सुधार किया है। देश भर में 770 से अधिक जिला एनसीडी क्लीनिक और हजारों सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त स्क्रीनिंग की व्यवस्था की गई है। 'आयुष्मान भारत' के तहत अब कैंसर, मधुमेह और हृदय रोगों के इलाज के लिए विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। सरकार का लक्ष्य 2025 के अंत तक 7.5 करोड़ लोगों को मानक देखभाल (Standard Care) के दायरे में लाना है। हालांकि, केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं; व्यक्तिगत स्तर पर जागरूकता का अभाव अभी भी एक बड़ी बाधा है। लोग तब तक डॉक्टर के पास नहीं जाते जब तक लक्षण गंभीर न हो जाएं, जिससे बीमारी का प्रबंधन मुश्किल हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लाइफस्टाइल बीमारियों से बचने के लिए 'बैक टू बेसिक्स' यानी अपनी जड़ों की ओर लौटने की जरूरत है। इसमें घर का बना ताजा भोजन, नियमित योगाभ्यास और पर्याप्त नींद को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना अनिवार्य है। 2026 के नए स्वास्थ्य रुझानों के अनुसार, अब लोग कैलोरी गिनने के बजाय 'बॉडी कंपोजिशन' और 'क्रोनिक इन्फ्लेमेशन' पर ध्यान दे रहे हैं। प्रोटीन की मात्रा और मांसपेशियों के स्वास्थ्य को अब दीर्घायु होने का पैमाना माना जा रहा है। स्कूलों और कार्यालयों में भी अब 'हेल्थ ब्रेक' और पोषण के प्रति जागरूकता फैलाने के कार्यक्रमों को अनिवार्य किया जा रहा है ताकि आने वाली पीढ़ी को इन बीमारियों के चंगुल से बचाया जा सके।
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