रिफाइंड तेल के दाम बीस रुपये प्रति लीटर तक बढ़े, सप्लाई चेन टूटने से ईरानी पिस्ता की कीमतों में एक हजार रुपये प्रति किलो की ऐतिहासिक तेजी।
खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया के मध्य जारी भीषण सैन्य संघर्ष तथा लगातार बढ़ते कूटनीतिक तनाव की तपिश अब भारत के आम
- पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक संकट भारतीय रसोई के लिए बना बड़ी आफत, दून के बाजारों में खाद्य तेल और सूखे मेवों की कीमतों में भारी उछाल
- अंतरराष्ट्रीय तनाव से घरेलू बजट का गणित पूरी तरह बिगड़ा, होटल और रेस्टोरेंट उद्योग पर भी मंडराने लगा आर्थिक मंदी का गंभीर खतरा
खाड़ी देशों और पश्चिम एशिया के मध्य जारी भीषण सैन्य संघर्ष तथा लगातार बढ़ते कूटनीतिक तनाव की तपिश अब भारत के आम नागरिकों के घरों तक पहुंचने लगी है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून सहित देश के विभिन्न हिस्सों में इस अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल का सीधा और बेहद नकारात्मक असर रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों पर दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से रसोई की रीढ़ माने जाने वाले रिफाइंड खाद्य तेल और प्रीमियम सूखे मेवों (ड्राई फ्रूट्स) के बाजार में इस समय हाहाकार मचा हुआ है। वैश्विक स्तर पर मालवाहक जहाजों के मार्ग में आ रही बाधाओं और कच्चे माल की किल्लत के कारण स्थानीय खुदरा बाजारों में जरूरी वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि दुनिया के किसी एक कोने में होने वाली युद्ध की सुगबुगाहट किस तरह एक आम भारतीय गृहणी के मासिक बजट को पूरी तरह से तहस-नहस करने की ताकत रखती है।
घरेलू बाजार में इस अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि का सबसे बड़ा झटका रिफाइंड तेल की कीमतों में देखने को मिला है, जो पिछले कुछ ही दिनों के भीतर बीस रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो गया है। भारत अपनी खाद्य तेलों की कुल खपत का एक बहुत बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय आयात के जरिए पूरा करता है, जिसमें पाम ऑयल और अन्य सहायक तेलों की भारी खेप खाड़ी देशों के समुद्री मार्गों से होकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचती है। पिछले दो महीनों से जारी युद्ध के कारण लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख व्यापारिक जलमार्गों में मालवाहक जहाजों का आवागमन बेहद जोखिम भरा और धीमा हो गया है। इसके चलते घरेलू तेल रिफाइनिंग कंपनियों के पास मौजूद पुराना कच्चा स्टॉक अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका है, और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आने वाली नई खेप बेहद ऊंचे भाड़े और प्रीमियम दरों पर भारतीय बाजारों में पहुंच रही है, जिसका सीधा बोझ अब आम उपभोक्ताओं की जेब पर डाला जा रहा है। भारत में त्योहारों और वैवाहिक सीजन के दौरान खाद्य तेलों और सूखे मेवों की मांग अपने चरम पर होती है। ऐसे समय में अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण सप्लाई चेन का बाधित होना न केवल खुदरा कीमतों को बढ़ाता है, बल्कि बाजार में जमाखोरी और कालाबाजारी की संभावनाओं को भी बल देता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो आम जनता के लिए बुनियादी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
बाजार के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करने पर पता चलता है कि महज दो महीने पहले तक जो नामी और प्रतिष्ठित कंपनियों का रिफाइंड तेल 150 से 160 रुपये प्रति लीटर की दर पर आसानी से उपलब्ध था, उसके दाम अब बढ़कर 170 से 180 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुके हैं। खाद्य तेल की इस बेलगाम रफ्तार ने मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के सामने एक गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। तेल के दामों में हुई इस बढ़ोतरी का असर केवल घरेलू रसोई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक गतिविधियां भी प्रभावित हुई हैं। शहर के छोटे-बड़े होटलों, रेस्टोरेंटों और ढाबा संचालकों के सामने अपने व्यवसाय को मुनाफे में बनाए रखने का एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है। पहले से ही कमर्शियल एलपीजी गैस सिलेंडरों की बढ़ती कीमतों से परेशान इन कारोबारियों के लिए अब महंगे तेल ने पूरी विनिर्माण लागत को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है।
इस अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक गतिरोध की सबसे बड़ी मार सूखे मेवों के राजा माने जाने वाले पिस्ता पर पड़ी है, जिसकी मुख्य आपूर्ति का केंद्र ईरान और उसके आसपास के क्षेत्र हैं। सप्लाई चेन के पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण भारतीय बाजारों में ईरानी पिस्ता की आवक नाममात्र की रह गई है, जिसके चलते इसके थोक और खुदरा दामों में एक हजार रुपये प्रति किलो तक का भारी उछाल दर्ज किया गया है। वर्तमान स्थिति यह है कि देहरादून के ड्राई फ्रूट बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाला पिस्ता अब लगभग 3400 रुपये प्रति किलोग्राम की रिकॉर्ड कीमत पर बिक रहा है। इतनी ऊंची कीमत होने के कारण आम ग्राहकों ने पिस्ता की खरीदारी से पूरी तरह दूरी बना ली है और केवल बेहद संपन्न वर्ग या बहुत जरूरी होने पर ही लोग इसकी सीमित मात्रा में खरीद कर रहे हैं, जिससे इस व्यापार से जुड़े स्थानीय थोक व्यापारी भी बेहद चिंतित हैं।
देहरादून के स्थानीय थोक और खुदरा किराना व्यापार से जुड़े अनुभवी व्यवसायियों का मानना है कि खाड़ी देशों से होने वाला आयात जिस तरह से प्रभावित हुआ है, उसने पूरे बाजार ढांचे में एक बड़ी अस्थिरता और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। व्यापारियों के मुताबिक, यदि पश्चिम एशिया के देशों के बीच जारी यह सैन्य गतिरोध और राजनीतिक कड़वाहट जल्द ही किसी तार्किक और शांतिपूर्ण समझौते के जरिए समाप्त नहीं हुई, तो आने वाले हफ्तों में रिफाइंड तेल के साथ-साथ सरसों तेल, सोयाबीन तेल और वनस्पति घी की कीमतों में एक और बड़ा दौर देखने को मिल सकता है। थोक मंडियों में माल की आवक कम होने के कारण खुदरा दुकानदार भी भविष्य के लिए स्टॉक सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे कृत्रिम किल्लत की स्थिति भी पैदा होने का डर सता रहा है।
बाजार के इस रुख से सबसे बड़ी चिंता यह पैदा हो गई है कि महंगाई की यह जानलेवा मार केवल ब्रांडेड रिफाइंड तेल या महंगे ड्राई फ्रूट्स तक ही सिमटकर नहीं रहने वाली है। चूंकि खाद्य तेल हर प्रकार के प्रसंस्कृत भोजन (प्रोसेस्ड फूड) का मुख्य आधार होता है, इसलिए आने वाले दिनों में इसका सीधा असर रोजमर्रा के बेकरी उत्पादों, पारंपरिक मिठाइयों, स्नैक्स, नमकीन और पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री पर पड़ना बिल्कुल तय माना जा रहा है। शादियों और सामूहिक आयोजनों के इस दौर में कैटरिंग सेवाओं की दरें भी काफी ज्यादा बढ़ सकती हैं। औद्योगिक विनिर्माण से जुड़े लोगों का आकलन है कि यदि कच्चे माल की कीमतों में इसी तरह की तेजी बनी रही, तो रेस्टोरेंटों में मिलने वाली भोजन की सामान्य थाली के दाम भी आम आदमी की पहुंच से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे।
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