अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ईरान को दी कड़ी चेतावनी; कहा- होर्मुज में टोल व्यवस्था लागू हुई तो राजनयिक समझौतों की गुंजाइश होगी पूरी तरह खत्म।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील तथा महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को
- वैश्विक व्यापार मार्ग पर नया संकट: ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर टोल टैक्स वसूलने की बना रहा बड़ी योजना
- ईरान और ओमान के बीच स्थायी पारगमन शुल्क प्रणाली पर गहन चर्चा शुरू, रूस और चीन जैसे मित्र राष्ट्रों को टैक्स से मिल सकती है बड़ी छूट
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील तथा महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया और बेहद गंभीर रणनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। ईरान सरकार ने इस अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग से होकर गुजरने वाले सभी अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक जहाजों और तेल टैंकरों से एक स्थायी पारगमन टोल टैक्स (Toll Tax) वसूलने की महत्वाकांक्षी योजना पर काम करना शुरू कर दिया है। इस भू-राजनीतिक कदम को अमलीजामा पहनाने के लिए ईरान और ओमान के शीर्ष राजनयिक अधिकारियों के बीच एक स्थायी पारगमन शुल्क प्रणाली स्थापित करने को लेकर द्विपक्षीय स्तर पर गहन चर्चा और परामर्श का दौर जारी है। इस प्रस्तावित कर प्रणाली के तहत ईरान का इरादा वैश्विक व्यापारिक जहाजों पर भारी वित्तीय शुल्क थोपने का है, जबकि वह इस रणनीतिक मार्ग पर रूस और चीन जैसे अपने प्रमुख वैश्विक सहयोगियों को इस टैक्स से पूरी तरह मुक्त या विशेष छूट देने का प्रस्ताव रख रहा है।
इस कदम के रणनीतिक और आर्थिक निहितार्थ इतने व्यापक हैं कि इसके लागू होने से पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक माल ढुलाई की लागत में अभूतपूर्व उछाल आ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है, और दुनिया के कुल तेल परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। ईरान इस क्षेत्र में अपनी मजबूत भौगोलिक स्थिति और सैन्य उपस्थिति का लाभ उठाकर वैश्विक व्यापारिक लेन पर अपना नियंत्रण और अधिक मजबूत करना चाहता है। यदि यह टोल प्रणाली लागू होती है, तो यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों और मुक्त पारगमन के सिद्धांतों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती होगी, जिसके कारण पश्चिमी देशों और मध्य-पूर्व के बीच चल रहा तनाव एक नए और अधिक खतरनाक मोड़ पर पहुंच सकता है। दुनिया के कुल कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के समुद्री व्यापार का लगभग 20 से 21 प्रतिशत हिस्सा केवल इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों का अधिकांश निर्यात इसी मार्ग पर पूरी तरह निर्भर है।
ईरान की इस आक्रामक आर्थिक और भू-राजनीतिक रणनीति के सामने आते ही वैश्विक महाशक्ति अमेरिका ने इस पर अत्यंत तीखी और कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस संवेदनशील मुद्दे पर आधिकारिक रूप से गुरुवार को ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार की टोल प्रणाली या एकतरफा शुल्क व्यवस्था लागू करने के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी जारी की है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि ईरान इस प्रकार की किसी भी अवैध और एकतरफा कर प्रणाली को जबरन थोपने का प्रयास करता है, तो भविष्य में वाशिंगटन और तेहरान के बीच किसी भी प्रकार का राजनयिक समझौता होना पूरी तरह से असंभव हो जाएगा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय समुद्री नेविगेशन की स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है और इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
अमेरिकी राजनयिक रुख को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह भी कहा गया है कि वैश्विक समुदाय में कोई भी देश या अंतरराष्ट्रीय संगठन इस प्रकार की अवैध टोल प्रणाली के पक्ष में बिल्कुल नहीं है, क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में मुक्त व्यापार के नियमों को पूरी तरह से नष्ट कर देगा। यह पूरी व्यवस्था न केवल व्यावहारिक रूप से असंभव है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी पूरी तरह से अस्वीकार्य होगी। वाशिंगटन ने संकेत दिए हैं कि यदि ईरान ने अपने क्षेत्रीय जलक्षेत्र के दावों को आगे बढ़ाते हुए जहाजों को जबरन रोकने या उनसे जबरन वसूली करने का प्रयास किया, तो अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग की सुरक्षा और नौवहन की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए आवश्यक सैन्य और रणनीतिक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।
ईरान द्वारा अपने मित्र राष्ट्रों जैसे रूस और चीन को इस प्रस्तावित टैक्स से छूट देने के पीछे एक गहरी भू-राजनीतिक बिसात मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ एक नया आर्थिक और रणनीतिक ब्लॉक तैयार करना है। चीन वर्तमान में ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और रूस के साथ ईरान के सैन्य और रणनीतिक संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी गहरे हुए हैं। इन दोनों देशों को टोल टैक्स से बाहर रखकर ईरान यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन महाशक्तियों का राजनयिक समर्थन मिलता रहे। हालांकि, यूरोपीय संघ और अन्य एशियाई देश जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से मध्य-पूर्व के तेल पर निर्भर हैं, उनके लिए यह व्यवस्था एक बहुत बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकती है।
इस विवाद के कारण आने वाले समय में समुद्री सुरक्षा और नौवहन के अंतरराष्ट्रीय कानूनों, विशेष रूप से 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) की व्याख्या को लेकर एक नया कानूनी युद्ध छिड़ सकता है। ईरान ने हालांकि इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं लेकिन इसकी पूरी तरह से पुष्टि नहीं की है, जिसके कारण वह अक्सर होर्मुज जलडमरूमध्य के एक बड़े हिस्से को अपने संप्रभु क्षेत्रीय जलक्षेत्र के रूप में परिभाषित करने का प्रयास करता रहता है। यदि ओमान इस बातचीत में ईरान के प्रस्तावों के आगे झुक जाता है, तो इस जलमार्ग के दोनों किनारों पर नियंत्रण रखने वाले देश मिलकर अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए एक अत्यंत कठिन और खर्चीली परिस्थिति पैदा कर देंगे, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो सकती है।
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