आईईडी और बारूदी सुरंगों को खोजने में माहिर बेल्जियम शेफर्ड 'गुना' ने तोड़ा दम- चाईबासा में राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई।

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के अंतर्गत आने वाले बेहद घने और दुर्गम सारंडा तथा कोल्हान के जंगलों में इन दिनों केंद्रीय

May 21, 2026 - 14:28
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आईईडी और बारूदी सुरंगों को खोजने में माहिर बेल्जियम शेफर्ड 'गुना' ने तोड़ा दम- चाईबासा में राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई।
आईईडी और बारूदी सुरंगों को खोजने में माहिर बेल्जियम शेफर्ड 'गुना' ने तोड़ा दम- चाईबासा में राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई।
  • झारखंड के सारंडा-कोल्हान जंगलों में नक्सल विरोधी अभियान को लगा बड़ा झटका- हीट स्ट्रोक के कारण जांबाज खोजी श्वान 'गुना' की दर्दनाक मौत
  • सुरक्षाबलों का सबसे वफादार और भरोसेमंद साथी हमेशा के लिए शांत- केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की 174 बटालियन ने खोया अपना सर्वश्रेष्ठ एक्सप्लोसिव डिटेक्शन वॉरियर

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के अंतर्गत आने वाले बेहद घने और दुर्गम सारंडा तथा कोल्हान के जंगलों में इन दिनों केंद्रीय सुरक्षाबलों द्वारा एक बहुत ही व्यापक और सघन नक्सल विरोधी अभियान चलाया जा रहा है। इसी कड़े और बेहद संवेदनशील अभियान के बीच केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 174 बटालियन को एक बहुत ही बड़ा और अपूरणीय कूटनीतिक व सामरिक झटका लगा है। इस विशेष ऑपरेशन में शामिल बल का सबसे जांबाज, कुशल और वफादार एक्सप्लोसिव डिटेक्शन डॉग ‘गुना’ अब इस दुनिया में नहीं रहा। जंगलों में चल रही कठिन ड्यूटी के दौरान अत्यधिक भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के कारण गुना गंभीर रूप से हीट स्ट्रोक की चपेट में आ गया, जिसके चलते उसकी दर्दनाक मौत हो गई। गुना की असमय मृत्यु से न केवल सीआरपीएफ के जवानों की आंखें नम हैं, बल्कि पूरे सुरक्षा तंत्र में एक गहरे शोक की लहर दौड़ गई है, क्योंकि उसे केवल एक श्वान नहीं बल्कि बटालियन का एक बेहद महत्वपूर्ण और जीवित सिपाही माना जाता था।

इस बेहद दुखद घटनाक्रम के विवरण के अनुसार, बीते 18 मई को सीआरपीएफ की एफ/174 बटालियन की एक विशेष टुकड़ी कोल्हान वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले अत्यंत संवेदनशील लुइया इलाके में नक्सलियों के खिलाफ एक टार्गेटेड सर्च ऑपरेशन चला रही थी। इस चुनौतीपूर्ण अभियान के दौरान बेल्जियम शेफर्ड नस्ल का जांबाज श्वान ‘गुना’ अपने हैंडलर और जवानों की टीम के साथ सबसे आगे चलकर रास्ते को सुरक्षित बनाने की अपनी नियमित ड्यूटी पर मुस्तैद था। दोपहर के समय जब जंगल का तापमान अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया और हवाएं बिल्कुल बंद हो गईं, तब ड्यूटी के दौरान ही गुना की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ने लगी। अत्यधिक हांफने और शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने के कारण वह निढाल होकर जमीन पर गिर पड़ा, जिसे देखकर उसके साथ चल रहे सुरक्षाकर्मियों के बीच तुरंत हड़कंप मच गया और ऑपरेशन को कुछ समय के लिए रोककर उसकी जान बचाने के प्रयास शुरू किए गए।

युद्ध क्षेत्र में बेल्जियम शेफर्ड नस्ल की महत्ता

बेल्जियम शेफर्ड (मैलिनोइस) नस्ल के श्वानों को दुनिया भर के सैन्य और अर्धसैनिक बलों में सबसे बुद्धिमान, फुर्तीले और साहसी योद्धाओं के रूप में जाना जाता है। ओसामा बिन लादेन के खिलाफ अमेरिकी कमांडो ऑपरेशन से लेकर भारत के सबसे खतरनाक नक्सल विरोधी और आतंकवाद विरोधी अभियानों तक, इस नस्ल के श्वानों ने अपनी असाधारण सूंघने की क्षमता और वफादारी के बल पर अनगिनत सैनिकों की जान बचाई है।

जैसे ही गुना के अचेत होने की बात सामने आई, मौके पर मौजूद सीआरपीएफ के चिकित्सा सहायक और जवानों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए उसे तत्काल प्राथमिक उपचार देना शुरू किया। जवानों ने उसे ओआरएस का घोल पिलाने, शरीर पर ठंडा पानी छिड़कने और छांव में रखने की हर संभव कोशिश की, ताकि हीट स्ट्रोक के प्रभाव को कम किया जा सके। इसके बावजूद जब उसकी हालत लगातार गंभीर होती गई और कोई सुधार नहीं दिखा, तो जवानों ने कूटनीतिक तत्परता दिखाते हुए उसे तुरंत जंगल के रास्ते से बाहर निकाला और जिला मुख्यालय चाईबासा स्थित मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पास लेकर पहुंचे। चाईबासा में मौजूद पशु चिकित्सकों की एक विशेष टीम ने गुना को बचाने के लिए आपातकालीन जीवन रक्षक दवाएं और वेंटिलेशन सपोर्ट दिया, लेकिन अत्यधिक आंतरिक अंगों की विफलता (मल्टीपल ऑर्गन फेलियर) के कारण डॉक्टरों ने अंततः उसे मृत घोषित कर दिया।

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के आधिकारिक सूत्रों से मिली विस्तृत जानकारी के अनुसार, ‘गुना’ ने अपने पूरे सेवा काल के दौरान झारखंड के सबसे खतरनाक लाल गलियारे (रेड कॉरिडोर) में आयोजित कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक अभियानों में अत्यंत सराहनीय भूमिका निभाई थी। वह जमीन के भीतर कई फीट नीचे छिपे हुए घातक विस्फोटकों, प्रेशर आईईडी, लैंडमाइंस और बूबी ट्रैप्स का पता लगाने में बेहद दक्ष और माहिर माना जाता था। जंगलों में जब भी सुरक्षाबल आगे बढ़ते थे, तो गुना सबसे आगे चलकर अपनी तीक्ष्ण सूंघने की शक्ति से खतरे को भांप लेता था और जवानों को सचेत कर देता था। उसकी इसी असाधारण काबिलियत के कारण उसे पूरी बटालियन के लिए एक कवच माना जाता था, जिसने अपने करियर में अनगिनत बार बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय करवाकर सैकड़ों जवानों और स्थानीय आदिवासियों की अनमोल जिंदगियों को समय रहते बचाया था।

सारंडा और कोल्हान के जंगलों की भौगोलिक स्थिति बेहद जटिल है, जहां एक ओर नक्सलियों द्वारा बिछाए गए बारूदी सुरंगों का खतरा हमेशा मंडराता रहता है, वहीं दूसरी ओर गर्मियों के मौसम में यहां का मौसम बेहद जानलेवा हो जाता है। वर्तमान समय में पूरे झारखंड और विशेषकर पश्चिमी सिंहभूम के जंगलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जिससे कंक्रीट के इलाकों से दूर इन घने जंगलों में भी लू के थपेड़े असहनीय हो चुके हैं। इस भीषण विपरीत मौसम के बीच भी सुरक्षाबल और उनके ये बेजुबान साथी लगातार 12 से 14 घंटे तक पैदल गश्त करने को मजबूर हैं। गुना की मौत ने इस कड़े सच को पूरी तरह सामने ला दिया है कि नक्सल विरोधी अभियानों में केवल गोलियां और बम ही नहीं, बल्कि प्रकृति और मौसम की मार भी इन मूक योद्धाओं के लिए कितनी बड़ी और जानलेवा चुनौती बनकर सामने आती है।

इस अपूरणीय क्षति के बाद चाईबासा स्थित सीआरपीएफ 174 बटालियन के मुख्यालय में एक विशेष और बेहद भावुक शोक सभा का आयोजन किया गया, जहां इस वीर श्वान को पूरे राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। बटालियन के कमांडेंट, सभी वरिष्ठ अधिकारियों और जवानों ने नम आंखों से गुना के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित किए और उसे अंतिम सलामी दी। गुना के मुख्य हैंडलर, जो चौबीसों घंटे उसके साथ साये की तरह रहता था, उसकी स्थिति इस विदाई के दौरान सबसे ज्यादा विचलित करने वाली थी, क्योंकि उसने अपना एक सच्चा दोस्त और कामरेड खो दिया था। अधिकारियों ने इस मौके पर कहा कि गुना की कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकता, लेकिन उसकी शहादत और देश सेवा के प्रति उसके समर्पण को बटालियन के इतिहास में हमेशा सुनहरे अक्षरों में याद रखा जाएगा।

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